सिवनीमध्यप्रदेश

बंद कमरे में बवाल, बाहर चर्चाओं का बाजार गर्म! सर्किट हाउस में ‘हिस्सेदारी’ के हिसाब पर सत्तापक्षी पार्षदों में तकरार

“हिस्सेदारी के हिसाब पर शुरू हुई बातों की गर्माहट ने देखते ही देखते तूल पकड़ लिया। तेवर तल्ख हुए और मामला कथित झूमाझटकी तक जा पहुंचा।”

सिवनी नगर पालिका में बवाल!  खरीदी से निर्माण तक कथित ‘हिस्सेदारी’ का हिसाब-किताब! सर्किट हाउस में बैठे सत्तापक्ष के पार्षद, बंटवारे पर बिगड़ी बात

सिवनी यशो। नगर पालिका में पिछले कुछ दिनों से खरीदी, नियुक्तियों, पदस्थापनाओं और निर्माण कार्यों को लेकर उठ रही चर्चाओं के बीच अब कथित ‘हिसाब-किताब’ और ‘हिस्सेदारी’ की कहानी ने सियासी गलियारों में गर्मी बढ़ा दी है। चर्चा है कि बीते दिनों में हुए विभिन्न मामलों में कथित गड़बड़ियों से जुड़े लेन-देन का हिसाब करने और सत्ताधारी पार्षदों के बीच हिस्सेदारी तय करने के लिए स्थानीय सर्किट हाउस में बैठक जमाई गई थी। लेकिन कहते हैं न—जहां हिसाब बराबर करने बैठो, वहीं अगर हिसाब में कमी निकल आए तो बात कागज से निकलकर कुर्सी तक पहुंचते देर नहीं लगती!

बताया जा रहा है कि सत्तापक्ष से जुड़े पार्षदों की मौजूदगी में कथित तौर पर पिछले दिनों के खरीदी, नियुक्ति, पदस्थापना और निर्माण कार्यों से जुड़े मामलों का हिसाब-किताब किया जाना था। चर्चा का मकसद कथित रूप से सभी के बीच हिस्सेदारी तय करना बताया जा रहा है। बैठक में भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी की भी चर्चा है।

हिसाब हुआ तो ‘हिस्सा’ कम निकला!

सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि बैठक में जब कथित लेन-देन और हिस्सेदारी का हिसाब सामने आया तो एक पार्षद की नाराजगी खुलकर सामने आ गई। बताया जाता है कि अपेक्षित हिस्सेदारी में कमी को लेकर शुरू हुई तकरार देखते ही देखते इतनी बढ़ गई कि बातचीत की मेज से मामला कथित झूमाझटकी तक जा पहुंचा।

अब सवाल यह है कि जब बैठक ही हिस्सेदारी का हिसाब तय करने के लिए थी तो आखिर किसका कितना हिस्सा और किस आधार पर? यह सवाल नगर की राजनीतिक चर्चाओं में खूब चटखारे ले रहा है।

बंद कमरे में बवाल, बाहर चर्चाओं का बाजार गर्म

सर्किट हाउस के बंद कमरे में वरिष्ठ नेताओं की समझाइश से तत्काल मामला शांत हो गया, लेकिन कमरे से बाहर आते-आते कहानी ने कई सवाल छोड़ दिए। नगर में तरह-तरह की चर्चाएं हैं—कोई इसे आपसी लेन-देन का विवाद बता रहा है तो कोई खरीदी से लेकर निर्माण कार्यों तक में कथित हिस्सेदारी के बंटवारे से जोड़कर देख रहा है।

हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है। लेकिन इतना जरूर है कि नगर पालिका की राजनीति में इन दिनों ‘कौन कितना पाएगा’ का सवाल, ‘जनता को कितना मिलेगा’ के सवाल पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है।

खरीदी से नियुक्ति और निर्माण तक उठ रहे सवाल

नगर पालिका में हाल के दिनों में खरीदी, नियुक्तियों, पदस्थापनाओं और विभिन्न निर्माण कार्यों को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। अब कथित हिस्सेदारी के विवाद की चर्चा ने इन सभी मामलों को एक ही तराजू पर ला खड़ा किया है।

नगर के लोगों के बीच सवाल उठ रहा है कि यदि सब कुछ नियम-कायदे और पारदर्शिता से हुआ है तो फिर हिसाब-किताब के लिए बंद कमरे की बैठक और उसके बाद कथित विवाद की नौबत क्यों आई?

‘बंदरबांट’ की चर्चा ने बढ़ाई बेचैनी

नगर में अब यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि परिषद में विकास कार्यों और जनहित की योजनाओं के नाम पर कथित रूप से ‘बंदरबांट’ चल रही है। यदि यह आरोप सही है तो यह केवल राजनीतिक खींचतान का मामला नहीं, बल्कि नगर की जनता के पैसों और उसके अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

और अगर आरोप गलत हैं तो फिर संबंधित जिम्मेदारों को सामने आकर साफ-साफ बताना चाहिए कि सर्किट हाउस में बैठक किस मुद्दे पर हुई थी और वहां कथित विवाद की नौबत क्यों आई?

आज सर्किट हाउस, कल सड़क?

फिलहाल मामला वरिष्ठ नेताओं की समझाइश के बाद शांत बताया जा रहा है, लेकिन अंदरूनी असंतोष की चिंगारी बुझी है या राख के नीचे सुलग रही है—यह आने वाले दिनों में पता चलेगा।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक बंद कमरे में हुई कथित झड़प का नहीं है। सवाल उस कथित हिसाब-किताब का है, जिसकी चर्चा नगर की गलियों में हो रही है। खरीदी से लेकर नियुक्ति, पदस्थापना और निर्माण कार्यों तक यदि वाकई कोई ‘हिस्सा’ तय होना था, तो जनता भी जानना चाहेगी कि आखिर यह हिसाब किसका था और किस बात का था?

सर्किट हाउस का कमरा भले बंद रहा हो, लेकिन चर्चाओं के दरवाजे अब पूरी तरह खुल चुके हैं।

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