“दीदी ने अपने जीवन में जिस तरह गुप्त, शांत और समानता पूर्ण जीवन जिया है, वही वास्तविक संतत्व की पहचान है। अब समय आ गया है कि उन्हें ‘दादी’ कहकर सम्मानित किया जाए।”दीदी ने अपने संबोधन में कहा कि –
“जिन मात-पिता ने अपनी संतानों को विश्वकल्याण के लिए समर्पित किया, उन्हें प्रणाम करना और उनका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है।”