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आस्था और धर्म बहुत संवेदनशील विषय, इन पर सामान्य व्यक्ति का बोलना उचित नहीं

आपकी बात पर समाज विश्वास करता है तो जिम्मेदारी का परिचय भी देना आपका दायित्व है

     जब हम समाज के बीच कोई जिम्मेदारी वाला काम करते है और हमारे व्यवहार से एक बड़ा समाज प्रभावित होता है तब ऐसे दायित्वों का निर्वाह बहुत जिम्मेदारी से करने की आवश्यकता होती है यहाँ हमारी व्यक्तिगत आत्म संतुष्टि का कोई स्थान नहीं होता और व्यक्तिगत संतुष्टि के बारे में विचार करने से समाज का बड़ा अनर्थ भी होता है । समाज के बड़े अनर्थ को रोकने के लिये कुछ सगे संबंधियों को भी संतुष्ट करने की मानसिकता का परित्याग करना ही अपना प्रथम कत्तव्र्य मानना चाहिये ।
समाज का बड़ा वर्ग यदि आपकी बात पर विश्वास करता है तो इसे अपना सौभाग्य समझना चाहिये और विश्वास को अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी समझना चाहिये अपनी विश्वसनीयता को बचाये रखने के लिये पूरी जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिये । आप पर विश्वास किया जा रहा है तो इस बात का पूरा ध्यान भी रखना चाहिये कि आपकी बात से समाज में कोई अनिष्ठ न हो, समाज के अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति की प्रतिष्ठिा पर आँच तो नहीं आ रही है, यह चिंता होना चाहिये । आपकी बात से कोई विद्रोह की स्थिती तो नहीं बन जायेगी इन सभी बातो पर बहुत विचार किया जाना चाहिये । बात बोलते और लिखते समय सावधानी होना चाहिये किसी बात को लिखने से पहले सौ बार विचार करना चाहिये कि कहीं आपके शब्द किसी बड़े अहित का कारण तो नहीं बन जायेंगे । जिस बात को आप बोल रहे है वह जानकारी किन माध्यमों से प्राप्त हो रही है जानकारी देने वाले का हेतु क्या है ?
पिछले दिनों शांति प्रिय जिले में दो संतो का आगमन हुआ दोनो ही संत श्रद्धा के केन्द्र है संभव है दोनों के बीच आपसी मतभेद हो । ऐसी काल्पनिक संभावनाओं को समझते हुये कुछ स्वार्थी तत्व अपने राजनैतिक लाभ और आत्मसंतुष्टि के लिये स्थान तालश रहे है ऐसी घृणित मानसिकता उचित नहीं है । दोनों संतो की स्वीकार्यता समाज के बड़े वर्ग के बीच है । संत संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिये कार्य करते है और वे समाज को धर्म के माध्यम से दिशा देकर श्रेष्ठ समाज निर्माण के लिये कार्य करते है । उनके तरीके भिन्न हो सकते है, उनके मार्ग भिन्न हो सकते है, विधियाँ भिन्न हो सकती है परंतु सभी श्रेष्ठ समाज के निर्माण के लिये यत्न करते है । उनके असंख्य अनुयायी होते है अनेक ऐसे भक्त होते है जो पूज्य संत के विरूद्ध कुछ भी सुनने को तैयार नहीं रहते इन सारी परिस्थितियों पर बोलने, लिखने तथा अपनी प्रतिक्रिया देते समय गंभीरता से विचार करना चाहिये । सभी संत अपनी धार्मिक संस्कृति और संस्कारों की रक्षा करने के लिये पूरा जीवन समाज को समर्पित करते है उनके प्रति आदर का भाव संपूर्ण समाज में करोड़ो वर्षो से बना हुआ है।
सिवनी की पावन धरा पर पिछले दिनों आये संतो के संबंध में कुछ विश्वनीय माध्यमों ने जो बाते समाज के बीच प्रसारित की वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं थी। इस प्रकार की बातो से समाज की शांति भी भंग हो सकती थी और आज भी समाज के बीच इन सूचना माध्यमों की खबरों से आक्रोश और असंतोष का वातावरण बना हुआ है । इस प्रकार की खबरों से कुछ स्वार्थी तत्व अपने स्वार्थ तलासते रहते है और कुछ अपनी आत्म संतुष्टि के लिये बात का बतंगड बनाते रहते है । विश्वसनीय माध्यमों को धार्मिक और समाज स्वीकार्य विषयों पर अनावश्यक बातो का सार्वजनिक प्रचार से बचना चाहिए । इस प्रकार की खबरे चर्चा में बने रहने के उद्देश्य की पूर्ति तो कर सकती है और कुछ व्यक्तियों की आत्मसंतुष्टि तथा राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने में सहायक हो सकती है परंतु ऐसी खबरों से अशांति फैलने की संभावना रहती है कानून व्यवस्था के लिये चुनौती भी बन सकती है ।
संवेदनशील धार्मिक विषयों, मान्य परंपराओं, सामाजिक आस्था से जुड़े विषयों पर अनावश्यक बोलने लिखने से बचना चाहिये अनेक मान्यताएँ और परंपराएँ ऐसी है जिसे कानून की दृष्टि से उचित नहीं माना जाता परंतु उन्हें समाज स्वीकार करता है वे चलती रहती है उन्हें कानून के माध्यम से भी नहीं रोका जाता । जहाँ आस्था और धर्म से जुड़े विषय होते है वहाँ कानून भी शिथिल हो जाता है और इस प्रकार की आस्थाओं से आमजनों को असुविधा और उनके कष्टों को कम करने के लिये, कोई अनहोनी न हो इसके लिये प्रशासन पूरी तरह प्रयास करता है परंतु आस्था का पूरा सम्मान हमारे यहाँ की मान्य विधि है । इस मान्य विधि का विरोध करने का किसी को कोई अधिकार भी नहीं है, यह केवल सनातन धर्म के लिये ही नहीं सभी धार्मिक मान्यताओं के लिये है और धार्मिक आस्थाओं को ठेस पहुँचाने वाले व्यक्तियों, संस्थानों पर विधि के अनुसार कार्यवाही भी करने का प्रावधान है । हालांकि सिवनी जिले में सनातन धर्म के संतो के विरोध में जिस तरह से बयानबाजी की गयी यही अन्य किसी पूजा पद्धति से संबंधित विषय पर होती तो मामला बुरी तरह बिगड़ सकता था । आस्था विरोधी बातों से सनातन मान्यताओं के समर्थको को भी गुस्सा आता है परंतु यहाँ समझाने वाले भी पर्याप्त होते है जिससे स्थितियाँ नियंत्रित रहती है परंतु आक्रोश नियंत्रित रखने की कोई जिम्मेदारी भी नहीं ले सकता और हर समय समझदार लोगो की उपस्थिती भी संभव नहीं होती । धार्मिक विषयों एवं आस्थाओं से जुडे विषयो पर बोलने के लिये अधिकार संपन्न धर्माचार्य होते है वह उनका अधिकार क्षेत्र है । किसी के क्षेत्र में अतिक्रमण करना भी ठीक नहीं है ।

Dainikyashonnati

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