धर्म

चिता जलने से पूर्व ,चित्त को जगाने वाला सद्गुरु है

गुरु पूर्णिमा पर्व- 21 जुलाई ,2024 पर विशेष:

चिता जलने से पूर्व ,चित्त को जगाने वाला सद्गुरु है
“अखण्ड मण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरं।
तत्पदं दर्शितं येन ,तस्मै श्री गुरुवे नम:।।”

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चारों वेद ,18 पुराण तथा महाभारत के रचयिता ,त्रिकालदर्शी महर्षि वेदव्यास की जयंती गुरु पूर्णिमा के रूप में, सदियो से हम भारतवर्ष में मनाते आ रहे हैं । अपने पूज्य गुरु को भगवान वेदव्यास का स्वरूप मानकर पूजन अर्चन वंदन कर शिष्यगण कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं ।
वैदिक सनातन संस्कृति में, गुरु को सर्वोच्च माना जाता है । गुरु को ईश्वर से भी अधिक महत्व दिया गया है । गुरु ही अपने शिष्य को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखाता है । आज्ञान के अंधकार को दूर करके गुरु अपने शिष्य को ज्ञान का प्रकाश प्रदान करता है। बिना गुरु के ज्ञान प्राप्त नहीं होता ,और बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं हो सकती। कहा भी गया है –

“हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर

  मनुष्य के कल्याण का ज्ञान ,भगवान वेदव्यास द्वारा प्रदान किया गया है। और वही ज्ञान हमें गुरु के प्रवचन से प्राप्त होता है। इसलिए प्रवचन कर्ता ,कथावाचक की गादी या आसान को व्यास पीठ कहा जाता है।
गुरु तत्व हमारे जीवन में जन्म से मृत्यु तक प्रधान है । मानवीय जीवन के प्रत्येक विषय में गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु अपने शिष्यों के संकट विपत्ति दूर करके जीवन को सार्थक और सुखी बनाता है।
हमारा ज्ञान दाता, पथ प्रदर्शक गुरु ही है। जो हमारा व्यक्तित्व का निर्माण करता है, तथा हमारे अंतश में सुप्त पड़ी प्रतिभाओं को निखारता है।

आदि गुरु वेदव्यास जी ने इसी दिन वेदों का सार, “ब्रह्म- सूत्र की रचना” भी किया था । इसलिए गुरु पूर्णिमा को “व्यास पूर्णिमा” के नाम से जाना जाता है ।
वेदों के सिद्धांतों को अपनी चेतना में जागृत करने के लिए, सद्गुरु की आवश्यकता होती है। जो शिष्य की चिता जलने से पहले उसके चित्त को जगा दे। “जिसके चेतना के स्वर और स्वरूप में सामानता हो ” ( कथनी और करनी में समानता) यही सच्चे गुरु की पहचान है ।

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“गुरु की गुरुता को, करते सभी प्रणाम। देवों से बढ़कर जिसका जग में नाम। “
प्रात: स्मरणीय पूज्य गुरुदेव ,”ब्रह्मलीन जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी” को समर्पित

,संकलन: “पं.ओमप्रकाश तिवारी” महाराज बाग भैरौगंज
सिवनी

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