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सहकारिता में भरोसे की हत्या 65 लाख का फर्जीवाड़ा

Dainik Yashonnati

Dainik Yashonnati / Jan 01, 2026 03:32 pm / Post views : 389

सहकारिता में भरोसे की हत्या 65 लाख का फर्जीवाड़ा
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Mandla 01January 2026 मंडला यशो:- ‌सहकारिता जिस भरोसे और सहयोग की अवधारणा पर खड़ी थी, उसी भरोसे की सुनियोजित हत्या का उदाहरण है मंडला जिला सहकारी बैंक से जुड़ा 65 लाख रुपये का ऋण घोटाला। अस्वीकृत ऋण को कागजों में स्वीकृत दिखाकर लाखों रुपये की धोखाधड़ी की गई। यह मामला भले ही वर्षों पुराना हो, लेकिन इसकी गूंज आज भी सहकारी व्यवस्था की साख पर गहरे सवाल खड़े करती है। यह मामला सहकारिता में भरोसे का संकट दर्शाता है, जहां बैंकिंग प्रणाली किसानों के लिए सहारा बनने के बजाय संदेह का कारण बनती जा रही है। इस बहुचर्चित प्रकरण में आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW), जबलपुर ने मंडला जिला सहकारी केंद्रीय बैंक और अल्प बचत साख सहकारी समिति के पदाधिकारियों के खिलाफ गंभीर धाराओं में प्रकरण दर्ज किया है। जांच में स्पष्ट हुआ है कि यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि दस्तावेजों से छेड़छाड़ कर किया गया आपराधिक षड्यंत्र था। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों के कारण सहकारिता में भरोसे का संकट और गहराया है, जिससे आम किसान और उपभोक्ता खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

अस्वीकृत था ऋण, फिर कैसे बह गए 65 लाख?

जांच के अनुसार, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मंडला की ऋण उप समिति की बैठक में एक ऋण प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से अस्वीकृत किया गया था। कारण भी दर्ज था— समिति पर पहले से बकाया राशि और नियमों का उल्लंघन। लेकिन इसके बाद सहकारिता के नियमों और नैतिकता को ताक पर रख दिया गया। बैठक के अधिकृत दस्तावेजों में कूटरचना कर “अस्वीकृत” शब्द से ‘अ’ अक्षर हटा दिया गया, जिससे वही शब्द “स्वीकृत” बन गया। इसी छेड़छाड़ के आधार पर करीब 65 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत दर्शाकर राशि का वितरण कर दिया गया।

तीन दिन में आदेश, भरोसे पर सीधा वार

जांच में सामने आया कि बैठक के महज तीन दिन बाद तत्कालीन महाप्रबंधक ने अपने हस्ताक्षर से 65 लाख रुपये का अल्प कृषि ऋण स्वीकृत बताया और बिना किसी पुनः सत्यापन के राशि वितरित करा दी। न कोई आपत्ति, न कोई जवाबदेही, न कोई पारदर्शिता। यहीं से यह मामला केवल घोटाला नहीं रहा, बल्कि सहकारिता की आत्मा पर हमला बन गया।

EOW की FIR: कागज़ों में अपराध, ज़मीन पर विश्वासघात

EOW, जबलपुर ने इस मामले में अपराध क्रमांक 168/2025 के तहत प्रकरण दर्ज किया है। FIR में धोखाधड़ी, कूटरचना, आपराधिक षड्यंत्र और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। यह मामला यह बताने के लिए काफी है कि- जब सिस्टम के भीतर बैठे लोग ही नियम तोड़ें, तो सबसे पहले आम किसान और उपभोक्ता का भरोसा टूटता है।

इन पर दर्ज हुआ मामला (आरोपी अधिकारी)

नरेंद्र कोरी – तत्कालीन महाप्रबंधक, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, मंडला एन.एल. यादव – तत्कालीन स्थापना प्रभारी अतुल दुबे – तत्कालीन लेखापाल एवं पंजी फील्ड कक्ष प्रभारी शशि चौधरी – प्रबंधक, अल्प बचत साख सहकारी समिति, मंडला

गैर सदस्यों से भी अवैध वसूली, अनियमितता की जड़ें गहरी

जांच में यह भी सामने आया कि बाद के वर्षों में समिति के गैर सदस्यों से 26.68 लाख रुपये की राशि अवैध रूप से प्राप्त की गई। यह तथ्य दर्शाता है कि गड़बड़ियां किसी एक अवधि तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सहकारी व्यवस्था में गहराई तक पैठ बना चुकी थीं।

कानूनी धाराएं 

इस मामले में आरोपियों के विरुद्ध निम्न धाराओं में FIR दर्ज की गई है— धारा 409 – आपराधिक न्यास भंग धारा 420 – धोखाधड़ी धारा 467, 468, 471 – कूटरचना व जाली दस्तावेजों का उपयोग, धारा 120बी – आपराधिक षड्यंत्र भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 2018 की धारा 7(सी)

भरोसा नहीं, मजबूरी में चल रही सहकारिता

आज स्थिति यह है कि किसान और उपभोक्ता सहकारी बैंकों से भरोसे के कारण नहीं, बल्कि मजबूरी में लेन-देन कर रहे हैं। जहां सहकारिता को सुरक्षा और सहयोग का माध्यम होना था, वहां अब फाइलों, हस्ताक्षरों और स्वीकृतियों पर संदेह की छाया है।

पुराना मामला, लेकिन सवाल आज भी जिंदा

यह मामला भले ही वर्षों पुराना हो, लेकिन यह आज भी यह सवाल खड़ा करता है कि— क्या दोषियों को समय पर सजा मिलेगी?  क्या सहकारी संस्थाओं में पारदर्शिता लौटेगी? या फिर ऐसे घोटाले हर कुछ साल में नए नामों के साथ सामने आते रहेंगे? जब तक जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक यह मानना पड़ेगा कि- सहकारिता में भरोसे की हत्या कोई अपवाद नहीं, बल्कि सिस्टम की सच्चाई है। https://www.independentkhabar.com/news/chhattisgarh/65-lakh-scam-fir-against-the-in-charge-of-paddy-procurement-center

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