“मिट्टी की प्रतिमा है शास्त्रसम्मत” – मातृशक्ति संगठन का पर्यावरण बचाने का आह्वान
प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों से जल प्रदूषण और जलीय जीवों पर संकट; संगठन ने की मिट्टी से निर्मित प्रतिमाओं के पूजन और विसर्जन की अपील
Seoni 23 August 2025
सिवनी यशो:- धार्मिक उत्सवों में गरिमा और विधिविधान से पूजन करने की परंपरा का विशेष महत्व है।
लेकिन आधुनिक और डिजिटल युग में पारंपरिक त्यौहार धीरे-धीरे अपनी धार्मिक महत्ता खोते जा रहे हैं।
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इसी मुद्दे पर मातृशक्ति संगठन ने इस वर्ष भी समाज को सजग करते हुए संदेश दिया है कि त्यौहार न केवल श्रद्धा से बल्कि पर्यावरण की सुरक्षा को ध्यान में रखकर मनाए जाएं।
संगठन का कहना है कि केवल पौधारोपण कर देना ही पर्यावरण को सुरक्षित नहीं कर सकता।
जब तक पॉलीथिन और थर्माकोल जैसे हानिकारक पदार्थों का उपयोग बंद नहीं होगा, तब तक पर्यावरण संरक्षण अधूरा रहेगा।
गणेश प्रतिमा निर्माण पर चिंता
संगठन ने बताया कि गणेश उत्सव, जिसे देशभर में लगभग 128 सालों से मनाया जा रहा है,
प्रारंभ में मिट्टी से निर्मित प्रतिमाओं के साथ होता था।
लेकिन आजकल इनकी जगह प्लास्टर ऑफ पेरिस और सिंथेटिक रंगों से बनी प्रतिमाएँ स्थापित की जा रही हैं।
इन रंगों के पानी में न घुलने से न केवल जल प्रदूषण फैलता है, बल्कि नदियों और तालाबों में
विसर्जन के बाद जलीय जीव-जंतुओं की जान को खतरा होने के साथ-साथ जल स्रोतों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
शास्त्रसम्मत परंपरा का महत्व
संगठन का मानना है कि सनातन धर्म में शास्त्रों के अनुसार पूजन हेतु मिट्टी की प्रतिमा ही सर्वोत्तम मानी जाती है।
जैसे शिव अभिषेक के लिए मिट्टी का शिवलिंग बनाया जाता है,
उसी तरह गणेश प्रतिमा भी नदी तट की मिट्टी से बनाने पर शुभ फल और मनोवांछित लाभ प्राप्त होता है।
विसर्जन की गरिमा बनाए रखने की अपील
संगठन ने यह भी कहा कि कुछ वर्षों से मूर्ति विसर्जन उत्सव डीजे की धुन, शराब और फूहड़ नृत्य में बदल गया है, जो पूरी तरह गलत है।
इसलिए समिति ने गणेशोत्सव समितियों और श्रद्धालुओं से अपील की है कि मूर्ति विसर्जन मुहूर्त अनुसार, एक ही दिन में, पारंपरिक तरीके से किया जाए।
संगठन का संदेश साफ है – “हमारी संस्कृति की सुरक्षा और सम्मान हमारे अपने हाथों में है।”



