नर्मदा सायकिल परिक्रमा: तप, त्याग और यात्रा — भाग -3
ओंकारेश्वर से रावरखेड़ी तक: पहला चरण, पहली अनुभूति
✍️ कपिल पांडे की सायकल परिक्रमा यात्रा से
“यह यात्रा सिर्फ पैरों से नहीं होती, यह तो आत्मा से चलनी पड़ती है।”
— गजानन आश्रम, ओंकारेश्वर
नर्मदा परिक्रमा की हमारी पवित्र यात्रा का प्रारंभ हुआ ओंकारेश्वर के गजानन आश्रम से। वहाँ हमने केवल दो दिन बिताए, लेकिन आत्मिक तैयारी का जो अनुभव वहाँ मिला, उसने हमें पूरी परिक्रमा के लिए मानसिक रूप से दृढ़ कर दिया।
सबसे पहले परिक्रमा का पंजीकरण कराया — एक दस्तावेज नहीं, बल्कि माँ नर्मदा के दरबार में हमारी उपस्थिति का आधिकारिक प्रतीक।
🌅 17 नवम्बर की भोर – संकल्प की बेला
भोर की अर्ध्य रश्मियों के साथ हमने ब्रह्ममुहूर्त में स्नान किया और भगवान ओंकारेश्वर तथा ममलेश्वर के दर्शन कर गौ घाट पहुँचे। वहीं पं. अनिल शर्मा जी ने विधिपूर्वक हमारा संकल्प कराया —
“अब आप स्वयं नर्मदा माँ का स्वरूप हो, अब हर कर्म तप बन जायेगा।”
उनके निर्देश पर हमने मुंडन करवाया, नर्मदा में स्नान किया और कन्याओं को भोजन कराकर माँ को प्रणाम किया।
यात्रा प्रारंभ – भिक्षा, भक्ति और भक्ति में भूख
सुबह 8 बजे हमने चाय-नाश्ता कर अपनी साइकिल यात्रा प्रारंभ की।
भिक्षा का नियम अब जीवन का हिस्सा बन चुका था — न मांगना, न खरीदना।
दोपहर 2 बजे भूख सताने लगी। कोई दुकान नहीं, कोई साधन नहीं। तभी हमारी साइकिल एक शादी समारोह के मंडप के सामने जाकर रुक गई — माँ का संकेत था शायद!
एक सज्जन ने भोजन के लिए आग्रह किया — और वह भोजन, वो प्रेम, आत्मा तक तृप्त कर गया। उस दिन जाना,
“नर्मदे हर” का अर्थ केवल मंत्र नहीं, बल्कि माँ की करुणा का जीवंत रूप है।
टोक्सर – जहाँ थकान भी साधना बन जाती है
आगे बढ़ते हुए हम पहुंचे टोक्सर — एक अध्यात्मिक पड़ाव, जहाँ गौमुख बाबड़ी से शिव का निरंतर अभिषेक होता है।
यहाँ के त्रिपुरसुंदरी मंदिर, आश्रमों की शांति, कीर्तन और नर्मदा की कलकल धारा — सब कुछ हमें भीतर से स्पर्श कर गया।
नर्मदा तट पर बैठकर अचमन किया, मानो शरीर की थकान और आत्मा की उलझन — दोनों धुल गए।
रावरखेड़ी – इतिहास और भक्ति का संगम
अंधेरा होने से पहले हम पहुंचे रावरखेड़ी (जिला खरगोन), जहाँ स्थित है बाजीराव पेशवा की समाधि — मराठा साम्राज्य के महान योद्धा।
सरकारी संरक्षण में स्थित यह स्थल अपने भीतर इतिहास और श्रद्धा का अद्भुत समन्वय समेटे हुए है।
यहाँ आश्रम में भोजन मिला, और रात्रि विश्राम भी।
यात्रा का पहला दिन समाप्त हुआ —
शारीरिक थकावट के साथ आत्मिक अनुभूति का प्रारंभ।
✨ पहले दिन की शिक्षा
संकल्प की शक्ति
निस्वार्थ प्रेम की उपस्थिति
भक्ति और भिक्षा में संतुलन
और सबसे बढ़कर — माँ नर्मदा की मूक करुणा
🔜 अगले भाग में पढ़िए:
रावरखेड़ी से मोरटक्का की ओर — जहाँ परिक्रमा जीवन के भीतर उतरने लगती है।



