श्रावण में शिवमय हुआ सिवनी, सातवें दिवस गूंजी धर्म, संस्कार और सद्भाव की अमृतवाणी
पुत्रदा एकादशी पर सात दिवसीय संगीतमय शिव महापुराण कथा का भावपूर्ण समापन, महंत विपिन बिहारी दास जी महाराज ने सुनाए शिव, गणेश, दुर्वासा, इंद्र, राहु-चंद्रमा और करवा चौथ से जुड़े प्रसंग
सिवनी में सात दिवसीय शिव महापुराण कथा का समापन, हजारों श्रद्धालुओं ने ग्रहण की भंडारा प्रसादी
Seoni 24 August 2026
सिवनी यशो:- पावन श्रावण मास की आध्यात्मिक बेला में भगवान भोलेनाथ की भक्ति से सिवनी विधानसभा क्षेत्र सराबोर रहा। विधायक दिनेश राय मुनमुन द्वारा राशि लॉन में आयोजित सात दिवसीय भव्य एवं दिव्य संगीतमय शिव महापुराण कथा के सातवें एवं समापन दिवस, सोमवार को पुत्रदा एकादशी के पावन अवसर पर सांवरे सरकार गौ पीठाधीश्वर परम पूज्य महंत श्री विपिन बिहारी दास जी महाराज के मुखारविंद से धर्म, भक्ति, साधना, पारिवारिक संस्कार और जीवन मूल्यों की अमृतवर्षा हुई। कथा के अंतिम दिवस बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए पहुंचे और भगवान शिव के जयघोष से पूरा वातावरण शिवमय हो गया।

समापन दिवस की कथा में महाराज श्री ने केवल पौराणिक आख्यान ही नहीं सुनाए, बल्कि उनके माध्यम से गृहस्थ जीवन कैसे जिया जाए, माता-पिता का सम्मान कैसे हो, पति-पत्नी में प्रेम कैसे बना रहे, बच्चों के संस्कार कैसे हों, पड़ोसी के सुख-दुख में कैसे खड़े हों और गुरु, चिकित्सक तथा सलाहकार का कर्तव्य क्या होना चाहिए, जैसे विषयों पर अत्यंत सरल, रोचक और प्रभावशाली ढंग से मार्गदर्शन दिया।
नमक यानी ‘रामरस’ से लेकर जीवन के संस्कार तक
कथा की शुरुआत जीवन के एक बेहद सहज उदाहरण से करते हुए महाराज श्री ने कहा कि सब्जी में तेल न हो, कोई मसाला न हो, कुछ भी उपलब्ध न हो तो भर्ता बनाकर काम चल सकता है, लेकिन नमक के बिना सब्जी का स्वाद पूरा नहीं होता। उन्होंने कहा कि हमारी भाषा में नमक को ‘रामरस’ कहा जाता है।

इसी सहज उदाहरण के माध्यम से उन्होंने समझाया कि जीवन में अनेक चीजें कम-ज्यादा हो सकती हैं, लेकिन धर्म, संस्कार और सद्भाव जीवन के अनिवार्य तत्व हैं।
माताओं को बच्चों और अग्नि के प्रति सावधानी की सीख
महाराज श्री ने माताओं को छोटे बच्चों के प्रति विशेष सावधानी बरतने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि छोटे बच्चे के साथ सोते समय मां को विशेष सतर्कता रखनी चाहिए। साथ ही उन्होंने गृहस्थ जीवन में अग्नि के धार्मिक और व्यावहारिक महत्व को बताते हुए कहा कि अग्नि को पीठ देकर बैठने की परंपरा से बचना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति में अग्नि केवल अग्नि नहीं, बल्कि संस्कारों और पवित्रता का प्रतीक है।
‘जगत का गुरु ब्राह्मण, ब्राह्मण का गुरु संन्यासी’
कथा में गुरु-परंपरा की महिमा बताते हुए महाराज श्री ने कहा कि “जगत का गुरु ब्राह्मण है और ब्राह्मण का गुरु संन्यासी है।” उन्होंने संत-परंपरा और संन्यासी आश्रमों में धूने एवं चिमटे के महत्व का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि सच्ची संत परंपरा केवल बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि साधना, तप, त्याग और गुरु-परंपरा से पहचानी जाती है।
दुर्वासा ऋषि, इंद्र और भगवान शिव की माला का प्रसंग
कथा के दौरान दुर्वासा ऋषि और इंद्र का प्रसंग सुनाते हुए महाराज श्री ने बताया कि भगवान शिव की माला दुर्वासा ऋषि ने इंद्र को दी। इंद्र ने पद के मद में उस माला का उचित सम्मान नहीं किया और उसे ऐरावत हाथी की गर्दन पर डाल दिया। ऐरावत ने माला को नीचे गिराकर पैरों से रौंद दिया।

यह देखकर दुर्वासा ऋषि क्रोधित हुए और उन्होंने इंद्र को श्राप दिया। महाराज श्री ने इस प्रसंग के माध्यम से कहा कि पद, प्रतिष्ठा और वैभव मिलने पर व्यक्ति को अहंकार नहीं करना चाहिए। सम्मान और कृपा का सदैव आदर करना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि गुरु, डॉक्टर और सलाहकार को किसी व्यक्ति का चेहरा देखकर बात नहीं करनी चाहिए। जो व्यक्ति आपका हित चाहता है, उसका दायित्व है कि वह आपको सत्य और उचित सलाह दे, भले ही वह बात उस समय अच्छी न लगे।
‘मूंह देखकर सलाह देने वाला अंततः अपना भी नुकसान करता है’
महाराज श्री ने हास्यपूर्ण बकरी और बंदर के प्रसंग के माध्यम से ऐसे सलाहकारों पर कटाक्ष किया जो केवल ‘भैया-भैया’ करके सामने वाले को खुश करते रहते हैं।
उन्होंने कहा कि वास्तविक सलाहकार वही है जो संकट आने से पहले सच्चाई बता दे। केवल प्रसन्न करने के लिए गलत बात पर सहमति जताने वाला व्यक्ति अंततः अपने साथ-साथ उस व्यक्ति का भी नुकसान करता है, जिसकी वह चापलूसी कर रहा है।
एकादशी, केला और धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख
कथा में देवगुरु बृहस्पति और केले के पौधे से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए महाराज श्री ने एकादशी की धार्मिक मान्यताओं पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि धार्मिक पर्वों और व्रतों को केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे भाव और संकल्प को समझते हुए मनाना चाहिए।
उन्होंने केले के पौधे की धार्मिक महत्ता तथा एकादशी के दिन केले पर दीपदान जैसी परंपराओं का भी उल्लेख किया।
समुद्र मंथन, राहु और चंद्रमा की कथा
महाराज श्री ने समुद्र मंथन और अमृत वितरण का रोचक प्रसंग सुनाया। भगवान विष्णु के मोहिनी रूप, देवताओं को अमृत और असुरों को मदिरा दिए जाने की कथा के बीच राहु के देवता का रूप धारण कर अमृत पान करने का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने सूर्य और चंद्रमा द्वारा राहु की पहचान किए जाने की कथा बताई।
इसके बाद भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से राहु का मस्तक अलग होने और अमृत के प्रभाव से उसके अमर होने की पौराणिक मान्यता का वर्णन किया।
उन्होंने भगवान शिव द्वारा चंद्रमा को जटाओं में धारण करने तथा चंद्रमा से जुड़ी विभिन्न धार्मिक मान्यताओं को भी कथा के माध्यम से समझाया।
करवा चौथ और ‘चौथ’ का विशेष महत्व
समापन दिवस की कथा में चौथ के महत्व को विशेष रूप से समझाया गया। महाराज श्री ने भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश, चंद्रमा और शनि देव से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से करवा चौथ की धार्मिक मान्यताओं का वर्णन किया।
उन्होंने कहा कि सुहागिन महिलाओं के लिए करवा चौथ केवल व्रत नहीं, बल्कि पति की दीर्घायु, परिवार के मंगल और दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है।
उन्होंने महिलाओं से आग्रह किया कि किसी भी व्रत या धार्मिक परंपरा को अधूरी जानकारी के आधार पर न निभाएं, बल्कि उसके महत्व और विधि को समझें।
गणपति कोई व्यक्ति नहीं, एक पद भी है
कथा का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भगवान गणेश और ‘गणपति’ के अंतर को लेकर रहा। महाराज श्री ने रामचरितमानस के बालकांड में भगवान शिव-पार्वती विवाह के समय गणपति पूजन के उल्लेख की व्याख्या करते हुए कहा कि गणपति केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि एक पद की अवधारणा भी है।
उन्होंने देव, मनुष्य और राक्षस—तीन प्रकार के गणों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन गणों के प्रमुख के रूप में गणपति पद की कल्पना की गई।
उन्होंने वैदिक मंत्र “ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे…” का उल्लेख करते हुए गणपति पूजन की वैदिक परंपरा और भगवान गणेश के स्वरूप के बीच अंतर को सरल उदाहरणों से समझाया।
गणेश पुराण पर बोले—पूरी पकड़ हो तभी कथा करनी चाहिए
महाराज श्री ने कहा कि किसी भी पुराण पर कथा करने से पहले उसका गहन अध्ययन होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिस पुराण पर उनकी पूरी पकड़ नहीं है, उस पर वे कथा करने का संकल्प नहीं लेते।
उन्होंने देवी भागवत और गणेश पुराण के संबंध में भी कहा कि जब तक उन्हें स्वयं यह विश्वास न हो जाए कि वे उस पुराण को पूरी तरह समझ चुके हैं, तब तक उस पर कथा करना उचित नहीं समझते।
उन्होंने कहा कि जिस विषय पर बोलें, उसके प्रति पर्याप्त अध्ययन और शास्त्रीय समझ होना आवश्यक है।
भगवान श्रीकृष्ण और गणेश जी का रोचक प्रसंग
गणेश पुराण के संदर्भ में महाराज श्री ने भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी विवाह का रोचक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि विवाह के अवसर पर गणेश जी की उपस्थिति और बारात से जुड़े प्रसंगों में भगवान गणेश के विघ्नहर्ता स्वरूप की झलक मिलती है।
कथा को उन्होंने हास्य और व्यंग्य से जोड़कर इस प्रकार प्रस्तुत किया कि श्रद्धालु हंसी के साथ-साथ उसके आध्यात्मिक संदेश को भी ग्रहण करते रहे।
परिवार में तनाव नहीं, प्रेम और मुस्कान चाहिए
महाराज श्री ने कहा कि मनुष्य दिनभर नौकरी, व्यवसाय, पैसा, पद और अनेक परेशानियों से जूझता है, लेकिन घर परिवार वह स्थान होना चाहिए जहां व्यक्ति अपनी सारी चिंताएं बाहर छोड़कर प्रवेश करे।
उन्होंने पति-पत्नी के बीच प्रेम और संवाद की आवश्यकता बताते हुए कहा कि परिवार को परिवार की तरह जीना चाहिए। उन्होंने भावपूर्ण संदेश दिया—
“भगवान से प्रार्थना करो कि आंसू इतने महंगे हो जाएं कि किसी की आंख में न आएं और हंसी इतनी सस्ती हो जाए कि दुनिया का कोई कोना मुस्कुराने से बाकी न रहे।”
उन्होंने कहा कि जीवन का कोई भरोसा नहीं, इसलिए नफरत के लिए नहीं बल्कि प्रेम के लिए जीवन जिएं।
पड़ोसी के घर की आग बुझाने जरूर जाएं
सामाजिक सद्भाव का संदेश देते हुए महाराज श्री ने कहा कि पड़ोसी से कभी संबंध खराब नहीं करना चाहिए। यदि पड़ोसी के घर में आग लगती है तो उसे बुझाने जाना चाहिए, क्योंकि हवा का एक झोंका आग को आपके घर तक भी ला सकता है।
यदि पड़ोसी के घर में भोजन नहीं है तो उसकी मदद करनी चाहिए। यदि चोरी हो जाए या कोई संकट आए तो उसके साथ खड़ा होना चाहिए।
उन्होंने कहा—“इस दुनिया का नियम है, आप जो देंगे, वही किसी न किसी रूप में आपको वापस मिलेगा।”
माता-पिता और परिवार के प्रति कर्तव्य
कथा में महाराज श्री ने माता-पिता, पति-पत्नी, देवरानी-जेठानी और पड़ोसियों के बीच संबंधों पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि माता-पिता से दूरी या बैर बढ़ाना जीवन की बड़ी भूल है।
उन्होंने परिवार में प्रेम, सम्मान और संवाद बनाए रखने का आग्रह किया तथा कहा कि संस्कार केवल बच्चों को सिखाने की चीज नहीं, बल्कि उन्हें अपने आचरण से दिखाने की जिम्मेदारी भी है।
गणेश जी, शुभ-लाभ और दीपावली पर स्वस्तिक
महाराज श्री ने भगवान गणेश के पुत्र शुभ और लाभ का उल्लेख करते हुए घर के मुख्य द्वार पर गणेश जी की स्थापना से जुड़ी मान्यताओं की चर्चा की।
दीपावली पर स्वस्तिक बनाने के संबंध में उन्होंने अपनी बताई धार्मिक परंपरा का उल्लेख करते हुए गृहस्थों के लिए हल्दी मिश्रित दूध से स्वस्तिक बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि गृहस्थ के घर में स्वस्तिक पर्याप्त आकार का और विधिपूर्वक बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने धार्मिक अनुष्ठानों और अभिषेक आदि को योग्य विद्वान आचार्य के मार्गदर्शन में कराने की बात कही।
कथा वाचक ने अपने गुरु को किया स्मरण
समापन दिवस पर महाराज श्री ने अपने गुरु का भावपूर्ण स्मरण किया। उन्होंने कहा कि उनके गुरु भले ही आज शरीर रूप में उनके बीच नहीं हैं, लेकिन गुरु के शब्द, आशीर्वाद और कृपा आज भी उनके साथ हैं।
उन्होंने अपने जीवन की शिक्षा और संघर्ष का उल्लेख करते हुए कहा कि औपचारिक शिक्षा सीमित रही, लेकिन गुरु चरणों की कृपा और गौमाता की कृपा से उन्हें धर्म और कथा की सेवा का अवसर मिला।
उन्होंने अपने गुरु से जुड़े आध्यात्मिक संस्मरण भी श्रद्धालुओं के साथ साझा किए।
विधायक दिनेश राय मुनमुन ने कहा—यह कार्यक्रम पूरे समाज का है
समापन अवसर पर सिवनी विधायक दिनेश राय मुनमुन ने कथा वाचक महंत विपिन बिहारी दास जी महाराज के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि समाज में संस्कार, सम्मान और चरित्र की आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक है।
उन्होंने कहा कि महाराज श्री की वाणी में एक बड़े भाई और परिवार के बुजुर्ग की तरह समाज को सही दिशा देने वाली बातें हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि कथा के माध्यम से दिए गए संदेश का समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
विधायक ने आयोजन में सहयोग करने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि स्वागत-सत्कार में यदि किसी प्रकार की कमी रह गई हो तो वे उसके लिए क्षमा चाहते हैं।
उन्होंने कहा कि आयोजन स्थल पर उनकी तस्वीर केवल महाराज श्री के स्वागत के भाव से लगाई गई है। “यह कार्यक्रम मेरा नहीं, आप सभी का है। हर व्यक्ति को लगना चाहिए कि यह कार्यक्रम हमारा है।”
उन्होंने श्रद्धालुओं से कथा के बाद भंडारा एवं प्रसाद ग्रहण करके ही जाने का आग्रह किया।
बेटे की घटना को भगवान शिव की कृपा से जोड़ा
अपने संबोधन में विधायक दिनेश राय मुनमुन ने एक व्यक्तिगत प्रसंग भी साझा किया। उन्होंने बताया कि कथा के दौरान उनके छोटे बेटे के साथ एक घटना हुई थी, जिसमें उसे चोट आई। उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं की दुआओं, आशीर्वाद और भगवान भोलेनाथ की कृपा से उनका बेटा सुरक्षित रहा।
उन्होंने कहा कि उन्हें लगा कि महापुराण कथा के आयोजन के दौरान ही उन्हें भगवान शिव की कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। उन्होंने इस अवसर पर कथा में शामिल सभी श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
सात दिनों तक शिवमय रहा सिवनी
सात दिनों तक चली इस शिव महापुराण कथा में धर्म, भक्ति और आध्यात्मिकता के साथ-साथ परिवार, संस्कार, सामाजिक सद्भाव, गुरु-शिष्य परंपरा और जीवन मूल्यों पर लगातार संदेश दिए गए। समापन दिवस पर भी श्रद्धालुओं की उपस्थिति और उत्साह देखते ही बनता था।
अंत में विधायक दिनेश राय मुनमुन ने कथा वाचक महंत श्री विपिन बिहारी दास जी महाराज, संत-महात्माओं, माताओं-बहनों, वरिष्ठजनों, युवाओं, बच्चों तथा आयोजन में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी लोगों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया।
भगवान भोलेनाथ के जयघोष के साथ सात दिवसीय शिव महापुराण कथा का भावपूर्ण समापन हुआ।
श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक की आरती
शिव महापुराण कथा के दौरान आयोजित आरती में अग्रवाल समाज की ओर से संतोष अग्रवाल, जिला महामंत्री भाजपा, सत्यनारायण अग्रवाल (सत्तू भैया), महिला पतंजलि योग समिति से सरिता ओझा, ऊषा शर्मा, सरोज गुप्ता, कलावती वायकर, किरण सक्सेना, सरस्वती बघेल, गायत्री शर्मा, ऊषा राय, वंदना गुप्ता, अनुराधा, चित्रा सूर्यवंशी, तरुणलता, भरत राय, लकी गुप्ता सहित अनेक श्रद्धालु शामिल हुए।
पत्रकार जगत से मनोज मर्दन त्रिवेदी, अयोध्या विश्वकर्मा, नंदन श्रीवास्त्री, महेंद्र सनोडिया, संजीव क्रिडिया, नीरज वर्मा, चेतन गांधी, गिरीश पाठक, श्याममिलन पांडे, विक्की पांडे, जितेंद्र ठाकुर, श्याम ब्रह्मवंशी, देवेंद्र राठौर, दिनेश धुर्वे, प्रदीप रजक, विनय गुप्ता, कपिल, विनय सेन, राज नागेश, सोनू पटेल सागर, गौतम रजक, अजीत जापानी जैन, महेश, सुरेश गहलोत, अभय श्रीवास्तव, भोला श्रीवास्तव, नितिन चंद्रवंशी, अभिषेक चंद्रवंशी, भरत नरेती, सुरेंद्र शर्मा सहित अनेक श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आरती की।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में सनातन धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं, नागरिकों, माताओं-बहनों और युवाओं की गरिमामय उपस्थिति रही। श्रद्धालुओं पर पुष्प वर्षा कर स्वागत और अभिनंदन किया गया। पूरे आयोजन के दौरान भक्ति, सेवा और आध्यात्मिकता का वातावरण बना रहा।
कथा समापन के बाद हजारों श्रद्धालुओं ने भंडारा प्रसादी ग्रहण की। पूरे परिसर में सेवा, श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा। महिला-पुरुष, युवा और बच्चों सहित श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की और भगवान भोलेनाथ के जयकारों के बीच सात दिवसीय शिव महापुराण कथा का भावपूर्ण समापन हुआ।
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