कान्हा में बाघों की मौत पर पर्दा? ‘प्रेस नोट’ की खामोशी में दबते सवाल
एक महीने में कई बाघों की मौत, ‘केनाइन डिस्टेंपर’ का खतरा; लेकिन जमीनी सच्चाई तक पहुंचने से रोका जा रहा मीडिया
कान्हा नेशनल पार्क में बाघों की मौत – “बाघ आंकड़े नहीं, विरासत हैं—और विरासत पर सवाल उठेंगे, तो जवाब भी देना होगा।”
Mandla 06 May 2026
मंडला यशो:- कान्हा नेशनल पार्क में बाघों की मौत इन दिनों एक नया ‘ईको-सिस्टम’ विकसित होता नजर आ रहा है—जहां बाघों की दहाड़ से ज्यादा ‘प्रेस नोट’ की गूंज सुनाई देती है। घटनाक्रम पर नजर डालें तो तस्वीर बेहद चिंताजनक है।
5 अप्रैल को सरही रेंज में एक बाघिन की मौत हुई। इसके बाद 21 से 29 अप्रैल के बीच एक और बाघिन तथा उसके चार शावकों की मौत हो गई। 24 अप्रैल को मंडला-बालाघाट सीमा के सरगी क्षेत्र में एक बाघ का शव मिला, जबकि 4 मई को किसली क्षेत्र में एक और बाघ मृत पाया गया। इतने कम समय में लगातार कान्हा नेशनल पार्क में बाघों की मौत ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इसके बावजूद हालात ऐसे हैं कि कोई पत्रकार मौके पर जाकर सच्चाई नहीं देख सकता। प्रबंधन की पारदर्शिता ऐसी है कि बाहर वालों को केवल वही जानकारी मिलती है, जो ‘प्रेस नोट’ के जरिए दी जाती है।
कानूनी तौर पर Wildlife Protection Act, 1972 और National Tiger Conservation Authority की गाइडलाइंस के तहत कोर एरिया में आमदखल प्रतिबंधित है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन नियमों का उपयोग पारदर्शिता सीमित करने के लिए किया जा रहा है? पोस्टमार्टम के दौरान केवल चुनिंदा लोगों की मौजूदगी भी संदेह को और बढ़ाती है।
वन विभाग के अनुसार, बाघों की मौत का कारण ‘केनाइन डिस्टेंपर’ (Canine Distemper) नामक खतरनाक वायरस है। फोरेंसिक जांच में इसकी पुष्टि के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है। डिप्टी डायरेक्टर के अनुसार, एक बाघिन और उसके चार शावकों को बचाने का प्रयास किया गया, लेकिन सफलता नहीं मिली।
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इसके बाद अब आसपास के गांवों में कुत्तों का वैक्सीनेशन शुरू किया गया है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि यह कदम पहले क्यों नहीं उठाया गया? जब संक्रमण फैल चुका था, तब कार्रवाई क्यों शुरू हुई?
विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी स्थितियों में ‘इलाज’ से ज्यादा जरूरी ‘रोकथाम’ होती है। लेकिन यहां ‘इन्सुलेशन’ यानी सुरक्षा घेरा बनाने में प्रबंधन की विफलता साफ नजर आती है।

इन्वेस्टिगेशन या सिर्फ दिखावा?
कान्हा में पत्रकारों की स्थिति उस मेहमान जैसी हो गई है, जिसे केवल ड्राइंग रूम तक सीमित रखा जाता है। अंदर क्या हो रहा है, यह देखने की अनुमति नहीं दी जाती। अधिकारियों का तर्क है—“कानून है, अंदर नहीं जा सकते।”
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह प्रतिबंध केवल सुरक्षा के लिए है, या सच्चाई छिपाने के लिए?
पोस्टमार्टम जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया को ‘टॉप सीक्रेट’ मिशन की तरह अंजाम दिया जाता है। और बाद में एक लाइन का प्रेस नोट जारी कर दिया जाता है—“बाघ की मौत आपसी संघर्ष में हुई।”
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सवाल जो जवाब मांगते हैं
- बाघों की मौत के दौरान गश्ती दल कहाँ था?
- मॉनिटरिंग सिस्टम क्यों फेल हुआ?
- संक्रमण रोकने के लिए पहले कदम क्यों नहीं उठाए गए?
- पत्रकारों को मौके पर जाने से क्यों रोका जा रहा है?
कान्हा सिर्फ एक टाइगर रिजर्व नहीं, बल्कि देश की प्राकृतिक विरासत है। कान्हा नेशनल पार्क में बाघों की मौत लगातार हो रही और सूचना पर नियंत्रण की स्थिति पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
अगर सब कुछ सही है, तो सच्चाई सामने आने से डर कैसा?
और अगर सवाल उठ रहे हैं, तो जवाब देना प्रबंधन की जिम्मेदारी है।
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