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आंदोलन की राजनीति आखिर किसके हित में? : लोकतंत्र के नाम पर अराजकता क्यों? आरोपों का दम है तो न्यायालय जाइए, चुनाव मैदान में जनता के बीच आइए!

Dainik Yashonnati

Dainik Yashonnati / Oct 28, 2026 06:01 pm / Post views : 21

लोकतंत्र के नाम पर अराजकता क्यों? आरोपों का दम है तो न्यायालय जाइए, चुनाव मैदान में जनता के बीच आइए!
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SIR पर सियासत, संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल और महत्वपूर्ण अवसरों पर आंदोलन की राजनीति आखिर किसके हित में? लोकतंत्र में हंगामा नहीं, प्रमाण और जनादेश निर्णायक होते हैं।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य है। यहां सरकारें जनता के मत से बनती हैं, संवैधानिक संस्थाएं कानून के दायरे में काम करती हैं और प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने, असहमति जताने तथा न्याय पाने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन जब राजनीतिक विरोध तथ्यों और तर्कों की सीमाएं लांघकर लगातार आरोपों, भ्रम और टकराव की राजनीति में बदलने लगे, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस राजनीति का उद्देश्य जनहित है या केवल राजनीतिक वातावरण को अशांत बनाए रखना?

निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया इसी बहस के केंद्र में है। मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता है। मृत व्यक्तियों के नाम, दोहरी प्रविष्टियां और अन्य वास्तविक त्रुटियां दूर करना जरूरी है। लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र मतदाता का नाम अनुचित रूप से नहीं कटना चाहिए। शुद्ध मतदाता सूची और प्रत्येक पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की सुरक्षा—दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।

ऐसे में SIR पर बहस तथ्यों, नियमों और प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए, न कि जनता को भयभीत करके या संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास का वातावरण बनाकर।

आरोप लगाते हैं तो प्रमाण भी प्रस्तुत करें!

राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोपों को प्रमाणित करना जिम्मेदारी का काम है। यदि किसी राजनीतिक दल को लगता है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं, किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटाया गया है अथवा नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो उसे ठोस प्रमाणों के साथ संबंधित प्राधिकारी और न्यायालय के समक्ष अपनी बात रखनी चाहिए।

यदि आरोप सही हैं, तो प्रमाण सामने लाइए। यदि अन्याय हुआ है, तो कानूनी लड़ाई लड़िए। और यदि जनता को लगता है कि आपका पक्ष सही है, तो चुनाव मैदान में उतरकर जनमत प्राप्त कीजिए।

क्या लोकतंत्र का अर्थ केवल आरोप लगाना, विरोध करना और हर निर्णय को संदेह के घेरे में खड़ा कर देना रह गया है? क्या राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी केवल जनता को आंदोलित करना है, या समस्याओं का संवैधानिक समाधान खोजना भी उनका कर्तव्य है?

न्यायालय और संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना अपने आप में अपराध नहीं है। लोकतंत्र में संस्थाओं की समीक्षा और जवाबदेही आवश्यक है। लेकिन यदि किसी संस्था के निर्णय से असहमति है, तो उसका समाधान प्रमाण, कानून और निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से खोजा जाना चाहिए। बिना प्रमाण व्यापक आरोप लगाना और जनता के बीच अविश्वास फैलाना किसी भी जिम्मेदार राजनीतिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।

हर मुद्दे पर टकराव, हर अवसर पर आंदोलन—आखिर कब तक?

देश में दीपावली जैसे बड़े त्योहारों का समय हो, संसद का महत्वपूर्ण सत्र चल रहा हो, विद्यार्थियों का भविष्य दांव पर हो या विदेशी मेहमानों के आगमन से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण अवसर हो—ऐसे समय में होने वाली राजनीतिक गतिविधियों पर स्वाभाविक रूप से व्यापक चर्चा होती है।

आंदोलन का समय अपने आप में किसी आंदोलन को गलत साबित नहीं करता। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सुरक्षित है। लेकिन यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि आंदोलन का उद्देश्य क्या है, उसके पीछे तथ्य कितने मजबूत हैं और उसके तरीके से आम जनता को कितना नुकसान हो रहा है।

दीपावली के समय व्यापारी अपनी पूंजी लगाकर कारोबार की तैयारी करते हैं। छोटे दुकानदारों, कारीगरों और दैनिक मजदूरी पर निर्भर परिवारों के लिए त्योहार का मौसम आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। ऐसे समय में यदि किसी राजनीतिक आंदोलन के कारण बाजार, परिवहन, सार्वजनिक सेवाएं या सामान्य जनजीवन प्रभावित होता है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

संसद सत्र के दौरान भी विरोध हो सकता है, लेकिन संसद में चर्चा और लोकतांत्रिक विमर्श को पूरी तरह बाधित कर देना समाधान नहीं है। इसी प्रकार विदेशी प्रतिनिधियों के आगमन के समय देश की नीतियों की आलोचना की जा सकती है, मगर राष्ट्रीय हितों से जुड़े विषयों पर तथ्यहीन प्रचार से बचना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है।

विरोध करना अधिकार है, लेकिन अराजकता फैलाना अधिकार नहीं। असहमति लोकतंत्र की ताकत है, मगर जानबूझकर भ्रम, अव्यवस्था और टकराव का वातावरण पैदा करना लोकतांत्रिक मर्यादा को कमजोर करता है।

विद्यार्थियों को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश क्यों?

विद्यार्थी देश का भविष्य हैं। उनकी ऊर्जा शिक्षा, नवाचार, रोजगार, शोध और राष्ट्र निर्माण में लगनी चाहिए। छात्र राजनीति लोकतांत्रिक चेतना विकसित कर सकती है, लेकिन विद्यार्थियों को अधूरी जानकारी देकर भड़काना, झूठे आश्वासन देना या उन्हें किसी राजनीतिक दल के हितों के लिए इस्तेमाल करना गंभीर चिंता का विषय है।

यदि किसी छात्र संगठन को किसी नीति, निर्णय या चुनाव प्रक्रिया पर आपत्ति है, तो उसे तथ्यों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने और विरोध करने से रोकना भी उचित नहीं है। लेकिन उन्हें भ्रमित करके संघर्ष के लिए उकसाना और फिर उनके भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों से किनारा कर लेना कैसी राजनीति है?

राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे विद्यार्थियों के वास्तविक मुद्दों—शिक्षा, छात्रवृत्ति, रोजगार और अवसरों—के समाधान के लिए संघर्ष कर रहे हैं या उन्हें केवल राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बना रहे हैं।

SIR का विरोध है तो वैकल्पिक समाधान भी बताइए!

मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। किसी भी प्रक्रिया में यदि कमियां हैं, तो उन्हें उजागर करना और सुधार की मांग करना आवश्यक है। लेकिन केवल विरोध करने से समस्या का समाधान नहीं होगा।

जो राजनीतिक दल SIR का विरोध कर रहे हैं, उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि वे मतदाता सूची की त्रुटियों को दूर करने के लिए कौन-सा व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत करते हैं। यदि दो जगह दर्ज नामों को हटाना है, मृत मतदाताओं के रिकॉर्ड दुरुस्त करने हैं और पात्रता से जुड़े मामलों की जांच करनी है, तो इसके लिए पारदर्शी व्यवस्था का विरोध क्यों किया जाए? और यदि प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, तो ऐसे मामलों को प्रमाण सहित सामने लाकर उनका समाधान क्यों न कराया जाए?

SIR की सफलता का आकलन केवल हटाए गए नामों की संख्या से नहीं, बल्कि सूची की शुद्धता, प्रक्रिया की पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा से होना चाहिए। निर्वाचन आयोग को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी पात्र नागरिक को अनावश्यक परेशानी न हो तथा दावा, आपत्ति और अपील की प्रक्रिया सुलभ रहे।

किसी भी राजनीतिक दल को यह अधिकार नहीं कि वह बिना प्रमाण किसी समूह को फर्जी मतदाता घोषित कर दे। इसी तरह किसी वास्तविक त्रुटि को केवल राजनीतिक विवाद बताकर नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है। कानून सबके लिए समान होना चाहिए।

संवैधानिक संस्थाओं को विवाद का अखाड़ा मत बनाइए!

निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण आधारशिलाएं हैं। इन संस्थाओं की निष्पक्षता पर जनता का विश्वास बना रहना आवश्यक है। लेकिन संस्थाओं पर भरोसा बनाए रखने की जिम्मेदारी केवल सरकार या आयोग की नहीं, राजनीतिक दलों की भी है।

यदि कोई निर्णय गलत है, तो उसके विरुद्ध कानूनी उपाय उपलब्ध हैं। यदि कोई अधिकारी नियमों का उल्लंघन करता है, तो शिकायत और जांच की व्यवस्था है। यदि किसी नागरिक के अधिकार प्रभावित होते हैं, तो वह निर्धारित प्रक्रिया के तहत न्याय मांग सकता है।

फिर सवाल यह है कि जब समाधान के संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हैं, तब बिना प्रमाण व्यापक आरोप लगाकर जनता में अविश्वास फैलाने की आवश्यकता क्यों पड़ती है?

लोकतंत्र में संस्थाओं से सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन हर निर्णय को राजनीतिक षड्यंत्र बताना और हर असहमति को जनविरोधी कार्रवाई के रूप में पेश करना भी गंभीर समस्या है। राजनीतिक दलों को अपनी भाषा, अपने आरोपों और अपने आंदोलनों की जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी।

आर्थिक विकास और देश की छवि पर राजनीति का असर

भारत की अर्थव्यवस्था, वैश्विक संबंधों और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को मजबूत बनाने के लिए राजनीतिक स्थिरता के साथ लोकतांत्रिक बहस भी जरूरी है। सरकार की नीतियों की आलोचना होना सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। विदेश नीति, आर्थिक नीति या प्रशासनिक फैसलों पर विपक्ष का सवाल उठाना उसकी भूमिका का हिस्सा है।

लेकिन आलोचना और भ्रामक प्रचार के बीच अंतर है। किसी नीति से असहमति है तो उसके आंकड़ों, परिणामों और विकल्पों पर चर्चा होनी चाहिए। देश की छवि को नुकसान पहुंचाने के आरोप भी प्रमाणों के आधार पर ही लगाए जाने चाहिए।

व्यापारियों को त्योहारों के दौरान निर्बाध कारोबार का अवसर मिलना चाहिए, विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित नहीं होनी चाहिए और आम नागरिकों को राजनीतिक संघर्ष की अनावश्यक कीमत नहीं चुकानी चाहिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों को यह समझना होगा कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद सार्वजनिक हित सर्वोपरि है।

आरोपों पर विश्वास है तो जनता के बीच जाइए!

यदि विपक्ष को अपने आरोपों पर पूरा विश्वास है, यदि उसे लगता है कि जनता उसके पक्ष में है और यदि वह मानता है कि उसके पास सरकार या निर्वाचन आयोग के विरुद्ध ठोस तथ्य हैं, तो उसे लोकतांत्रिक रास्ते अपनाने चाहिए। न्यायालय में प्रमाण प्रस्तुत करे, संबंधित संस्थाओं में शिकायत दर्ज कराए, सार्वजनिक बहस में अपने तथ्य रखे और चुनाव के समय जनता से समर्थन मांगे।

जनता के बीच जाना लोकतंत्र है, प्रमाण प्रस्तुत करना जवाबदेही है और न्यायालय में अपनी बात रखना संवैधानिक रास्ता है। लेकिन केवल आरोपों के सहारे लगातार अविश्वास और टकराव का वातावरण बनाए रखना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

चुनाव में जनता का जनादेश किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक कसौटी है। जनता यदि उसके विचारों से सहमत होगी, तो उसे समर्थन देगी; असहमत होगी, तो अपना निर्णय सुनाएगी। लोकतंत्र में यही व्यवस्था राजनीतिक दलों को जवाबदेह बनाती है।

निष्कर्ष: देश को राजनीतिक अराजकता नहीं, जिम्मेदार लोकतंत्र चाहिए

भारत को ऐसे राजनीतिक वातावरण की जरूरत है, जिसमें सरकार से सवाल पूछे जाएं, विपक्ष अपनी जिम्मेदारी निभाए, संवैधानिक संस्थाएं निष्पक्षता से काम करें और नागरिक बिना भय या भ्रम के अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें।

किसी भी राजनीतिक दल को आंदोलन करने से रोका नहीं जाना चाहिए, लेकिन आंदोलन के नाम पर हिंसा, जबरन बंद, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, अफवाह या नागरिकों के अधिकारों के हनन को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र की मर्यादा सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों पर समान रूप से लागू होती है।

SIR का समर्थन करने वालों को भी पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा पर जोर देना चाहिए, जबकि विरोध करने वालों को अपने आरोप प्रमाणित करने चाहिए। देश को न अंधसमर्थन चाहिए, न अंधविरोध; उसे तथ्यों, कानून और जवाबदेही पर आधारित राजनीति चाहिए।

आखिर कब तक देश को हर महत्वपूर्ण अवसर पर राजनीतिक टकराव की आग में झोंकने का प्रयास किया जाएगा? कब तक जनता को आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच उलझाए रखा जाएगा? यदि आरोप सही हैं तो प्रमाण दीजिए, अन्याय हुआ है तो न्यायालय जाइए और जनता का विश्वास है तो चुनाव मैदान में उतरिए।

लोकतंत्र की शक्ति सड़कों पर होने वाले शोर से नहीं, जनता के विश्वास, संवैधानिक मर्यादा और निष्पक्ष जनादेश से तय होती है। भारत का लोकतंत्र इतना मजबूत है कि वह असहमति को भी स्थान देता है और कानून के माध्यम से विवादों का समाधान भी करता है। जरूरत केवल इतनी है कि राजनीतिक दल अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्र और नागरिकों के हित को प्राथमिकता दें।

लोकतंत्र बचाना है तो भ्रम नहीं, तथ्य फैलाइए। व्यवस्था सुधारनी है तो अराजकता नहीं, समाधान प्रस्तुत कीजिए। और जनता का विश्वास जीतना है तो आरोपों के पीछे नहीं, अपने काम और प्रमाणों के साथ उसके बीच जाइए। यही जिम्मेदार राजनीति है, यही संवैधानिक मर्यादा है और यही सशक्त लोकतंत्र का रास्ता।

गजानंद पंचेश्वर
जिला महामंत्री, भारतीय जनता पार्टी, सिवनी

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