गुरू ईश्वररूपी साध्य को प्रदान करने का पवित्र साधन है – स्वामी प्रज्ञानानंद
सिवनी 10 अप्रैल 2023
सिवनी यशो:- नारायण ब्रम्ह तत्व है और ब्रम्ह का जो शेष है वह सदगुरू गुरूतत्व है । गुरूतत्व का जीवन में सबसे महत्वपूर्ण स्थान है गुरूतत्व को जान लेने से ईश्वर की प्राप्ति होती है गुरू ईश्वररूपी साध्य को प्रदान का साधन होता है । उक्त उद्गार ब्रम्हलीन द्विपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी सरस्वती जी महाराज के परम प्रिय शिष्य महामंडलेश्वर दंडी स्वामी प्रज्ञानानंद जी महाराज ने राजश्री पैलेस में भागवत कथा की ज्ञान गंगा का प्रवाह करते हुये गुरूतत्व की महिमा का वर्णन करते हुये व्यक्त किये स्वामी जी ने कहा कि गुरूतत्व में एक विशेष आकर्षण है पता नहीं कब गुरू तुम्हें पुकार ले और दिव्य अलंकारों से महिमा मंडित कर दे गुरू की कृपा सच्चे अनुयायी को प्राप्त हो ही जाती है और गुरू के प्रति शरणागति उसे परमात्मा से मिलाने का साधन बनता है । स्वामी जी ने भागवत कथा के परम पवित्र गुरूतत्व की महिमा को प्रतिपादित करते हुये कहा कि गरूतत्व ब्रम्ह तत्व का वह शेष भाग है जो जीवन को आलोकित करता है जैसे दूध में शेषांश घृत होता है पर उसे मथने के बाद प्राप्त किया जाता है और वह घृत प्रकाश की सामर्थ रखता है वैसे ही ब्रम्हतत्व का शेष गुरूतत्व है जो शिष्य के जीवन को प्रकाशित करता है ।
भगवत कथा के पुण्य प्रवाह के दौरान संतश्री ने कहा कि संसार का निर्माण प्रेम से हुआ है वासना से नहीं हुआ और प्रेम का स्वरूप स्वयं भगवान है । उन्होंने कहा कि रामचरित मानस प्रयोग का ग्रंथ है जिसमें मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम ने नर रूप में आदर्श प्रस्तुत किया है और इसमें उनका पूरा चरित्र मानव जीवन को जीने की विधि को प्रतिपादित करती है रामचरित मानस के हर पात्र की भूमिका अनुकरणीय है । गीता योग का शास्त्र है भागवत कथा वियोग का शास्त्र है ।
उन्होंने कहा कि जीवन में दुखों को दूर करने के लिए श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए। जो विपत्ति में भी भगवान का भजन कीर्तन कर लेता है उसके जीवन मे विपत्ति समाप्त हो जाती है लेकिन जो जीवन के विपत्ति में भी भगवान नाम का स्मरण नहीं करता वो व्यक्ति दुर्भाग्यशाली होता है। उन्होंने गुरूतत्व की महिमा का सुंदर वर्णन किया । महाराजश्री ने कहा कि सांसारिक जीवन का निर्वहन करते हुये भी भगवत निष्ठा, गुरु निष्ठा, वेद निष्ठा रहना चाहिए। प्रेम में न राग न द्वेष दोनों नहीं होना चहिए। जगत में जब तक ठोकर नहीं मिलेगी हम सुधर नहीं सकते। उन्होंने बताया कि प्रेम किसी शर्त से किया जा नहीं सकता।प्रेम बंधन से भी नहीं होता। प्रेम में समर्पण का भाव होना चाहिए, प्रेम लेना नहीं देना होता है।प्रेम में दैन्य भाव का विशुद्धम स्वरूप है।प्रेम से श्रीकृष्ण को पाने के लिए दीनता होनी चहिए, भगवत प्राप्ति के लिए साधन संपत्ति नहीं दीनता का होना जरूरी है।राग और द्वेष दोनों श्रेष्ठम प्राप्ति के अवरोधक हैं।प्रेम की धारा का श्रेष्ठम स्वरूप ही भगवान की ओर समर्पित करती है।राग व द्वेष के मिट जाने के बाद बचा हुआ तत्व ही भागवत तत्व है।जो कि प्रेम की धारा का श्रेष्ठम स्वरूप ही भगवान की ओर समर्पित करता है।



