महाराष्ट्र के शूलगांव से गुजरात के मातासर तक की चुनौतीपूर्ण लेकिन भक्तिपूर्ण साइकिल यात्रा — जब माँ नर्मदा हर मोड़ पर मार्गदर्शक बनीं।
नर्मदे हर!”
सुबह की शांत और पवित्र बेला… शूलगांव की पहाड़ियों में जैसे ही सूर्य की किरणें फैलीं, वातावरण एक नई ऊर्जा से भर गया। कपिल पांडे जी ने आश्रम में नित्यकर्म, स्नान, ध्यान और पूजन के बाद साइकिल यात्रा का अगला चरण प्रारंभ किया।
शूलगांव में एक वृद्ध संत से भेंट हुई, जिन्होंने दो बार नर्मदा परिक्रमा की थी। उनका स्नेह और मार्गदर्शन मिला, पर उन्होंने चेताया — “आगे मार्ग कठिन है, खड़ी चढ़ाइयाँ और वीरान राहें होंगी।”
यात्रा प्रारंभ हुई… टूटी हुई सड़कें, सुनसान इलाक़ा, और परिक्रमा वासियों की संख्या लगभग नगण्य। पर हर मोड़ पर कपिल जी के होंठों पर “नर्मदे हर” की ध्वनि और मन में माँ नर्मदा का नाम संबल बना रहा।
सेवा की अनुभूति – एक परिक्रमावासी माता जी से भेंट
रास्ते में एक बुज़ुर्ग महिला मिलीं। परिक्रमा पर अकेली थीं, मुख पर चिंता थी। कपिल जी ने साइकिल धीरे की और उनका साथ निभाया — एक निकटवर्ती आश्रम तक पहुँचाया, जहाँ उन्हें भोजन और विश्राम मिला। यह वह क्षण था जहाँ सेवा और परिक्रमा का उद्देश्य एकाकार हो गया।
देवगंगा नदी — जहाँ राज्य की सीमाएँ और श्रद्धा मिलती हैं
देवगंगा नदी – महाराष्ट्र और गुजरात की प्राकृतिक सीमा”
जैसे-जैसे आगे बढ़े, सामने एक रमणीय नदी आई — देवगंगा। स्थानीय लोगों ने बताया — “इसके इस पार महाराष्ट्र और उस पार गुजरात है।” यह दृश्य अद्भुत था — प्राकृतिक सौंदर्य, आध्यात्मिकता और भूगोल का संगम।
नदी किनारे एक लंबा पैदल रास्ता तय कर जब पुल आया — कपिल जी ने जैसे ही साइकिल समेत कदम रखा — गुजरात की पवित्र भूमि में प्रवेश हुआ।
गुजरात में प्रवेश — कठिन रास्ता, लेकिन आत्मा का संगीत
मातासर आश्रम के बाहर विश्राम के क्षण”
गुजरात की सीमा में प्रवेश करते ही मार्ग और भी दुर्गम हो गया। कभी साइकिल कंधे पर उठानी पड़ी, कभी पहाड़ी चढ़ाई शरीर को हिला देती।
एक स्थान पर शरीर थक कर बैठ जाना चाहता था, तभी एक ग्वाला मिला। उसने न केवल सहायता की, बल्कि कहा — “भाई, तुम परिक्रमा कर रहे हो, माँ की सेवा है ये।”
इस वाक्य ने फिर से शरीर में ऊर्जा भर दी।
सूर्यास्त से पहले आश्रम की तलाश – और माँ की कृपा
अब जंगल-आदिवासी क्षेत्र में प्रवेश था। दूर-दूर तक कोई आश्रम नहीं दिख रहा था। शाम ढलने लगी, ठहरने की चिंता बढ़ने लगी।
तभी एक ग्रामीण ने बताया — “5 किलोमीटर आगे मातासर में एक आश्रम है।” थका शरीर, उबड़-खाबड़ रास्ता, पर मन में माँ की प्रेरणा।
आख़िरकार कपिल जी उस शांत और सुंदर आश्रम तक पहुँच ही गए। आश्रम में भोजन, विश्राम और संतों का सान्निध्य मिला। रात्रि में न कोई डर था, न थकान — बस माँ की गोद में विश्राम।
आज की यात्रा यही तक…
सूर्यास्त से पहले आश्रम की तलाश – और माँ की कृपा
जहाँ एक ओर शारीरिक परीक्षा थी, वहीं दूसरी ओर आत्मिक पुष्टि भी। सेवा, साहस, और साधना — इस पूरे चरण के तीन मंत्र बने।
अगले भाग की झलक:
अब यात्रा गुजरात के गहराते आदिवासी अंचलों में प्रवेश करेगी। मातासर से आगे की चढ़ाइयाँ, झाबुआ की ओर बढ़ते घने जंगल, और भक्तों की नई कहानियाँ — अगले भाग में…
पाठकों से विनम्र आग्रह:
यदि आप भी माँ नर्मदा की परिक्रमा कर चुके हैं या करने की तैयारी में हैं, तो अपने अनुभव “दैनिक यशोन्नति” के साथ साझा करें। संपर्क: editor@dainikyashonnati.com