सेवा और समर्पण की परीक्षा : भील गांव से शूलगांव की यात्रा
कपिल पांडे की नर्मदा परिक्रमा – भाग 10
नर्मदा परिक्रमा विशेष श्रृंखला
✍️ दैनिक यशोन्नति
नर्मदा परिक्रमा केवल एक पदयात्रा नहीं, बल्कि आत्मा की परीक्षा है।
हर चरण, हर गांव, हर संत और हर परिस्थिति — परिक्रमावासी के सेवा भाव और समर्पण को परखती है।
भाग 10 में जब यात्रा भील ग्रामों से शूलगांव की ओर बढ़ती है, तो यह मार्ग सेवा और त्याग की गहराई को छूता है।
यहाँ रास्ता कठिन है, संसाधन सीमित हैं, फिर भी ग्रामवासियों की अतिथि भावना और संतों की निश्छल उपस्थिति — परिक्रमावासी को भीतर से झुका देती है।
कभी थके शरीर को भोजन कराने की इच्छा, कभी अज्ञात आश्रम में झाड़ू लगाकर मौन सेवा — ये वही क्षण हैं जब नर्मदा मैया परिक्रमावासी से पूछती हैं:
“क्या तू केवल चल रहा है, या मेरे साथ चल रहा है?”
ठंड की सुबह और सेवा का साक्षात्कार

परिक्रमा के नियमों के अनुसार प्रातः स्नान के लिए जब भील गांव की टंकी का पानी छुआ, तो बर्फ़ सी ठंड ने शरीर को झकझोर दिया। लेकिन माँ नर्मदा का स्मरण आते ही भीतर एक शक्ति संचारित हो गई।
भील गांव के एक छोटे से आश्रम में चाय की गर्माहट और मुंबई से आए सेवाभावी युवाओं की सेवा भावना ने पांडे जी को भावविभोर कर दिया। उन्होंने बताया कि वे एक माह से परिक्रमा वासियों के लिए निशुल्क चाय-नाश्ता बना रहे हैं। पांडे जी ने उन्हें नमन कर यात्रा आगे बढ़ाई।
शूलपानी की चढ़ाइयाँ और साधना की भेंट
महाराष्ट्र सीमा में प्रवेश के साथ ही यात्रा का मार्ग और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया। शूलपानी की पहाड़ियों में हर चढ़ाई श्रद्धा की परीक्षा लेती प्रतीत होती थी। इसी मार्ग पर एक तीन फीट ऊँचे परंतु अडिग आत्मबल वाले परिक्रमा वासी से भेंट हुई, जिनके शब्द थे —
“माँ चलवा रही हैं… हम कुछ नहीं।”
यह वाक्य जैसे पूरे दिन का मंत्र बन गया।

दोपहर के समय धनाजे गांव स्थित एक आश्रम में परिक्रमा वासियों के लिए खुला भोजनालय देखा। वहाँ मिला भोजन न केवल भूख मिटाने वाला था, बल्कि आत्मा को भी तृप्त कर देने वाला अनुभव रहा। कपड़े धोए गए, थोड़ी विश्राम किया गया और यात्रा पुनः प्रारंभ हुई।
धड और काठी गाँव की आत्मीयता
धड गांव और काठी गांव महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में स्थित हैं। वहाँ के ग्रामीणों का आत्मीय स्वागत — “नर्मदे हर” कहकर परिक्रमा वासियों को प्रणाम करना — यात्रा की थकान को हर लेता है। परंतु शाम होते-होते थकान गहराने लगी।
काठी गांव के आश्रम में अधिक भीड़ के कारण रुकना संभव नहीं था। आश्रम सेवक ने शूलगांव का सुझाव दिया — जो कि मात्र 7 किमी दूर था।

7 किमी की जिद — समर्पण की परीक्षा
7 किलोमीटर की दूरी आसान प्रतीत हो रही थी, परंतु रास्ता उबड़-खाबड़ और अंधकारमय था। यह दूरी शारीरिक से अधिक मानसिक परीक्षा बन गई। दो घंटे की संघर्षपूर्ण यात्रा के बाद शूलगांव पहुँचना, किसी धैर्य के तप से कम नहीं था।
शूलगांव के एक संत ने पांडे जी को रात विश्राम हेतु स्थान और गरम भोजन उपलब्ध कराया। यह माँ नर्मदा की कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव था।
परिक्रमा की सीख — भाग 10 से
अगले भाग में:
शूलगांव से लखनगिरी बाबा के आश्रम तक की कथा, भक्ति, और रहस्य… जल्द ही दैनिक यशोन्नति में।
नर्मदे हर।




