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ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभाव अनेक संकटों का आमंत्रण

मार्च का महीना खत्म भी नहीं हुआ कि देश के कई हिस्सों में हीटवेव चलने लगी है। ओडिशा के बौद्ध में 16 मार्च को तापमान 43 डिग्री और झारसुगुडा में 42 डिग्री को पार कर गया। कुछ आधा दर्जन से अधिक स्टेशनों में पारा 40 डिग्री के ऊपर दर्ज किया गया। कोई हैरत नहीं कि इस कॉलम के प्रकाशित होने तक नए रिकॉर्ड बन जायें। भारतीय मौसम विभाग कह रहा है कि मार्च में असामान्य गर्मी कोई अपवाद नहीं है लेकिन ऐसी हीटवेव पहले नहीं देखी गई।

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तापमान वृद्धि रोकने का लक्ष्य असफल

यह ध्यान देने की बात है वर्ष 2024 मानव इतिहास का सबसे गर्म साल दर्ज किया गया है। वर्ष 2023 में मार्च इतिहास में दर्ज सबसे गर्म महीना था और 2024 के मार्च ने अपना वह रिकॉर्ड तोड़ दिया। इसी तरह फऱवरी 2024 सबसे गर्म महीना था जो रिकॉर्ड इस साल फरवरी में टूट गया। अब 2025 की मार्च के लक्षण भी यही बता रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है जिस 1.5 डिग्री तापमान वृद्धि को हमने इस सदी के अंत तक रोकने का लक्ष्य रखा था, मौजूदा रफ्तार से वह बैरियर 2029 में ही टूट जायेगा।

हमारे ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं और समुद्र 4 गुना रफ्तार से गर्म हो रहे है

असल में आंकड़ों की यह सूची लंबी होती जा रही है और यह किसी एक्टिविस्ट या निराशावादी की बनाई लिस्ट नहीं है बल्कि दुनिया के सबसे बेहतरीन मौसमी विज्ञानियों और क्लाइमेट साइंटिस्ट्स की मौजूदगी वाले आईपीसीसी (संयुक्त राष्ट्र के मौसम विज्ञानियों का पैनल) के आंकड़े हैं। हमारे ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं और समुद्र 4 गुना रफ्तार से गर्म हो रहे हैं। ऐसे में जहां नदियों में बाढ़ और समुद्र जल स्तर में बढ़ोतरी का संकट है वहीं चक्रवाती तूफानों की मार बढ़ेगी। पूरी दुनिया में ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रभाव साफ दिख रहे हैं। दुनिया की सबसे गरीब आबादी और महिलाओं पर इसकी चोट सबसे अधिक होगी। खाद्य सुरक्षा संकट और जंतुओं से मनुष्यों को पहुंचने वाली बीमारियों में वृद्धि के साथ जलवायु प्रेरित पलायन बढऩे से देशों के बीच टकराव और युद्ध के ख़तरे बढ़ेगें।

भारत की भौगोलिक विविधता कई मायनों में उसकी ताकत रही है। एक ओर करीब 2,500 किलोमीटर लंबी हिमालयी पर्वत श्रंखलायें और दूसरी और 7,500 किलोमीटर लंबी समुद्र तट रेखा जो 9 राज्यों में फैली है। लेकिन अब देश में तटीय राज्यों के साथ अंदरूनी हिस्सों पर भी चक्रवातों की चोट होगी। बड़ी संख्या में आबादी तटों पर रहती भी है और जीवन यापन (पर्यटन, कृषि, मछलीपालन आदि) के लिए कोई 25 करोड़ से अधिक लोग समुद्र पर सीधे या परोक्ष रूप से निर्भर भी है। यह ध्यान में रखना ज़रूरी है कि हमारे पश्चिमी तट पर बसावट बहुत घनी है और कई महत्वपूर्ण शहर और बड़ा आबादी तट पर ही हैं। अरब सागर के गर्म होने से वहां चक्रवाती तूफ़ानों की संख्या और मारक क्षमता बढ़ रही है।

अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव

उधर उत्तर भारत के उत्तराखंड और हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य हों या उत्तर- पश्चिम में राजस्थान के अलावा यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश सभी में बढ़ते तापमान के कारण जीना दूभर होने जा रहा है। न केवल जि़न्दगी कठिन होगी बल्कि इसका प्रभाव अर्थव्यवस्था पर भी होगा। फऱवरी की गर्मी ने रबी की फसल को बर्बाद किया है और जल्दी तापमान बढऩे से ऊनी कपड़ा इंडस्ट्री के आर्डर भी रद्द हुए। पिछले साल राजस्थान के चुरू में 28 मई को तापमान 50 डिग्री से अधिक दर्ज किया गया और दिल्ली में अधिकतम तापमान 52 डिग्री से ऊपर दर्ज हुआ। ऐसे में हर रोज़ खुले में मज़दूरी कर कमाने वाले दिहाड़ी मज़दूर और रिक्शा चलाने वालों समेत सारे असंगठित क्षेत्र का क्या होगा? कहने की ज़रूरत नहीं कि भारत की अर्थव्यवस्था छोटे और असंगठित क्षेत्र को बचाये बिना आगे नहीं बढ़ सकती है। मध्यम, छोटे और सूक्ष्म औद्योगिक इकाइयों (एमएसएमई सेक्टर) को ही लें तो वह कम से कम 20 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लोगों को रोजग़ार देता है। आज भारत में करीब 6 करोड़ एमएसएमई इकाइयां पंजीकृत हैं जो 30 प्रतिशत निर्यात में सहयोग देती हैं।

पिछले साल कुछ एयरपोर्ट्स से हवाई उड़ाने संचालित नहीं हो सकी थीं यानी इसका असर उच्च आय वर्ग की जीवनचर्या और इकोनॉमी पर भी पड़ेगा और वो सिर्फ एसी कमरों में बैठकर खुद को नहीं बचा सकते। वर्ष 2024 की गर्मियों में भारत की पीक पावर डिमांड 2,50,000 मेगावॉट तक पहुंच गई थी और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण यानी सीईए अनुमान है कि इस साल यह 2,70,000 मेगावॉट तक पहुंच जायेगी। इसके लिए काफी हद कर कोयला बिजलीघरों पर निर्भरता रहने वाली है क्योंकि अधिकतम मांग के समय तीन-चौथाई बिजली की आपूर्ति थर्मल पावर प्लांट ही करते हैं। सरकार को सोलर और विन्ड के साथ सभी साफ ऊर्जा के विकल्पों को बढ़ाने और प्रभावी बनाने के साथ तुरंत ही एक प्रभावी हीट एक्शन प्लान चाहिए ताकि ग्लोबल वॉर्मिंग का असर न्यूनतम हो सके।

(हृदयेश जोशी स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं, जो अपने यूट्यूब चैनल Eco N Energy Talk पर क्लाइमेट और साइंस की ख़बरों को प्रमुखता से दिखाते हैं)

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