“बैलगाड़ी में निकली शाही बारात: बालाघाट में दूल्हे ने बदली सोच”
10 किमी तक बैलगाड़ियों में सजी बारात, बांसुरी-डपली की धुन पर झूमे बाराती… सादगीभरी शादी बनी पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय
बैलगाड़ी बारात बालाघाट – निकली शाही बारात: सादगी की मिसाल
Balaghat 07 April 2026
बालाघाट यशो:- आधुनिकता के इस दौर में जहां शादियां डीजे के शोर, चमक-दमक और महंगी गाड़ियों की होड़ में बदलती जा रही हैं, वहीं बालाघाट जिले के कटंगी तहसील अंतर्गत सेलवा गांव से निकली एक बारात ने पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
यह बारात न तो शोर-शराबे से भरी थी और न ही लग्जरी कारों की कतार से सजी—बल्कि इसमें दिखी सादगी, परंपरा और संस्कृति की अनोखी झलक, जिसने हर किसी को प्रभावित कर दिया।

बैलगाड़ियों में सजी बारात, 10 किमी तक अनोखा सफर
सेलवा गांव से दूल्हे अंकित देशमुख की बारात करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित सीताखोह गांव तक पहुंची।
पूरी बारात पारंपरिक अंदाज में निकली, जिसमें दर्जनों बैलगाड़ियों को आकर्षक ढंग से सजाया गया था। बैलों को भी विशेष साज-सज्जा के साथ तैयार किया गया, जिससे पूरा दृश्य किसी पुराने जमाने की शाही सवारी जैसा प्रतीत हो रहा था।
बाराती अनुशासित पंक्तियों में चलते हुए इस अनोखी बारात का हिस्सा बने—जो आज के दौर में दुर्लभ नजारा बन चुका है।
शाम ढलते ही उमड़ा जनसैलाब, गांवों में उत्सव जैसा माहौल
शाम के समय जैसे ही बारात निकली, आसपास के गांवों के लोग इस दृश्य को देखने के लिए उमड़ पड़े।
हर कोई इस अनोखी पहल को देखकर उत्साहित नजर आया। लोगों के चेहरों पर खुशी और आश्चर्य साफ झलक रहा था—मानो वर्षों बाद पुराने समय की परंपराएं फिर से जीवंत हो उठी हों।
डीजे नहीं, बांसुरी-डपली की मधुर गूंज
इस बारात की सबसे बड़ी खासियत इसका संगीत रहा।
जहां आजकल शादियों में तेज आवाज वाले डीजे का बोलबाला है, वहीं इस बारात में बांसुरी और डपली की मधुर धुन सुनाई दी।
इन पारंपरिक वाद्य यंत्रों की ताल पर बाराती झूमते नजर आए, जिससे माहौल पूरी तरह सांस्कृतिक रंग में रंग गया।
लोक कलाकारों को मिला मंच, जीवित हुई परंपरा
स्थानीय कलाकारों ने बताया कि पहले हर शादी में इस तरह का पारंपरिक संगीत और नृत्य होता था, लेकिन समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती गई।
ऐसे आयोजनों से अब उन्हें फिर से मंच मिल रहा है, जिससे न केवल उनकी कला जीवित रह रही है, बल्कि नई पीढ़ी भी उससे जुड़ रही है।
बुजुर्गों की यादें हुईं ताजा, दिखा अपनापन
गांव के बुजुर्गों ने इस बारात को देखकर भावुक होते हुए बताया कि करीब 40 साल पहले उनकी शादियां भी इसी तरह सादगी और परंपरा के साथ होती थीं।
उन्होंने कहा कि ऐसी शादियां न केवल खर्च कम करती हैं, बल्कि रिश्तों में अपनापन और जुड़ाव भी बढ़ाती हैं।

फिजूलखर्ची के दौर में सादगी का मजबूत संदेश
आज के समय में शादियां अक्सर दिखावे और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बन गई हैं, जहां लाखों रुपये केवल एक दिन की चमक-दमक पर खर्च कर दिए जाते हैं।
ऐसे में यह अनोखी बारात एक मजबूत संदेश देती है—
शादी की असली खूबसूरती सादगी और संस्कार में है, न कि खर्च और प्रदर्शन में।
परंपरा और आधुनिकता का संतुलन जरूरी
बालाघाट के सेलवा गांव की यह अनोखी बारात सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला उदाहरण बनकर सामने आई है।
यह पहल बताती है कि आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना संभव है—और यही सोच आने वाले समय में एक बड़े सामाजिक बदलाव का आधार बन सकती है।
यह सिर्फ शादी नहीं, सामाजिक बदलाव की शुरुआत है
बालाघाट की यह अनोखी बारात केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक विचार है—जो समाज को दिशा दे सकता है।
अगर ऐसे प्रयास बढ़े, तो न केवल फिजूलखर्ची पर लगाम लगेगी, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत भी आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सकेगी।
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