धर्ममध्यप्रदेशसिवनी

धर्म और संस्कृति - दसलक्षण महापर्व – विश्वभर में गूंज रहा आध्यात्मिक संदेश

सिवनी के बड़े जैन मंदिर में हुआ भव्य आयोजन, मुनिश्री धर्मसागर और भावसागर महाराज का सानिध्य

 Seoni 27 August 2025

सिवनी यशो:-  भारतीय संस्कृति उत्सव, धर्म और पर्व की संस्कृति रही है। इसी कड़ी में दसलक्षण महापर्व, जो कि लगभग 18,000 वर्षों से मनाया जा रहा है, इस बार भी विश्वभर में धर्ममय उत्साह के साथ मनाया जा रहा है।

 आयोजन का विवरण

  • स्थान : श्री पारसनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर, सिवनी

  • दिनांक : 27 अगस्त 2025

  • सानिध्य :

    • आचार्य श्री समयसागर जी महामुनिराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य

    • मुनिश्री धर्मसागर जी महाराज एवं मुनिश्री भावसागर जी महाराज

  • निर्देशन : अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त योगाचार्य डॉ. नवीन जैन

  • प्रमुख कार्यक्रम :

    • अभिषेक

    • विशिष्ट मंत्र शांति धारा

    • विशेष पूजन

    • शास्त्र अर्पण (राजस्थान से आए मंनटी उज्जैन, सौम्य जैन द्वारा)

    • कमेटी की बैठक एवं मांगलिक क्रियाएं

यह भी पढ़े :- जैन तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभ स्वामी के मोक्ष कल्याणक पर समर्पित किया गया निर्वाण लाडू

 मुनि प्रवचन का सार

धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री भावसागर जी महाराज ने कहा –

  • “धर्म के बिना मनुष्य की कोई कीमत नहीं होती, वह दर-दर की ठोकरें खाता है।”

  • धर्म कार्यों में धन खर्च करना ही सच्चा निवेश है।

  • “धर्म से नौ निधियां मिलती हैं, क्रोध में हमेशा हार होती है, क्षमा जयपताका उपहार है।”

  • क्षमा ही वह सूत्र है जो टूटे दिलों को जोड़ता है।

  • “66 करोड़ उपवास का फल आचार्य क्षमा धारण करने से मिलता है।”

 क्रोध और क्षमा पर संदेश

  • 10 मिनट का क्रोध 600 मिनट की खुशियां छीन लेता है।

  • क्रोध से हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, तनाव जैसी बीमारियां जन्म लेती हैं।

  • क्रोध रिश्तों को तोड़ता है, सम्मान छीनता है, और कभी-कभी आत्महत्या तक प्रेरित कर सकता है।

  • “क्रोध समझदारी को बाहर निकालकर बुद्धि के दरवाजे पर ताला जड़ देता है।”

  • इसके विपरीत क्षमा जीवन का उत्थान मार्ग है – आत्मा का आनंद, मोक्ष का द्वार और खुशहाली का खजाना।

यह भी पढ़े :- ध्यान वह चाबी है जिससे अंतःकरण का ताला खुलता है

 दसलक्षण महापर्व का महत्व

  • यह पर्व आत्मा के अनंत सौंदर्य को जानने का साधन है।

  • भाद्रपद महीना सभी महीनों का राजा माना गया है।

  • आषाढ़ी पूर्णिमा को छठे काल का अंत और भाद्र शुक्ल पंचमी को सृष्टि का आरंभ माना जाता है।

  • पर्व का उद्देश्य – “पाप से छुड़ाकर पुण्य की ओर प्रवृत्त करना।”

  • धर्म यदि समुद्र है, तो दसलक्षण उसकी तरंगें, धर्म यदि माला है तो दसलक्षण उसकी मणियां हैं।

 विशेष संदेश

  • समाज, घर और रिश्तेदारों के संकट में सहायक बनें।

  • सम्मान करने वाले का पहले सम्मान होता है।

  • हर कार्यक्रम में समय का ध्यान रखें – सभी का समय कीमती है।

  • कंजूसों को धर्म की कमान न सौंपें।

  • क्षमा ही सच्चा धर्म है, यही भारत की पहचान है।

क्रोध तन-मन को खोखला कर देता है, पर क्षमा जीवन को दिव्यता और आत्मा को आनंद से भर देती है। यही दसलक्षण महापर्व का शाश्वत संदेश है।

Dainikyashonnati

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!