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प्रेरक प्रसंग – एक चरवाहे की संवेदनशीलता के सामने बौने होगये आईएएस टी एन शेषन

जानिये आखिर एक चरवाहे की किस बात पर फटी की फटी रह गई थीं टी एन शेषन की आंखें

सोशल मीडिया पर दैनिक यशोन्नति के शुभचिंतक पाठक ने एक ऐसा प्रेरक प्रसंग साझा किया है जो संपूर्ण मानव जाति के लिये उपयोगी लगा और इसका प्रकाशन प्रेरणादायक हो सकता है । आप सभी पाठको को यह प्रसंग बहुत अच्छा लगेगा ऐसा मानकर इसे प्रकाशित किया जा रहा है ।
यहाँ बता दें कि भारत के एक बहुत चर्चित मुख्य आयुक्त रहे टी. एन. शेषन जिन्होंने चुनाव सुधार की दिशा में अनेक ऐतिहासिक कदम उठाये 1990 से 1996 के इनके कार्यकाल में चुनाव आयोग की वास्तविक शक्तियाँ क्या होती है यह उन्होंने बताया इनके कार्यकाल में राजनैतिक दल के नेता उनसे भयभीत रहते थे। चुनावी खर्च की सीमा और अनेक तरह की मनमानियों पर रोक और समय के साथ सुधार का क्रम इन्हीं के समय प्रारंभ हुआ । यह प्रसंग भी उन्हीं के जीवन से जुड़ा हुआ है ।

यह बात उस समय है कि जब टी एन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तब एक बार वे मसूरी की यात्रा पर थे । उनके साथ उनकी पत्नी भी थीं। उत्तर प्रदेश से निकलते समय रास्ते में एक बाग के पास वे लोग रुके। बाग के पेड़ पर (गौरैया चिडिय़ा) बया पक्षियों के घोंसले थे। उनकी पत्नी ने कहा, दो घोसले मंगवा दीजिए मैं इन्हें घर की सज्जा के लिए घर में टांगूगी। उन्होंने साथ चल रहे सुरक्षा कर्मियों से घोसला लाने के लिए कहा। सुरक्षा कर्मी वहीं पास में गाय चरा रहे एक बालक से पेड़ पर चढ़कर घोसला लाने के बदले दस रुपये देने की बात कही, लेकिन वह लड़का घोसला तोड़ कर लाने के लिए तैयार नहीं हुआ। टी एन शेषन ने उसे दस की जगह पचास रुपए देने की बात कही। फिर भी वह लड़का तैयार नहीं हुआ।
शेषन सुरक्षा में चल रहे जवानों ने लड़के को धमकी दी और उसे बताया कि साहब जज़ हैं और तुझे जेल में भी डलवा सकते हैं। गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।*
*लड़का तब श्रीमती और श्री शेषन के पास गया और कहा,- साहब, मैं ऐसा नहीं कर सकता। उन घोंसलों में गौरैया के छोटे बच्चे हैं अगर मैं आपको दो घोंसले दूं, तो जो गौरैया अपने बच्चों के लिए भोजन की तलाश में बाहर गई हुई है, जब वह वापस आएगी और बच्चों को नहीं देखेगी तो बहुत दु:खी होगी जिसका पाप मैं नहीं ले सकता।
जिंदगी भर चरवाहे की बात सोचते रहे
इस घटना के बाद टी.एन. शेषन को आजीवन यह ग्लानि रही कि जो एक चरवाहा बालक सोच सका और उसके अन्दर जैसी संवेदनशीलता थी, इतने पढ़े-लिखे और आईएएस होने के बाद भी वे वह बात क्यों नहीं सोच सके, उनके अन्दर वह संवेदना क्यों नहीं उत्पन्न हुई? उन्होंने कहा उस छोटे बालक के सामने मेरा पद और मेरा आईएएस होना गायब हो गया। मैं उसके सामने एक सरसों के बीज के समान हो गया। शिक्षा, पद और सामाजिक स्थिति मानवता के मापदण्ड नहीं हैं।

अनपढ़ की बात सुनकर श्री टी.एन. शेषन दंग रह गए

श्री शेषन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- मेरी स्थिति, शक्ति और आईएएस की डिग्री सिर्फ उस छोटे, अनपढ़, मवेशी चराने वाले लड़के द्वारा बोले गए शब्दों के सामने पिघल गई। “पत्नी द्वारा घोंसले की इच्छा करने और घर लौटने के बाद, मुझे उस घटना के कारण अपराध बोध की गहरी भावना का सामना करना पड़ा
जरूरी नहीं कि शिक्षा और महंगे कपड़े मानवता की शिक्षा दे ही दें। यह आवश्यक नहीं हैं, यह तो भीतर के संस्कारों से पनपती है। दया, करूणा, दूसरों की भलाई का भाव, छल कपट न करने का भाव मनुष्य को परिवार के बुजुर्गों द्वारा दिये संस्कारों से तथा अच्छी संगत से आते है अगर संगत बुरी है तो अच्छे गुण आने का प्रश्न ही नही है।
साभार

 

Dainikyashonnati

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