*हमेशा मनुष्य परमात्मा(ऊपरवाले)* *से शिकायत करता है* *परंतु नीचे की गई कुछ* *व्याख्या में ऊपर वाला मनुष्य से* *कुछ शिकायत कर रहा है*
वह कहते हैं कि मैं ऊपरवाला बोल रहा हूं, जिसने यह पूरी दुनिया बनाई वह ऊपरवाला हमेशा तुम मेरी शिकायत करते हो आज मैं कुछ शिकायत कर रहा हूं
तुमसे घर का ध्यान तुम नहीं रखते और चोरी हो जाए तो तुम कहते हो ऊपरवाला तुमने यह क्या किया,
गाड़ी तुम तेज चलाते हो और धक्का लग जाए तो कहते हो हे ऊपरवाले यह तूने क्या किया,
पढ़ाई तुम नहीं करते और फेल हो जाते हो तो कहते हो उपरवाला,
ऐसा लगता है इस दुनिया में होने वाले हर गलत काम के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं और आजकल तो एक नया फैशन शुरू हो गया है जो काम तुम नहीं कर सकते हो ऐसा कहते हो कि आप(ऊपरवाला) भी यह काम नहीं कर सकते,
यह कहते हो की ऊपरवाला भी भ्रष्टाचार नहीं मिटा सकता,
ऊपरवाला भी महंगाई नहीं रोक सकता है,
यह सब क्या है क्या?
भ्रष्टाचार किसने बनाया?
क्या मैंने?
किससे रिश्वत लेते देखा तुमने मुझे? मैं तो हवा, पानी, धूप, आदि सबके लिए बराबर ही देता हूं, कभी देखा क्या कि ठंड के दिनों में किसी अमीर आदमी के घर पर मैंने तेज धूप करदी हो और गर्मी के दिन में सिर्फ उसके घर में ही बारिश कर रहा हूं, उल्टा तुम मेरे पास आते हो रिश्वत की पेशकश लेकर कभी लड्डू, कभी पेड़े, कभी चादर और मेरे नाम पर तुम पूरा डब्बा तो खरीदते हो लेकिन एक टुकड़ा मुझ पर चढ़ाते हो बाकी तुम खुद खा जाते हो,
यह महंगाई किसने बनाई? क्या मैंने? मैंने सिर्फ जमीन बनाई उसे प्लॉट बनाकर बेचा तुमने, मैंने जानवर बनाएं उन्हें मवेशी बनाकर बेचा किसने? मैंने पेड़ बनाएं उन्हें लकड़ी के कर काटा और बेचा किसने?
मैंने तो इंसान को बनाया लेकिन धर्म, जाति यह सब किसने बनाएं मैंने?
आज तक तुम्हें कोई वस्तु नहीं बेची, किसी वस्तु का पैसा नहीं लिया, सब चीजों में कसूर तुम मेरा निकालते हो अभी भी समय है सुधर जाओ वरना फिर मत कहना यह प्रलय क्यों आए।



