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हिक्कड़े बिर्रे कह कर 60 फुट ऊंचे खंबे पर लटककर झूलते हे वीर

सिवनी यशो:- मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में आदिवासी परंपरा के अनुसार होली के दूसरे दिन मेघनाद मेले का आयोजन किया जाता है जो प्रदेश के अन्य क्षेत्रों में कहीं सुनने को नहीं मिलता यह मेला बहुत ही आश्चर्यचकित करने वाला होता है । इस मेले की मान्यता भी परंपरा और विश्वास का ऐसा पहलू है जिस पर आदिवासी समाज ही नहीं क्षेत्रीयजनों की अटूट श्रद्धा है । इस मेले के बारे में जब स्थानीय और क्षेत्रीय अखबार प्रकाशित करते है तो पाठकों की हमेशा यह प्रतिक्रिया रही है कि ऐसा भी होता है क्या ? लेकिन यह सच है। जिले में होली के ठीक दूसरे दिन मेले का आयोजन होता है जिसे मेघनाथ मेला कहा जाता है। इसकी वजह है कि रावण के पुत्र मेघनाद को आदिवासी ना केवल अपना आराध्य मानते हैं बल्कि उन्हें पूजते भी है। यही कारण है कि होलिका दहन के दूसरे दिन यानी धुलेंड़ी को मेघनाद के नाम पर बाकायदा एक बड़े मेले का आयोजन करते है।

दरअसल, आदिवासी लोग अपने आराध्य देव मेघनाद की पूजा लिए होलिका दहन के दूसरे दिन करते है। मेघनाद के पूजने के लिए एक ऐसा ही मेला सिवनी जिला मुख्यालय से 45 किमी दूर केवलारी विकासखण्ड के ग्राम पांजरा में धुरेंडी को लगता है और इस क्षेत्र में मेघनाद मेले के कारण अनेक ग्रामों में धुरेंडी दूसरे दिन मनायी जाती है ।

एशिया का सबसे बड़ा मेला

 

हिक्कड़े बिर्रे कह कर 60 फुट ऊंचे खंबे पर लटककर झूलते हे वीर - Seoni News

क्षेत्रीय आदिवासी परंपरा का यह मेला एशिया का सबसे बड़ा मेघनाद मेला है ऐसा दावा किया जाता है । इस ऐतिहासिक मेले की खासियत यह है कि इसमें अनेक ग्रामों और जिलों के आदिवासी एकत्रित होते है ।

खंभा होता है पूजा का प्रतीक

यूं तो मेघनाद की कोई प्रतिमा नहीं है लेकिन पूजा के प्रतीक के रूप में 60 फीट ऊंचाई वाले खंभें को गांव के बाहर गाड़ा जाता है। वहीं, इस खंभे पर चढऩे के लिए लगभग 30 फीट की खूंटी लगाई जाती हैं। एक तरह से यह मचान तैयार हो जाती है। जिस पर तीन लोगों के बैठने की व्यवस्था की जाती है। आदिवासी इसी खंभे के नीचे पूजा अर्चना करते हैं।

मनोकामनाएँ होती है पूरी

हिक्कड़े बिर्रे कह कर 60 फुट ऊंचे खंबे पर लटककर झूलते हे वीर - Seoni News

आदिवासी समाज के लोग मेघनाद पूजा पर अनेक प्रकार की मन्नते मानते है और मन्नत पूरी होने पर एक 60 फिट के खंभे पर उन्हें आदिवासी पुजारियों द्वारा लटका कर घूमाया जाता है जो विशेष आकर्षण का केन्द्र तो होता ही है देखने वाले इस तरह के दृश्य से आश्चर्यचकित भी होते है ।
मेघनाद मेले में मनोकामना पूरी होने पर एक खास रस्म को पूरा किया जाता है। जिन महिला-पुरुषों की मनोकामना पूरी होती है उनको मचान पर ले जाकर पेट के सहारे लिटाया जाता है। इसके बाद खम्भे के ऊपरी सिरे में लगी चारों तरफ घूमने वाली लकड़ी से बांधकर घुमाया जाता है। अपनी मन्नतों के आधार पर उसे 60 फीट ऊंचे मंच में घूमना होता है जो मेले का बड़ा आकर्षण होता है। झूलते समय मन्नत वाले व्यक्ति के ऊपर से नारियल फेंका जाता है। इस दौरान आदिवासी हक्कड़े बिर्रे का जयघोष करते हुए वातावरण को गुंजायमान करते हैं। इस आयोजन में दूर-दूर से लोग मेले का आनंद उठाने बड़ी संख्या में पहुंचे।

जनजातिय समाज की आस्थापूर्ण परंपरा है मेघनाद मेला

Dainikyashonnati

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