✍️ लेखक: मनोज मर्दन त्रिवेदी
भारतीय सनातन संस्कृति और सभी प्रमुख राजनैतिक विचारधाराओं का मूल उद्देश्य हमेशा से यही रहा है – समाज के हर उस वर्ग की चिंता करना जो विकास की मुख्यधारा से पिछड़ गया है। सनातन धर्म का मूल भाव केवल पूजा या अनुष्ठान नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के कल्याण की पवित्र भावना है।

प्रात: ईश्वर का स्मरण करते समय अपने कर्मों का चिंतन, दिनभर के कार्यों में हुई भूलों के लिए क्षमा याचना, और संध्या के समय यह देखना कि कहीं किसी को दु:ख या तकलीफ़ तो नहीं हुई — यही सनातन धर्म का सच्चा स्वरूप है। सनातन में आरती का तात्पर्य ईश्वर को साक्षी मानकर आर्तभाव से दिन भर के कार्यों में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगना और उसके पश्चात प्रदक्षिणा, प्रदक्षिणा का तात्पर्य गोल-गोल घूमना नहीं, बल्कि अपने पास-पड़ोस में यह देखना है कि कोई दुखी तो नहीं? किसी को मदद की ज़रूरत तो नहीं? और उसकी मदद कैसे की जा सकती है।
यह मानवीय संवेदना का धर्म है, और इसी प्रकार की भावना अन्य धर्मों के मूल सिद्धांतों में भी है। राजनीति का भी यही मूल उद्देश्य था – हर व्यक्ति का कल्याण, हर वर्ग का उत्थान।
परंतु दुर्भाग्य से, समय के साथ न तो धर्म की परिभाषा शुद्ध रही और न राजनीति अपने आदर्शों पर कायम रह सकी।
आरक्षण का उद्देश्य: समानता, न कि विभाजन
1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, जब भारत ने लोकतंत्र को अपनाया, तब संविधान निर्माताओं ने पिछड़े और वंचित वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ने हेतु आरक्षण का प्रावधान किया।
यह कोई दया नहीं, बल्कि अधिकार था – उस वर्ग का जो सदियों तक अवसरों से वंचित रहा।
संविधान ने इसके लिए दस वर्षों की अवधि निर्धारित की थी, परंतु यथार्थ में यह समय पर्याप्त नहीं था।
आज भी देश के अनेक हिस्सों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की स्थितियाँ संतोषजनक नहीं हैं।
इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि आरक्षण की आवश्यकता आज भी उतनी ही है,
बल्कि बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में और अधिक प्रासंगिक हो गई है।
जब तक एक भी व्यक्ति विकास की दौड़ से पीछे है, तब तक देश वास्तव में मज़बूत नहीं कहा जा सकता।
इसलिए आरक्षण केवल सरकार की नीति नहीं,
बल्कि हर नागरिक का नैतिक दायित्व है कि-
वह समाज के कमज़ोर वर्ग को ऊपर उठाने में सहयोग दे।
राजनीति ने उद्देश्य भुलाया, और पैदा कर दी खाई
आज़ादी के बाद आरक्षण का लाभ कई स्तरों तक पहुँचना चाहिए था,
लेकिन यह अक्सर कागज़ों में सिमट कर रह गया।
राजनैतिक दलों ने इस विफलता को छिपाने के लिए संपन्न वर्गों को दोषी ठहराने और
समाज में वर्ग संघर्ष पैदा करने की परंपरा शुरू कर दी।
नेताओं ने दलितों के घर भोजन कर ‘समरसता’ का दिखावा तो किया,
परंतु उनकी आर्थिक,
शैक्षणिक और
सामाजिक स्थिति सुधारने के ठोस प्रयास नहीं किए।
राजनीति का यह “छद्म करुणा अभियान” केवल वोट बैंक तक सीमित रह गया।
वास्तव में ज़रूरत इस बात की है कि जिन्हें “दलित” कहकर राजनीति की जाती है,
उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जाए।
आर्थिक सक्षमता के साथ सामाजिक,
राजनीतिक और शैक्षणिक सशक्तिकरण स्वत: आ जाएगा।
जाति नहीं, परिस्थिति थी
यह मानना भूल होगी कि जातीय भेद या छुआछूत हमेशा से समाज की प्रवृत्ति रही है। वह एक परिस्थितिजन्य व्यवस्था थी — जब पेशे, खानपान और कामकाज सभी के अलग-अलग थे। उस युग में सम्मान सभी का था; असमानता नहीं, बल्कि व्यवस्था थी।
आज जब समाज आधुनिक है, तब यह आवश्यक है कि सरकारें और राजनीतिक दल अपने पुराने पाखंड त्यागें और आरक्षण को उसके वास्तविक उद्देश्य — विकास और समान अवसर — की दिशा में लागू करें।
निष्कर्ष
आरक्षण अधिकार है — लेकिन राजनीति और पाखंड ने इसे संवेदनशील मुद्दे से विवादास्पद विषय बना दिया है। अब समय है कि समाज, सरकार और प्रत्येक नागरिक आत्ममंथन करे — क्या हम आरक्षण को उत्थान का साधन बना रहे हैं या वोट का हथियार?
आरक्षण जारी रहे — पर पाखंड समाप्त होना चाहिए।



