मंत्रों की शक्ति से माता-पिता की सेवा तक—शिव महापुराण कथा में सनातन जीवन मूल्यों का संदेश
विधायक दिनेश राय मुनमुन द्वारा आयोजित सात दिवसीय शिव महापुराण कथा के चौथे दिन महंत विपिन बिहारी दास जी महाराज ने सुनाए माता सती, रावण-लंका दहन और दक्ष यज्ञ के प्रसंग
सिवनी में शिव महापुराण कथा: मंत्रों की शक्ति, माता-पिता की सेवा और माता सती का प्रसंग
Seoni 21 August 2026
सिवनी यशो:- पावन श्रावण मास की आध्यात्मिक बेला में भगवान भोलेनाथ की भक्ति से सिवनी विधानसभा क्षेत्र सराबोर है। विधायक दिनेश राय मुनमुन द्वारा राशि लॉन में आयोजित सात दिवसीय भव्य एवं दिव्य संगीतमय शिव महापुराण कथा के चौथे दिन शुक्रवार को सांवरे सरकार गौ पीठाधीश्वर परम पूज्य महंत विपिन बिहारी दास जी महाराज के मुखारविंद से धर्म, भक्ति, साधना, पारिवारिक संस्कार और जीवन मूल्यों का संदेश प्रवाहित हुआ। कथा के दौरान श्रद्धालु भगवान शिव, माता सती, माता पार्वती, भगवान श्रीराम और हनुमान जी के प्रसंगों में भावविभोर दिखाई दिए।

महंत जी ने कहा कि सनातन धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन को संस्कार, संयम, श्रद्धा और सेवा से जोड़ने वाली जीवन पद्धति है। उन्होंने मंत्रों की शक्ति से लेकर माता सती के आत्मसम्मान, भगवान शिव के वैराग्य, रावण को स्वर्ण भवन के दान, हनुमान जी के लंका दहन, दक्ष यज्ञ और माता पार्वती के प्राकट्य तक के प्रसंगों को सरल ढंग से समझाया।
मंत्रों की शक्ति कम नहीं हुई, हमारी श्रद्धा कमजोर हुई
महंत जी ने कहा कि आज लोग पूछते हैं कि पहले मंत्रों में इतनी शक्ति थी तो अब उसका प्रभाव क्यों दिखाई नहीं देता। उन्होंने कहा कि मंत्रों की शक्ति कम नहीं हुई, बल्कि हमारी श्रद्धा, साधना और आचरण कमजोर हुआ है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य आज धन, प्रतिष्ठा और तालियों के पीछे भाग रहा है। धर्म का उद्देश्य बाहरी दिखावे के बजाय मनुष्य को अपनी आंतरिक शक्ति पहचानने और जीवन को संस्कारों से जोड़ने की प्रेरणा देना है।
मंत्र साधना की विधि बताते हुए उन्होंने कहा कि जप के साथ हवन, तर्पण और मार्जन की भी परंपरा है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि एक लाख मंत्रों का जप होने पर उसके दशांश के रूप में दस हजार आहुतियों का हवन तथा आगे तर्पण और मार्जन की प्रक्रिया की जाती है। इन विधियों का उद्देश्य साधक में श्रद्धा, अनुशासन और आध्यात्मिक चेतना विकसित करना है।

माता-पिता से बड़ा संत और भगवान नहीं
प्रवचन में महंत जी ने माता-पिता की सेवा को जीवन का सर्वोच्च धर्म बताते हुए कहा कि मनुष्य सुख की तलाश में अनेक लोगों और साधनों के पीछे भागता है, जबकि उसके जीवन में सबसे बड़े संत उसके पिता और सबसे बड़े भगवान उसकी जन्म देने वाली मां हैं।
उन्होंने कहा कि जिस पिता ने अपनी आवश्यकताओं को पीछे रखकर संतान को आगे बढ़ाया और जिस मां ने अपने सुख-दुख की चिंता किए बिना बच्चे का पालन-पोषण किया, उनके सम्मान और सेवा से बड़ा कोई धार्मिक कार्य नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी संतान को खड़ा करने में लगा दी, इसलिए उनकी मेहनत, त्याग और संघर्ष को कभी नहीं भूलना चाहिए। साथ ही उन्होंने चेताया कि संतान को इतना योग्य बनना चाहिए कि वह सफल हो, लेकिन सफलता के अहंकार में अपने माता-पिता को ही कमतर न समझने लगे।
पिता का त्याग और मां की ममता को याद रखें
महंत जी ने पिता के त्याग का भावुक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि पिता कई बार स्वयं अपनी जरूरतों को रोककर बच्चों की छोटी-छोटी खुशियों के लिए पैसा खर्च करता है। वह स्वयं भूखा रह सकता है, लेकिन बच्चों के चेहरे पर मुस्कान देखने के लिए मिठाई लेकर घर लौटता है।
उन्होंने कहा कि जब कभी माता-पिता के साथ छल या बेईमानी का विचार आए तो अपने बचपन और उनके संघर्ष को याद करना चाहिए। जिस मां ने जीवन की शुरुआत में बच्चे को अपनी गोद में संभाला, उसके जीवन के अंतिम पड़ाव पर संतान का हाथ उसके हाथ में होना चाहिए। माता-पिता की सेवा उनके जीवित रहते करना ही सच्ची श्रद्धा है।
भगवान शिव ने रावण को दान किया स्वर्ण भवन
कथा के क्रम में राजा दक्ष द्वारा माता भगवती की आराधना और माता सती के रूप में उनके प्राकट्य का प्रसंग सुनाया गया। आगे माता सती का विवाह भगवान शिव से हुआ। माता सती के आग्रह पर भगवान शिव ने देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा से भव्य भवन का निर्माण कराया।
भवन की पूजा के लिए रावण को बुलाया गया। पूजा संपन्न होने के बाद भगवान शिव ने रावण से दक्षिणा मांगने को कहा। रावण ने वही स्वर्ण भवन दक्षिणा में मांग लिया और भगवान शिव ने बिना मोह के उसे भवन दान कर दिया।
महंत जी ने कहा कि भगवान शिव के जीवन में किसी वस्तु का मोह नहीं था। यही उनका वैराग्य और उदारता है। उन्होंने दक्षिणा और दान का अंतर समझाते हुए कहा कि धार्मिक कार्य के बाद दी जाने वाली राशि में मेहनत के प्रति सम्मान और अतिरिक्त दान में श्रद्धा एवं कृतज्ञता का भाव निहित होता है।

राम के प्रताप और हनुमान जी के ताप से जली लंका
कथा आगे बढ़ाते हुए हनुमान जी के लंका पहुंचने और रावण द्वारा उनकी पूंछ में आग लगवाने का प्रसंग सुनाया गया। हनुमान जी ने उसी अग्नि को शक्ति बनाकर लंका में चारों ओर अग्नि प्रज्वलित कर दी।
प्रवचन में भक्तिभाव से कहा गया—
“राम के प्रताप ने, सीता के संताप ने, विभीषण के जाप ने, रावण के पाप ने, पूंछ की छाप ने, हनुमान जी के ताप ने लंका भस्म कर दी।”
महंत जी ने कहा कि हनुमान जी ने इस विजय का श्रेय स्वयं नहीं लिया। उनका भाव था—
“सो सब तव प्रताप रघुराई।
नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥”
अर्थात जो कुछ हुआ, वह प्रभु श्रीराम के प्रताप से हुआ।
उन्होंने लंका दहन को मनुष्य के जीवन से जोड़ते हुए कहा कि हर व्यक्ति के भीतर भी क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह और ईर्ष्या की एक लंका है। इन विकारों को समाप्त करने के लिए राम नाम को जीवन का आधार बनाना होगा।
भगवान शिव और अगस्त्य ऋषि के आश्रम का प्रसंग
कथा में भगवान शिव और माता सती के अगस्त्य ऋषि के आश्रम पहुंचने का प्रसंग भी सुनाया गया। अगस्त्य ऋषि द्वारा भगवान श्रीराम की कथा सुनाए जाने के दौरान भगवान शिव अत्यंत श्रद्धा से कथा सुन रहे थे।
माता सती ने जब भगवान शिव को श्रीराम की कथा में तल्लीन देखा तो उनके मन में संशय उत्पन्न हुआ। महंत जी ने कहा कि यहीं से माता सती के मन में संशय का बीज पड़ा। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि भगवान और संतों के विषय में संशय होने पर विनम्रता से समाधान खोजना चाहिए, परीक्षा लेने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
दक्ष यज्ञ में भगवान शिव का अपमान
राजा दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। माता सती ने यज्ञ में जाने की इच्छा जताई। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि जहां निमंत्रण और सम्मान नहीं है, वहां जाना उचित नहीं है, लेकिन माता सती अपने पिता के प्रति मोह के कारण यज्ञ स्थल पहुंचीं।
वहां भगवान शिव के अपमान से व्यथित होकर माता सती ने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए। उनके आत्मदाह का समाचार मिलने पर भगवान शिव क्रोधित हुए और उनकी जटा से वीरभद्र का प्राकट्य हुआ। वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस किया। बाद में भगवान शिव का क्रोध शांत होने पर दक्ष को पुनर्जीवन मिला और उनके धड़ पर बकरे का सिर लगाया गया।
महंत जी ने कहा कि दक्ष के पास पद और प्रतिष्ठा थी, लेकिन अहंकार ने उनका विवेक छीन लिया और यही उनके पतन का कारण बना।
हिमालय जैसी स्थिरता से प्रकट होती है भक्ति
माता सती के बाद पार्वती के रूप में हिमालय के घर जन्म लेने का प्रसंग सुनाते हुए महंत जी ने कहा कि हिमालय स्थिरता, दृढ़ता और ऊंचाई का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य का मन हिमालय की तरह स्थिर हो जाए और भीतर यह भाव जाग जाए कि “मैं कुछ नहीं हूं, जो कुछ है वह ईश्वर है”, तब उसके भीतर श्रद्धा और भक्ति का प्राकट्य होता है।
उन्होंने कहा कि अहंकार के रहते भक्ति स्थिर नहीं हो सकती। मन स्थिर और बुद्धि अहंकार से मुक्त होगी, तभी जीवन में भक्ति का वास्तविक प्राकट्य होगा।
धर्म को कर्मकांड नहीं, जीवन का संस्कार बनाएं
प्रवचन के समापन पर महंत श्री विपिन बिहारी दास जी महाराज ने श्रद्धालुओं से धर्म को केवल कथा, पूजा और कर्मकांड तक सीमित न रखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के आचरण में परिवर्तन लाना है।
उन्होंने माता-पिता की सेवा, परिवार के प्रति जिम्मेदारी, दांपत्य जीवन में सम्मान, गुरु-संतों के प्रति श्रद्धा, अहंकार का त्याग और भीतर के विकारों पर विजय प्राप्त करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मंत्रों की शक्ति, वेद-पुराणों का ज्ञान और भगवान की कृपा आज भी उतनी ही प्रभावशाली है; आवश्यकता अपनी श्रद्धा, साधना और संस्कारों को जागृत करने की है।
अधिवक्ता संघ और कुर्मी समाज ने की आरती
विधायक दिनेश राय मुनमुन द्वारा राशि लॉन में आयोजित संगीतमय शिव महापुराण कथा में दोपहर की आरती अधिवक्ता संघ एवं अन्य श्रद्धालुओं द्वारा की गई। इस अवसर पर अधिवक्ता संघ अध्यक्ष पंकज जैन, सचिव हीरालाल जरगे, श्रीराम बघेल, आशीष सोलंकी, शीतल भलावी, शालनी डहेरिया, ज्योति सनोडिया, सरिता राय, अमित गुप्ता, वेदसिंह ठाकुर, प्रहलाद कोनियापार और ठाकुर महताब सिंह सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे।
वहीं संध्या आरती कुर्मी समाज एवं अन्य श्रद्धालुओं द्वारा की गई। इसमें रमेश सनोडिया, पूर्व सांसद नीता पटेरिया, नरेन्द्र गुड्डू ठाकुर, वीरेन्द्र सोनकेसरिया, प्रदीप राय, नरेश मानाठाकुर, मयूर दुबे, पवन मेंहदीरत्ता, वीरेन्द्र डहेरिया, राजकुमार बमनिया, ददुआ पटेल, घनश्याम पटेल, बद्री सनोडिया, गोपाल सनोडिया, पदम सनोडिया, रुक्मणी सनोडिया, सुनील डहेरिया और उज्जवला सोनदेव सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे।
कथा स्थल पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्ति और भाव से ओतप्रोत प्रवचन का श्रवण किया। श्रावण मास की इस आध्यात्मिक बेला में शिव महापुराण कथा ने श्रद्धालुओं को भक्ति और साधना के साथ-साथ माता-पिता की सेवा, परिवार के सम्मान, आत्मसंयम और अहंकार त्याग जैसे जीवन मूल्यों को आत्मसात करने की प्रेरणा दी।
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