अमरवाड़ा यशो:- पर्यूषण पर्व राज के तृतीय दिवसमार्दव धर्म क्षमा एव आर्जव धर्म के समान ही आत्मा का स्वभाव है ! सरलता से जीव निर्भय रहता है जबकि कुटिलता से भयभीत, चिंतित और दु:खी रहता है ,मायावी प्राणी को अपने दोष का पर्दा- फास हो जाने का भय बना रहता है !
तरण तारण दिगंबर जैन मंदिर अमरवाड़ा में वर्षा वास कर रहे ब्रह्मचारी दिव्यानंद जी महाराज ने आर्जव धर्म के बारे में बताया कि कुटिलता मन वचन की अनेक रूप- प्ररिणति का नाम है अर्थात मन में कुछ और वचन में कुछ और शरीर में कुछ और होता है या अंतर और बाहर समानता का ना होना ही कुटिलता है7 मनुष्य मन मे खोटे विचार करता है वचन में कृत्रिम मिठास रूप मायाचारी पूर्वक बोलता है ,और शरीर से कुछ और ही क्रिया करता है इसी विविधता को मायाचार कहते हैं ,यहआर्जवधर्म की विरोधी माया कषद्यय है, माया कषद्यय के कारण आत्मा में स्वभावगत सरलता न रहकर कुटिलता उत्पन्न हो जाती है द्य सरलता धर्म है और कुटिलता आधर्म है ! देखा गया है कपट रूप व्यवहार करने से लोगों का विश्वास जहां नष्ट हो जाता है वहीं मित्रता का भी अभाव हो जाता है ,सज्जनता की पहचान सरलता से ही होती है सज्जन ,सरल और दुर्जन -कुटिल होते हैं! संसार में सभी जीवो को अपनी-अपनी करनी का फल भोगना पड़ता है, इसलिए सद् विचार सद वचन और सदाचरण संपन्न हमारा जीवन होना चाहिए, आर्जव धर्म बताता है की सरलता हमारा श्रेष्ठ गुण है इसी से जीवन में आत्महित का मार्ग प्रशस्त होता है।





