आंसुओं और वेदना ने जन्म दिया था, जन परिषद को
Chhindwara 11 June 2025
छिंदवाड़ा यशो :- कॉलेज से पढ़कर निकला था, इस उम्र में अधिकतर किसी भी युवा के समान मैं भी कविताएँ लिखने लगा । लेकिन प्रेम गीत नहीं बल्कि रोटी और अभावों की कविता । इसी कारण से हम चार यार कभी कभी कविता या साहित्य पर विमर्श के लिए , बैठ जाते थे । हम कविता के नए नए खिलाड़ी थे पर कहते हैं कि थे बहुत प्रभावकारी । इसलिए जो उस समय के स्थानीय एवं तथाकथित वरिष्ठ कवि थे , उनके साथ हम लोग असहज महसूस करते थे। एक शाम हम चार यारों ने तय किया कि हम खुद अपनी एक संस्था बना लेते हैं । अपन खुद अपनी गोष्ठियां करेंगे और एक बड़ी लाइन खींचेंगे। उत्साह इतना कि दस पंद्रह मिनट में एक मित्र ने संस्था का नाम भी सुझा दिया : जन परिषद।
हमने खूब गोष्ठियां की, खूब पेपरों में न्यूज प्रकाशित हुई । उत्साह बढ़ता ही जा रहा था । इसी लय में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन भी करवा लिए । बैतूल में जन परिषद स्थापित होने लगी ।तीन चार साल के बाद जिले के दूरस्थ और निर्जन गांव पलस्या के आसपास के चार पांच गांवों में कुपोषण के कारण , मात्र छह सात दिनों में करीब 23 बच्चों की मौत हो गई । पता चला कि यह पहली बार नहीं हुआ बल्कि ये तो औसतन मौतें है जो , प्रतिवर्ष होती हैं ।
इस समाचार के प्रति प्रशासन ने कभी कोई गंभीरता नहीं दिखाई । बस क्या था हम दो तीन पत्रकारों की संवेदनाएं, हमें झकझोरने लगीं । मैं उस समय दैनिक भास्कर का बैतूल ब्यूरो चीफ था ।
सुबह हम दो पत्रकार साथी निकल पड़े , ग्राम पलस्या की ओर । गांव पहुंचे तो , 23 बच्चों की मौत के बाद होने वाली सायं सायं करती श्मशान सी खामोशी से हम लोगों का साक्षात्कार हुआ । किसी कवि की एक पंक्ति याद आयी कि हर तरफ मरघटी सन्नाटों का साया है
।पता चला कि 23 बच्चों की किलकारियां खामोश हो जाने के बाद ,अभी भी गांवों में कुछ और बच्चे जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं । एक एक करके उनके घर गए तो आंखों में आंसू आ गए । दवाई तो एक दो ही घर में दिखी । बाकी घरों में तो पेट भरकर खाने के लिए अनाज तक नहीं था । पीने के लिए बड़ी आबादी के लिए केवल एक हैंडपंप । गर्मियों में स्वयं हैंडपंप, पानी मांगने लगता था ।
वहीं खड़ी एक नर्स बताती है कि वास्तव में ग्रामीण जन , अज्ञानता वश वैक्सीन नहीं लगवाते हैं और बच्चों को पौष्टिक डाइट भी नहीं देते हैं । नर्स की बात सुनकर , कई ग्रामीण जन उबल पड़े कि खाने को , रोटी तो है नहीं, पौष्टिक आहार कहां से लाएं ? एक पत्रकार के नाते मैं सारी जानकारी नोट कर रहा था लेकिन दिमाग की नसें फटी जा रही थी कि इस देश की आत्मा इतनी बदहाली, गरीबी,अशिक्षा और अभावों में तड़प रही है । उसी काल में,महानगरों में लोग कलर्ड टीवी के लिए संघर्ष कर रहे थे और पलस्या जैसे गांव रोटी के लिए ।
मुझे आज भी याद है उस दिन मुझे दुष्यंत कुमार की पंक्ति , कि, यूं तो अक्सर चीखता है आदमी तकलीफ में, इतनी खामोशी से लेकिन आज तक चीखा न था , का पहली बार जमीनी अर्थ समझ आया । हम लोगों के दिमाग से कविता , गोष्ठी और साहित्य सब रफूचक्कर हो गए । और मेरे हिसाब से दरअसल , उन्हीं दिनों जन परिषद का असली जन्म हुआ । मित्रों ने तय किया कि पहिले तो जन परिषद उन गांवों में दवाई, राशन और अन्य मूल भूत सुविधाओं की व्यवस्था करेगी । उस गांव में जहां नर्स भी जाने से कतराती थी, वहां आपकी अपनी जन परिषद के प्रयासों से सिविल सर्जन, डी एच ओ,कलेक्टर, जन प्रतिनिधिगण, और अन्य अधिकारी पहुंचने लगे । जन परिषद ने स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए , ग्रामीणों को वैक्सीन के महत्व समझाए, ग्रामीणों के लिए पौष्टिक सोया पंजीरी का वितरण करवाया । उस गांव के साथ साथ अन्य चार गांवों में नेत्र शिविर आयोजित करवाए । एक अच्छे कार्य के लिए मेरे मित्रों और बैतूल के कुछ नागरिकों ने जी भरकर जन परिषद की पीठ ठोकी । और बस यही से जन परिषद की रचनात्मक यात्रा का असली प्रादुर्भाव हुआ ।
लगभग उसी दौरान बैतूल में एन के त्रिपाठी, पुलिस अधीक्षक बनकर आ गए। उनकी सहजता, तर्कसंगत एवं रचनात्मक कार्यों को पूरा संरक्षण प्रदान करने , छोटे एवं अभावग्रस्त लोगों को भी पूरी तब्बजो देने जैसी अनेक ऐसी बातें थी जो हम युवकों को पूरी तरह भा गईं और उन्हें शायद हम लोगों की लगन और प्रतिबद्धता और बस यहीं से प्रारंभ हुआ जन परिषद की पगडंडियों से राजमार्गों की रचनात्मक यात्रा की शुरुआत । वे, डॉ मंगल प्रसाद अग्रवाल और विजय खंडेलवाल जी ( कालांतर में जो तीन बार बैतूल हरदा के सांसद भी चुने गए थे ) हमारे प्रमुख मार्गदर्शक और व्यवहारिक रूप में हमारे संरक्षक बन गए ।
बस फिर क्या था जन परिषद गैलेपिंग करने लगी । आज त्रिपाठी जी की डायनेमिक लीडरशिप, सभी सीनियर मेंबर्स के आशीर्वाद और मित्रों के संबल से, जन परिषद पूरे देश में 275 से अधिक चैप्टर्स का समृद्ध परिवार बन चुका हैं । ढेर सारी उपलब्धियां और प्रतिष्ठित अतिथियों का जन परिषद में आना, हमारे उत्साह को दिन दूनी रात चौगुना बढ़ा रहा है ।
आज उनको स्मरण करने का भी दिन है
दोस्तो, आज जनपरिषद जिस मुकाम पर है, उसका श्रेय निश्चित रूप से हमारे चेयरमैन एवं पूर्व डीजीपी श्री एन के त्रिपाठी सर की डायनेमिक लीडरशिप, सबके प्रति समभाव एवम हमारे अन्य वरिष्ठ पदाधिकारियों के मार्गदर्शन एवम दोस्तों की जिंदादिली को जाता है।
36 वर्ष की यात्रा कम नहीं होती इसलिए आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो हमें ऐसे कई मित्रों की याद आती है जो उस समय भीषण गर्मी या ठंड में भी मोटरसाइकिलों पर पूरे आनंद के साथ काम करते रहे और जनपरिषद का झंडा उठाए रहते थे द्य पर हां उनकी आंखों में एक सपना था, एक जुनून था कि जन परिषद को रचनात्मकता का एक अभूतपूर्व कारवां बनाना है, और कालांतर में यही सपना हम सबकी ताकत बनती गई।
आज एसी कारों में भी जब हमें थकान का एहसास होने लगता है तो वो मोटरसाइकिल पर घूमने वाले दिन हमें रोमांचित भी करते हैं और प्रेरित भी द्य इसी प्रक्रिया से जन परिषद को और लोग मिलते गए और मिलते जा रहे हैं द्य और हम भी शनै शनै अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जा रहे हैं द्य प्रभु से प्रार्थना करते हुए कि वो अपना आशीर्वाद हम सबको इसी प्रकार प्रदान करते रहें। संस्था की जो भी उपलब्धियां हैं वे इस मायने में उल्लेखनीय हैं कि संस्था ने जो कुछ भी थोड़ा बहुत अर्जित किया है ,वह अपने सदस्यों की मेहनत और लगन से किया है। जबसे जन परिषद के देश भर में 275 और विदेशों में 7 चैप्टर्स बने हैं तबसे हमारी सक्रियता और उपलब्धियों में चार चांद लग गए हैं द्य सभी चैप्टर्स के प्रति साधुवाद।
इस लंबी किंतु निष्कलंक यात्रा में, कष्ट भी कम नहीं हुए। हमारे कई समर्पित दोस्त एक के बाद एक, दुनिया छोड़ते गए। किसी भी दोस्त के जाने पर थोड़ा ठहराव भी आ जाता था , तब हमें मुकेश जी की ये पंक्तियां काफी प्रेरित करती थीं कि , है कौन सा वो इंसान यहां पर जिसने दुख न झेला……….. इस गाने से प्रेरित होकर और उन्हीं मित्रों के सपनों की कसम खाकर हम बाकी लोग फिर आगे बढ़ते रहे इसी क्रम में कई नए और बहुत अच्छे सहयात्री भी मिलते गए द्य सबका उल्लेख तो नही किया जा सकता ,लेकिन हां सबके प्रति साधुवाद जरूर व्यक्त करना चाहता हूं।
व्यक्तिगत तौर पर मैं पूरी कोशिश करता हूं कि किसी की भी भावनाओं को आहत न करूं, लेकिन जन परिषद के संयोजक के नाते जाने अनजाने मेरे किसी भी कृत्य या कथन से कोई आहत हुआ हो तो मैं हमेशा की तरह क्षमायाचना में भी पीछे नहीं रहता हूं द्य आज भी मैं उसी भाव से, आप सबको प्रणाम करता हूं ।



