सिवनी, 28 अगस्त 2025
सिवनी यशो:- महासमाधिधारक आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित एवं आचार्य श्री समयसागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य — मुनि श्री विमलसागर जी महाराज, मुनि श्री अनन्तसागर जी महाराज, मुनि श्री धर्मसागर जी महाराज एवं मुनि श्री भावसागर जी महाराज के सानिध्य में 28 अगस्त 2025 को श्री पारसनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर, सिवनी (म.प्र.) में दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत मांगलिक क्रियाएं संपन्न हुईं।
तत्वार्थ सूत्र का वाचन किया गया। रात्रिकाल में प्रतिदिन की भांति आरती, शास्त्र प्रवचन, सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं प्रतियोगिताएं आयोजित हो रही हैं। इसी अवसर पर विश्वप्रसिद्ध कृति “जिन गुणगान” का विमोचन भी किया गया।
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मुनिश्री भावसागर जी का प्रवचन
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री भावसागर जी महाराज ने कहा—
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“शास्त्रों को जितनी विनय करोगे उतने बुद्धिमान बनोगे।”
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“लोगों के कहने पर धर्म के कार्य नहीं छोड़ना चाहिए।”
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“अहंकार ही सभी युद्धों का मूल कारण है।”
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“पाप को भी पुण्य रूप में बदला जा सकता है।”
उन्होंने समझाया कि विनय करने वाला व्यक्ति ऊँचाइयों को छूता है। अहंकार और मान ही मानव जीवन की सबसे बड़ी विपत्तियाँ हैं। अहंकारी व्यक्ति कभी झुकता नहीं है और मद का नशा उसे डुबो देता है, जबकि विनम्रता (मार्दव धर्म) जीवन को तैराती है।
प्रवचन की प्रमुख बातें
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मंदिर तीन लोकों के नाथ का होता है, इसकी पूजा करना हमारा कर्तव्य है।
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जाति और मान का मद नहीं करना चाहिए। लघुता से प्रभुता मिलती है।
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मनुष्य दिखावे के लिए सब कुछ करता है, परंतु “कर्मों में रिश्वत नहीं चलती।”
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“मान एक मीठा जहर है, जो शुरू में मीठा लगता है परंतु अंततः दुखदायी होता है।”
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श्रुतकेवली वही बनते हैं जो पाठशाला पढ़ाते और धार्मिक संस्कार बांटते हैं।
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समाज के गरीबों को भी धार्मिक क्रियाओं में शामिल होने का अवसर देना चाहिए।
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दशलक्षण महापर्व का महत्व
मुनि श्री ने कहा कि “दशलक्षण महापर्व अनंत ऊर्जा का भंडार है। विनय से दिलों में जगह बनती है, शत्रु नष्ट होते हैं और तीनों लोकों में सुख का खजाना प्राप्त होता है।”
मनुष्य जन्म विनम्रता से ही सफल होता है। यही धर्म महान गुणों का साधक है।



