
सिवनी यशो:- समय कितना कीमती है इसका आभास उस समय होता है जब उसके बीतने की समय अवधि नजदीक आने लगती है। यह हमारे गुरू की जन्मस्थली है जिसमें मैं शंकराचार्य बनने के बाद पहली बार आया हूं, इसे मैं नमन करता हूं। मेरा ध्येय था कि मैं सिवनी उस समय जाऊं जब गुरूजी की वार्षिक समाराधना हो जाये। सिवनी शिव की नगरी है और यही काशी है। यह बात ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने आज मठ मंदिर के प्रांगण में धर्मानुरागी श्रोताओं से कही है।
स्वामी जी ने कहा कि समय बहुत कीमती होता है। समय की कीमत का एहसास उस समय होता है जब वह बीतने लगता है और एक निर्धारित समय पर आ जाता है जिस पर हम बंधनकारी होते हैं। सिवनी का यह उनका पहला कार्यक्रम है। उन्होंने तय किया था कि दो पीठ के ब्रम्हलीन हुए शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी की जब वार्षिक समाराधना हो जाएगी तभी वे सिवनी जायेंगे। वार्षिक समाराधना हो चुकी है और चातुर्मास का सीमा उल्लंघन भी करना था ऐसे में हमारे गुरू भाई ब्रम्हचारी सुबुद्धानंद जी ने कहा कि सिवनी चलना है और शोभायात्रा का कार्यक्रम बना हुआ है। यह गुरू का आर्शीवाद ही है कि जो मैने सोचा था वह मेरे सामने आ गया।

आपने कहा कि सिवनी आने का महत्व मेरे लिए वैसा ही है जैसे रामभक्त को अयोध्या जाने से और कृष्ण भक्त को मथुरा जाने से होता है। सिवनी हम सब गुरू भाईयों के लिए काशी के समान है। आपने कहा कि वह मनुष्य धन्य हो जाता है जो चार व्यवहार करता है। काशी में रहना, अच्छे लोगो की सत्संग करना, गंगाजल पीना और शिवजी का पूजन करना। आपने बताया कि हमारे गुरू ने कहा था कि सिवनी काशी के समान ही है। यहां अच्छे लोगों का सत्संग होता है। मां बैनगंगा का जल गंगा जैसा ही है और मठ मंदिर में स्थापित शिवजी अद्वितीय है। आपने कहा कि जब एक हमने अपने गुरू से कहा कि यह काशी कैसे है तो उन्होंने पंचांग बुलवाया और बताया कि यह पंचाग कहां से प्रकाशित होता है। हमने बताया कि यह काशी का पंचाग है। आपने कहा कि काशी के पंचाग से जो हम व्यवहार करते हैं वही काशी है। अंधेरे को हराकर प्रकाश को ही काशी कहा जाता है।





