खैरात की राजनीति में कैद युवा भविष्य, बन गया है दया का पात्र
विशेष सम्पादकीय : विशेष संपादकीय दैनिक यशोन्नति
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✦ विशेष सम्पादकीय ✦
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लेखक – मनोज मर्दन त्रिवेदी
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भारत आज़ादी का 79वाँ वर्ष मना रहा है। यह गर्व का क्षण होना चाहिए कि हम विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश हैं और सबसे अधिक युवा शक्ति हमारे पास है।
किंतु, विडंबना यह है कि यही युवा शक्ति आज सरकारों और समाज की “दया” पर जीवन यापन करने को विवश है।
बदलते दौर की चिंता
आज का समय तकनीक और नवाचार का है। लेकिन, हमारे बच्चे और युवा मोबाइल गेम्स की लत, फूहड़ रीलों और सतही मनोरंजन में उलझे हुए हैं।
शिक्षा और तकनीकी दृष्टि से पिछडऩे के कारण, यह युवा वर्ग देश की रीढ़ बनने की बजाय नौकरी और अवसर के लिए सरकार का मोहताज होता जा रहा है।
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युवाओं की ताकत, लेकिन बिना विजन
भारत के पास चीन से अधिक युवा हैं, जबकि चीन वृद्ध होता राष्ट्र है।
फिर भी चीन छोटी-छोटी वस्तुएं निर्यात करके हमारी अर्थव्यवस्था से लाभ कमा रहा है और हम दीपावली की झालर तक आयात कर रहे हैं।
हमारे युवा पान की दुकानों और चौक-चौराहों पर देश-दुनिया की चर्चाओं में समय गँवाते हैं।
वे जानते हैं कि कौन सा मंत्री भ्रष्ट है या किस अफसर के यहाँ छापा पड़ा,
परंतु स्वयं के भविष्य की चिंता और परिवार की जिम्मेदारी उठाने की क्षमता उनके पास नहीं है।
राजनीति की दया पर युवा
आज की सरकारें युवाओं को सशक्त बनाने की ठोस योजना नहीं देतीं।
केवल चुनावी वादों और “युवा कल्याण” नामक योजनाओं में कुछ हजार रुपये बाँटकर वोट बैंक मजबूत किया जाता है।
परिवार चलाने, रोजगार देने और आत्मनिर्भर बनाने के बजाय दया दिखाने वाली योजनाएँ लागू होती हैं।
युवाओं को नौकरी और प्रशिक्षण देकर स्थायी समाधान देने की जगह खैरात की संस्कृति विकसित की जा रही है।
मुफ्त योजनाएँ बनाम स्थायी समाधान
आज देश और प्रदेश की सरकारें मुफ्त योजनाओं की झड़ी लगा रही हैं।
किसानों को हजारों करोड़ की सहायता, गरीबों को मुफ्त राशन, मकान योजनाएँ,
शादी के लिए राशि, बच्चे के जन्म पर राशि, अंतिम संस्कार के लिए राशि, और महिलाओं को मासिक भत्ता।
यह सब सुनने में भले आकर्षक लगे, पर सवाल यह है कि क्या इस तरह की खैरात से समाज आत्मनिर्भर बनेगा?
गरीबी खत्म होगी या और गहरी होगी?
असल ज़रूरत है:
युवाओं को बेहतर शिक्षा और रोजगार उपलब्ध कराना
किसानों को सिंचाई, तकनीकी साधन और फसलों का उचित मूल्य देना
मजदूरों के लिए मजदूरी दर बढ़ाना
महिलाओं को मुफ्त राशि देने के बजाय काम देकर पारिश्रमिक प्रदान करना
सहकारी संस्थाओं को मजबूत कर स्वरोजगार और उत्पादन आधारित विकास की दिशा में बढऩा
विवेकानंद की पुकार
स्वामी विवेकानंद ने कहा था – “उठो, जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक मत रुको।”
आज वही संदेश फिर प्रासंगिक है-
भारत तभी सशक्त होगा जब युवा दया पर जीने की आदत छोड़कर पुरुषार्थ का मार्ग अपनाएँगे।
गणतंत्र की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब युवा सरकारों की नीतियों को अपनी सोच और संकल्प से दिशा देंगे।
निष्कर्ष
मुफ्त योजनाओं से तात्कालिक राहत मिल सकती है, पर स्थायी समाधान कभी नहीं।
युवाओं को दया का पात्र बनाना किसी गुलामी से कम नहीं है।
भारत तभी आत्मनिर्भर बनेगा जब युवा शक्ति खैरात नहीं, बल्कि अपने अधिकार और अवसर प्राप्त करने की दिशा में संकल्पित होगी।



