एक नमूना उन लोगों का हैं जो परिश्रम करके धन कमाते रहते हैं, जोड़-जोड़ कर जमा करते रहते हैं और उपयोग में नहीँ लेते। ऐसे कंजूस लोग उस धन के मालिक नहीँ, महज चौकीदार ही होते हैं।
कुछ लोग इस विचार से मेहनत करके धन इकट्ठा करते रहते हैं कि बुढ़ापे में चैन से जीवन-निर्वाह कर सकें, लेकिन ज्यादातर होता यह हैं कि या तो वे बुढ़ापे तक पहुँच ही नहीँ पाते या फिर बुढ़ापे में इस लायक ही नहीँ रह पाते कि कोई भी सुख भोग सके, बुढ़ापे से पहले हाई ब्लड प्रेशर, शुगर, आदि रोगों की चपेट में पीसने से उनका शरीर इतना जर्जर और निर्बल हो चुका होता हैं कि जीवन का बोझ उठाने में असमर्थ हो जाता हैं और ऐसे में दिल का दौरा पड़ जाये तो हंस उड़ जाता हैं।
दूसरा नमूना उन लोगों का हैं जो विद्या पढ़ते हैं, ज्ञान प्राप्त करते हैं पर उस पर आचरण नही करते। “उच्च विचार नीच करतूत” के अनुसार बातें तो वे बड़ी ऊँची-ऊँची करते हैं, पर आचरण करने के मामले में बडे आलसी और अकर्मण्य बने रहते हैं।
धन के होते हुए भी उसका सदुपयोग न करे और ज्ञान होते हुए भी उस पर अमल न करें-ऐसे लोग मूर्खता के नमूने ही होते हैं।



