वक्फ में भ्रष्टाचार से विश्वास का संकट पैदा हुआ, संशोधन आवश्यक – मंजूर रजा कादरी
अभी तक पसमांदा मुस्लिमों की हुई उपेक्षा होते रही नये बिल से अधिकार मिलने की संभावना
Seoni 26 February 2025
सिवनी यशो: – वक्फ (संशोधन) विधेयक की जांच कर रही संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) ने गुरुवार 30 जनवरी, 2025 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपनी रिपोर्ट सौंप दी। रिपोर्ट में, जेपीसी ने कुछ संशोधन सुझाए हैं, उनमें से एक वक्फ की निर्णय लेने की प्रक्रिया में वंचित और पिछड़े मुसलमानों या पसमांदा मुसलमानों को शामिल करना सुनिश्चित करना है। वक्फ अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन, जैसा कि हाल के घटनाक्रमों में उजागर हुआ है, का उद्देश्य भारत में वक्फ प्रणाली के भीतर कई लंबे समय से चल रहे मुद्दों को संशोधित करना है। पिछला अधिनियम वक्फ संपत्तियों के शासन और लाभों में पसमांदा मुसलमानों, या पिछड़े मुसलमानों के प्रतिनिधित्व का ध्यान नही दिया गया था, इस समुदायो को हाशिए रखा गया और वक्फ प्रणाली में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार को देखते हुये नया संशोधन बिल लाना पड़ रहा है । हालांकि, वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन पर अक्सर भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और हाशिए पर पड़े मुस्लिम समुदायों को बाहर रखे जाने के आरोप लगते रहे हैं। अवैध अतिक्रमण, अनधिकृत बिक्री और वक्फ भूमि के दुरुपयोग की खबरें लगातार आती रही हैं, जिससे व्यवस्था से भरोसा खत्म होता जा रहा है। प्रस्तावित संशोधन, जैसे दावों का समर्थन करने के लिए संपत्ति के दस्तावेजों की आवश्यकता और वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना, अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में कदम हैं।
गरीब मुस्लमानों को वक्फ बोर्डो में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाये
भारत में मुस्लिम आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने वाले पसमांदा मुसलमानों को ऐतिहासिक रूप से सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक जीवन के हाशिये पर धकेल दिया गया है। अपनी संख्यात्मक ताकत के बावजूद, वे वक्फ संपत्तियों के प्रशासन में कम प्रतिनिधित्व वाले हैं, जो अक्सर मुस्लिम समुदाय के अधिक विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों द्वारा नियंत्रित होते हैं। इस बहिष्कार ने पसमांदा मुसलमानों के बीच गरीबी और वंचितता के चक्र को कायम रखा है। वक्फ बोर्डों में प्रतिनिधित्व की कमी का मतलब है कि पसमांदा मुसलमानों की विशिष्ट जरूरतों और चिंताओं को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इससे ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि वक्फ संपत्तियां, जो पूरे मुस्लिम समुदाय की सेवा के लिए हैं, अनुपातहीन रूप से अभिजात वर्ग को लाभान्वित कर रही हैं, जबकि हाशिए पर रहने वाले लोग बुनियादी सुविधाओं और अवसरों के लिए संघर्ष करना जारी रखते हैं। इन असमानताओं को दूर करने के लिए, यह जरूरी है कि प्रस्तावित वक्फ संशोधन विधेयक में वक्फ संपत्तियों के प्रशासन में पसमांदा मुसलमानों को शामिल करने के प्रावधान शामिल हों।
इसे निम्नलिखित उपायों के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है
संशोधन में राज्य और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर वक्फ बोर्डों में पसमांदा मुसलमानों के लिए सीटों के आरक्षण को अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि उनकी आवाज़ सुनी जाए और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में उनके हितों का प्रतिनिधित्व किया जाए। विधेयक में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और उपयोग के लिए सख्त दिशा-निर्देश पेश किए जाने चाहिए, जिसमें यह सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि इन संसाधनों का उपयोग मुस्लिम समुदाय के सभी वर्गों, विशेष रूप से हाशिए पर पड़े लोगों के लाभ के लिए किया जाए। वक्फ संपत्तियों का नियमित ऑडिट स्वतंत्र निकायों द्वारा किया जाना चाहिए, जिसमें पसमांदा मुस्लिम प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी हो। इससे भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के मामलों की पहचान करने और उन्हें संबोधित करने में मदद मिलेगी।
वक्फ संपत्तियों से उत्पन्न आय का एक हिस्सा पसमांदा मुसलमानों के उत्थान के उद्देश्य से शैक्षिक और आर्थिक पहलों के लिए निर्धारित किया जाना चाहिए। इसमें छात्रवृत्ति, व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम और छोटे व्यवसाय अनुदान शामिल हो सकते हैं। वक्फ शासन में पसमांदा मुसलमानों को शामिल करना न केवल सामाजिक न्याय का मामला है, बल्कि भ्रष्टाचार को दूर करने और व्यवस्था में विश्वास पैदा करने की दिशा में एक व्यावहारिक कदम भी है। हाशिए पर पड़े समुदाय, जब सशक्त होते हैं, तो वे निगरानीकर्ता के रूप में कार्य कर सकते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि संसाधनों का पारदर्शी और समान रूप से उपयोग किया जाता है। उनकी भागीदारी वक्फ व्यवस्था के सामने आने वाली चुनौतियों के लिए नए दृष्टिकोण और अभिनव समाधान ला सकती है। पसमांदा मुसलमानों को शामिल करना समानता और न्याय के व्यापक सिद्धांतों के साथ संरेखित होगा जो इस्लामी शिक्षाओं को रेखांकित करते हैं। यह मुस्लिम समुदाय के सभी सदस्यों के कल्याण के लिए प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करेगा, चाहे उनकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।
वक्फ अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन उन प्रणाली गत मुद्दों को संशोधित करने का अवसर प्रदान करते हैं, जो दशकों से वक्फ प्रणाली को परेशान कर रहे हैं। हालाँकि, इन सुधारों को वास्तव में प्रभावी बनाने के लिए, उन्हें पसमांदा मुसलमानों के समावेश और प्रतिनिधित्व की पुष्टि करनी चाहिए। ऐसा करके, सरकार यह सुनिश्चित कर सकती है कि वक्फ संपत्तियों का लाभ समान रूप से वितरित किया जाए, और मुस्लिम समुदाय के हाशिए पर पड़े वर्गों को सम्मान जनक और संतुष्ट जीवन जीने का अधिकार दिया जाए। भारत जैसे विविधतापूर्ण और बहुलतावादी समाज में, यह आवश्यक है कि सभी समुदायों, विशेष रूप से हाशिए पर पड़े लोगों को सार्वजनिक संसाधनों में भाग लेने और उनसे लाभ उठाने का उचित अवसर दिया जाए। वक्फ शासन में पसमांदा मुसलमानों को शामिल करना केवल एक कानूनी या प्रशासनिक सुधार नहीं है; यह एक नैतिक अनिवार्यता है जो न्याय, समानता और समावेशिता के मूल्यों को दर्शाती है।



