अपने व्याख्यान में उन्होंने बताया कि पोल्ट्री फार्म से निकलने वाले वेस्ट मटेरियल को प्रक्रिया करके जैविक खाद में बदला जा सकता है जो नाइट्रोजन से भरपूर होती है यह पौधों की पैदावार को नेचुरल तरीके से बढ़ाने में सहायक है इससे न केवल पैदावार को बढ़ाया जा सकता है बल्कि यह विधि जैविक कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है यह खाद मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने का एक प्राकृतिक तरीका हैं यह 100% जैविक और पर्यावरण के अनुकूल होता है तथा जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में मदद करता हैं। यह कचरे के पुनर्चक्रण करके प्रदूषण को कम करने का अच्छा माध्यम है।
इसके उपरांत कार्यक्रम संयोजक डॉ.पूनम अहिरवार ने वर्मी कम्पोस्टिंग के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि वर्मी कम्पोस्टिंग एक ऐसी जैविक प्रक्रिया है जिसमें केंचुए की सहायता से जैविक कचरे को उच्च गुणवत्ता वाली खाद में बदला जाता हैं। उन्होंने वर्मी कम्पोस्टिंग के लाभ तथा आवश्यकता पर भी विस्तृत जानकारी दी। कार्यक्रम का मंच संचालन एवं आभार प्राणी शास्त्र विभाग के विभाग अध्यक्ष डॉ. राधेश्याम डहेरिया द्वारा किया गया ।विद्यार्थियों को आर्द्रभूमि संरक्षित रखने हेतु शपथ भी दिलाई गई।
कार्यक्रम में इको क्लब प्रभारी प्रो. के.के. बरमैया, सह-प्रभारी डॉ. पूनम अहिरवार सहित प्राणी शास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ राधेश्याम डहेरिया, डॉ. संदीप शुक्ला, डाॅ टी.पी. सागर, श्रीमती मनीषा सोनेकर एवं श्री धनेंद्र कुमार गुरडेकर उपस्थित रहे।