माता-पिता की जीवित रहते सेवा ही सबसे बड़ा तीर्थ : महंत विपिन बिहारी दास जी महाराज
शिव महापुराण कथा के तीसरे दिवस माता-पिता की सेवा, बेटियों के दांपत्य जीवन, गौसेवा, सनातन परंपरा और कन्या सम्मान का दिया संदेश — बोले, मृत्यु के बाद कर्मकांड से अधिक पुण्य जीवित रहते माता-पिता की सेवा में
माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा तीर्थ: महंत विपिन बिहारी दास | शिव महापुराण कथा
Seoni 20 August 2026
सिवनी यशो:- पावन श्रावण मास की आध्यात्मिक बेला में भगवान भोलेनाथ की भक्ति से सिवनी विधानसभा क्षेत्र सराबोर है। विधायक दिनेश राय मुनमुन द्वारा राशि लॉन में आयोजित सात दिवसीय भव्य एवं दिव्य संगीतमय शिव महापुराण कथा के तीसरे दिवस गुरुवार को सांवरे सरकार गौ पीठाधीश्वर परम पूज्य महंत श्री विपिन बिहारी दास जी महाराज के मुखारविंद से धर्म, भक्ति और जीवन मूल्यों का अमृत प्रवाहित हुआ।

कथा के दौरान महाराज श्री ने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि माता-पिता की जीवित रहते सेवा से अधिक पवित्र सेवा कोई दूसरी नहीं है। सारे तीर्थों का फल माता-पिता की सेवा में ही निहित है।
महाराज श्री ने कहा कि माता-पिता जब जीवित हों, तब उनकी सेवा करना ही वास्तविक धर्म और पुण्य है। उनके निधन के बाद केवल कर्मकांड कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि जीवित माता-पिता की सेवा में जो पुण्य मिलता है, वह किसी दिखावे या औपचारिकता से प्राप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि माता-पिता की सेवा को जीवन का सर्वोच्च सौभाग्य समझें और उनके रहते उनके सुख-दुःख में सहभागी बनें।

बेटी के प्रेम में ऐसा कदम न उठाएं, जिससे उसका दांपत्य जीवन प्रभावित हो
महाराज श्री ने माता-पिता और विशेषकर माताओं को बेटियों के विवाह के बाद उनके दांपत्य जीवन को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि बेटी के प्रति मां का प्रेम स्वाभाविक है, लेकिन इस प्रेम में कभी ऐसा हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए जिससे बेटी का वैवाहिक जीवन प्रभावित हो।
उन्होंने माताओं से आग्रह किया कि विवाह के बाद बेटी को ऐसी शिक्षा या सलाह न दें, जिससे उसके जीवन में अनावश्यक तनाव और कष्ट उत्पन्न हो। बेटी को ससुराल में प्रेम, सामंजस्य, समझदारी और परिवार को साथ लेकर चलने की सीख देना ही उसके सुखी दांपत्य जीवन के लिए सबसे उपयोगी है।

पुरखों के मकान ही नहीं, उनकी जीवनशैली भी थी संस्कारों से भरपूर
महाराज श्री ने पुराने समय के ग्रामीण मकानों और जीवनशैली का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारे बुजुर्ग साधन-सुविधाओं में भले ही कम थे, लेकिन अनुभव और जीवन जीने की समझ में बहुत समृद्ध थे। पहले घरों में तहलान, सार और उसके पीछे निवास की व्यवस्था होती थी। घर और गौशाला एक-दूसरे से जुड़े रहते थे।
उन्होंने कहा कि पहले बच्चे गौशाला और सार में नंगे पैर जाते थे, जिससे पैरों में गोबर और गौमूत्र लगता था। यह प्राकृतिक जीवनशैली का हिस्सा था। आज मनुष्य प्रकृति और गौवंश से दूर होता चला गया है। उन्होंने बदलती जीवनशैली पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज परिवारों में बड़ी संख्या में लोग दवाइयों पर निर्भर हैं।
महाराज श्री ने कहा कि हमने अपने घरों से सार खत्म कर दिया और उसके साथ जीवन से प्रकृति एवं पारंपरिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी समाप्त हो गया। उन्होंने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि जीवन में केवल भौतिक विकास ही नहीं, बल्कि पुरखों के अनुभव और संस्कारों को बचाए रखना भी आवश्यक है।
देहरी केवल दरवाजे का हिस्सा नहीं, परंपरा और मर्यादा का प्रतीक
प्रवचन के दौरान महाराज श्री ने पुराने घरों में लगने वाली देहरी की परंपरा का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि पहले दीपावली की रात गांव के विश्वकर्मा समाज के कारीगर घर-घर जाकर दरवाजे की देहरी में एक कील ठोंकते थे। यह परंपरा घर की सुरक्षा, मंगल और समृद्धि की लोक आस्था से जुड़ी थी।
महाराज श्री ने इसी परंपरा को आध्यात्मिक संदेश से जोड़ते हुए कहा कि आज नए मकानों में देहरी का चलन कम होता जा रहा है। उन्होंने भावपूर्ण ढंग से कहा कि जब घर में देहरी नहीं रही तो बीमारी में देरी नहीं रही, अस्पताल जाने में देरी नहीं रही और संकट आने में भी देरी नहीं रही। उन्होंने श्रद्धालुओं को समझाया कि भारतीय परंपराओं में वास्तु और धार्मिक मान्यताओं के पीछे केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन को मर्यादित और संस्कारित रखने का भाव भी रहा है।
उन्होंने कहा कि देहरी में भगवान नृसिंह देव का वास माना जाता है और विश्वकर्मा भगवान से जुड़ी यह परंपरा घर की रक्षा एवं शुभता का प्रतीक रही है।
भगवान भोलेनाथ भांग-गांजे का सेवन नहीं करते थे
शिव महापुराण कथा में महाराज श्री ने भगवान भोलेनाथ से जुड़ी प्रचलित धारणाओं पर भी श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भगवान भोलेनाथ न तो भांग और न ही गांजे का सेवन करते थे। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म को बदनाम करने के लिए भगवान शिव के संबंध में इस प्रकार की बातें प्रचारित की जाती हैं, जिन्हें सनातनियों को समझने और सत्य को जानने की आवश्यकता है।
उन्होंने भगवान शिव के स्वरूप और सनातन परंपरा के वास्तविक आध्यात्मिक संदेश को समझने का आह्वान किया तथा श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि बिना तथ्य जाने किसी भी धारणा को सनातन धर्म का हिस्सा न मानें।
बिल्व पत्र की महिमा और पांच वनस्पतियों की उत्पत्ति का वर्णन
कथा के दौरान महाराज श्री ने पांच वनस्पतियों की उत्पत्ति के विषय में विस्तार से बताते हुए बिल्व पत्र की महिमा का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने भगवान शिव की पूजा में बिल्व पत्र के महत्व को समझाया और श्रद्धालुओं को सनातन परंपरा में प्रकृति एवं वनस्पतियों के आध्यात्मिक महत्व से परिचित कराया।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव की उपासना में श्रद्धा और भाव सबसे महत्वपूर्ण हैं। भक्ति में अर्पित किया गया प्रत्येक पुष्प-पत्र भक्त की आस्था का प्रतीक है।
काशी विश्वनाथ और राम नाम की महिमा से भावविभोर हुआ कथा पंडाल
महाराज श्री ने कथा में काशी विश्वनाथ की महिमा का भी भावपूर्ण उल्लेख किया। उन्होंने काशी की आध्यात्मिक महत्ता और भगवान विश्वनाथ के प्रति सनातन आस्था को श्रद्धालुओं के सामने रखा।
इसी क्रम में उन्होंने राम नाम की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान का नाम मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी आध्यात्मिक शक्ति है। नाम स्मरण से मनुष्य का अंतर्मन निर्मल होता है और जीवन को सही दिशा मिलती है। कथा पंडाल में जब भगवान के नाम का संकीर्तन हुआ तो वातावरण भक्तिमय हो उठा।
नौ वर्ष तक की कन्या में जात-पांत का भेद न करें
प्रवचन का एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश कन्या सम्मान और सामाजिक समरसता को लेकर रहा। महाराज श्री ने कहा कि घर में कन्या भोजन कराते समय कभी भी नौ वर्ष से छोटी बच्ची के साथ जात-पांत का भेदभाव नहीं करना चाहिए।
उन्होंने नवरात्र की नवदुर्गा परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि नौ वर्ष तक की कन्या को देवी स्वरूप माना गया है। इसलिए किसी बालिका को उसकी जाति या समाज के आधार पर अलग-अलग सम्मान देना सनातन की भावना के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने कहा कि यदि एक समाज की बच्ची को घर के भीतर सम्मान से बैठाया जाए और दूसरी समाज की बच्ची को जाति के आधार पर बाहर कर दिया जाए तो यह धार्मिक भावना और मानवीय संवेदना दोनों के विपरीत है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि कन्या में जाति नहीं, देवी का स्वरूप देखें।
चैतन्य महाप्रभु के प्रसंग से समझाई संत संग और सत्संग की महिमा
कथा के दौरान महाराज श्री ने चैतन्य महाप्रभु के प्रसंग के माध्यम से संतों की महिमा और सत्संग का महत्व भी समझाया। उन्होंने कहा कि जिस घर में संत-महापुरुषों का आगमन होता है, वह घर केवल भवन नहीं रहता, बल्कि संस्कार और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से भगवान के नाम का स्मरण करने, संतों का संग करने और अपने जीवन को सद्कर्म एवं भक्ति से जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन मिला है तो उसका अंतिम सत्य मृत्यु है, इसलिए जीवन रहते भगवान का नाम, माता-पिता की सेवा, संतों का संग और सद्कर्म ही मनुष्य की वास्तविक पूंजी हैं।
कश्यप समाज की सहभागिता
शिव महापुराण कथा के तीसरे दिवस दोपहर की आरती कश्यप समाज की ओर से पूर्ण श्रद्धा, भक्ति भाव एवं उत्साह के साथ संपन्न की गई। इस अवसर पर गंगाचरण कश्यप जी अध्यक्ष, जमुना प्रसाद कश्यप जी, राजू कश्यप जी, रामलाल कश्यप जी, शनि कश्यप जी, बलराम कश्यप जी, राजकुमार कश्यप जी, संजू कश्यप जी, शत्रुघ्न कश्यप जी एवं मंगू कश्यप जी सहित समाजजनों ने आरती में सहभागिता की।
इस अवसर पर धीरजसिंह भलावी जी, आरती राय जी, किशनलाल चौरसिया जी, अशोक अकेला जी, राकेश राय जी एवं श्रीराम नामदेव जी सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।
संध्या आरती में श्रद्धालुओं ने लिया भगवान शिव का आशीर्वाद
संध्या आरती श्रीमती मीना बिसेन जी जिलाध्यक्ष भाजपा, वैभव पवार जी पूर्व प्रदेशाध्यक्ष भाजयुमो, राकेश पाल जी पूर्व विधायक, गजानंद पंचेश्वर जी, मुकेश बघेल जी, संतोष नगपुरे जी, दीपक निगम जी उपाध्यक्ष जनपद पंचायत लखनादौन, अजय पांडे जी, नवनीत सिंह ठाकुर जी, अभिषेक दुबे जी, युवराज सिंह राहंगडाले जी, डॉ. प्रमोद राय जी, आनंद शर्मा जी, तरुण मुनिया टांक जी, राजू यादव जी, मनोज नामदेव जी, बृजेश राजपूत जी, घनश्याम बघेल जी जिला उपाध्यक्ष किसान मोर्चा, ओम राजपूत जी एवं शंकरलाल उट्टी जी द्वारा पूर्ण श्रद्धा, भक्ति भाव एवं उत्साह के साथ की गई।
शिव महापुराण कथा दे रही धर्म के साथ जीवन को संस्कारित करने का संदेश
सात दिवसीय शिव महापुराण कथा के तीसरे दिवस महंत श्री विपिन बिहारी दास जी महाराज ने श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि सनातन धर्म केवल पूजा-पाठ और कर्मकांड का विषय नहीं, बल्कि माता-पिता की सेवा, परिवार में प्रेम, बेटियों के सुखी जीवन की चिंता, गौसेवा, प्रकृति के प्रति सम्मान, कन्या का आदर और समाज में समरसता स्थापित करने की जीवन पद्धति है।
कथा पंडाल में हर-हर महादेव और भगवान शिव के जयकारों के बीच श्रद्धालु भक्ति में डूबे रहे। श्रावण मास की इस पावन बेला में आयोजित शिव महापुराण कथा सिवनी के वातावरण को आध्यात्मिकता से भरने के साथ समाज को यह प्रेरणा भी दे रही है कि माता-पिता की सेवा जीवित रहते करें, भगवान का नाम जीवन का आधार बनाएं और प्रत्येक कन्या में मां भगवती का स्वरूप देखें।
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