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श्रीराम की शरण मे आए विभीषण, अंगद ने किया युद्ध घोष

  छिंदवाड़ा यशो:-  श्रीरामलीला का चौदह दिवसीय मंचन के ग्याहरवें दिवस का मंचन किया गया। मण्डल के संरक्षक कस्तूरचन्द जैन ने बताया कि रावण अपने दरबार मे गुप्तचर द्वारा सूचना दी गई कि श्रीराम की सेना ने लंका पर चढ़ाई की योजना बना ली है। यह समाचार सुनकर विभीषण रावण को ज्ञान एवं नीति के उपदेश स्मरण करवाते है इससे क्रोधित होकर रावण विभीषण पर पैरों से प्रहार कर उन्हें देश से बाहर जाने का आदेश देता है। लंका से निकाले जाने के बाद विभीषण श्रीराम की शरण मे चले जाते है एवं उनसे मित्रता करते है। श्रीराम विभीषण को “लंकेश्वर” कहकर संबोधित करते है एवं उन्हें लंका का राजा घोषित करते है। इसके उपरांत योजना अनुसार श्रीराम जी की सेना समुद्र पर सेतू बंधान करती है एवं एल. ई. डी. के माध्यम से दृश्य को बखूबी तरह से मंचन किया गया।
 श्री राम , लक्ष्मण, हनुमानजी, सुग्रीव, विभीषण एवं जामवंत सम्पूर्ण सेना सहित लंका की सीमा में प्रवेश करते है। श्रीराम की आज्ञा पाकर युवराज अंगद रावण से संधि का प्रस्ताव लेकर निकलते है। हनुमानजी के लंका दहन एवं श्रीराम के समुद्र सेतू पार करने से रावण चिंतित होता है एवं उसके दस शीश एक साथ बोल पड़ते है। श्रीराम की आज्ञा से अंगद जी लंका की राज सभा के लिए निकलते है मार्ग में रावण के पुत्र राजकुमार से युद्ध होता है एवं अंगद जी उसका वध करते है। 
राजसभा में पहुँचकर अंगद जी रावण को जानकी को वापस करने एवं न करने पर भयंकर परिणाम के विषय मे बताते है। अहंकार के मद में चूर रावण अंगद की कोई बात नही सुनता अंत मे अंगद राजसभा में अपने पैर को जमा लेते है एवं चुनौती देते है कि यदि कोई सभासद तनिक मात्र भी पैर हिला देगा तो श्रीराम जानकी को हार जाएंगे। सभी सभासद प्रयास करने परन्तु सभी निष्फल हो जाते है। इस प्रकार अंगद जी अपनी बुद्धि एवं बल का परिचय देकर युद्ध की घोषणा करते है। मण्डल के हर्षित विश्वकर्मा ने बताया कि राम भोग के सहयोगी अनिल चौरसिया, मनीष बहोत  एवं भाग्यशाली दर्शक योजना के सहयोगी बालाजी सेवा समिति रहे।

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