चार वन रेंज समाप्त, कुरई उपवनमंडल सिवनी में हुआ मर्ज — प्रशासनिक कदम या वनों की सुरक्षा से खिलवाड़?
सीमा विवाद खत्म करने और क्षेत्रफल संतुलित रखने के नाम पर उठाया गया कदम, लेकिन उठे गंभीर सवाल

सिवनी यशो :- जिले के वन क्षेत्रों की संरचना में बड़ा बदलाव किया गया है। दक्षिण सामान्य वन मंडल की चार पुरानी रेंजों को समाप्त कर उन्हें अन्य रेंजों में मिला दिया गया है। साथ ही कुरई उपवनमंडल को भी समाप्त कर सिवनी उपवनमंडल में मर्ज कर दिया गया है। विभाग का दावा है कि यह कदम प्रशासनिक सुविधा और सीमा विवाद खत्म करने के लिए आवश्यक था, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे वनों की सुरक्षा से खिलवाड़ माना जा रहा है।
कौन-सी रेंज कहाँ हुई मर्ज?
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कान्हीवाड़ा रेंज → केवलारी रेंज में शामिल
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रुखड़ रेंज → बरघाट रेंज में शामिल
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खवासा रेंज → कुरई रेंज में शामिल
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बंडोल रेंज → सिवनी उपवनमंडल में शामिल
नया ढांचा
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सिवनी उपवनमंडल : सिवनी (13,416.73 हेक्टेयर), कुरई (22,856.14 हेक्टेयर), बंडोल (शामिल),
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केवलारी उपवनमंडल : केवलारी (21,193.75 हेक्टेयर) और बरघाट (18,546.50 हेक्टेयर)कान्हीवाड़ा व रुखड़ (मर्ज होकर)
विभाग का तर्क
वन विभाग का कहना है कि कई रेंजों का क्षेत्रफल बहुत कम था। मानक के अनुसार किसी भी रेंज का दायरा 15 से 25 हजार हेक्टेयर होना चाहिए। असमानता को दूर करने और राजस्व व वन प्रकरणों से जुड़े सीमा विवादों को खत्म करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
गंभीर सवाल
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह प्रशासनिक “सुधार” वनों की सुरक्षा को कमजोर नहीं कर देगा?
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समाप्त हुई रेंजें वर्षों पुरानी थीं और अपने-अपने क्षेत्र में अपराध नियंत्रण की दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।
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सिवनी जिले के जिन इलाकों की रेंजें खत्म की गईं, वहाँ वन अपराध पहले से ही अधिक हैं।
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अब उन्हें उन रेंजों में जोड़ दिया गया है जहाँ पहले से ही कर्मचारियों की कमी और कार्यक्षेत्र का बोझ है।
जनचिंता
स्थानीय लोगों का मानना है कि जब सरकार हर मंच से वृक्षारोपण और हरित क्रांति की बातें करती है, तब रेंजों का विलोपन कहीं न कहीं उसके वादों और कार्यों की पोल खोल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी टिप्पणी की है कि “एक वृक्ष की कटाई, एक हत्या के समान है।” ऐसे में रेंज घटाना सीधी-सीधी वनों की सुरक्षा से समझौता है।
सरकार और वन विभाग पर सवाल
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क्या वन विभाग केवल “वेतन बचाने” और प्रशासनिक संतुलन के नाम पर सफेद हाथी साबित हो रहा है?
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वनों की वृद्धि और संरक्षण की दिशा में विभागीय तंत्र कमजोर क्यों रहा, इसकी कभी समीक्षा क्यों नहीं हुई?
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सरकार को रेंज घटाने के बजाय अमला बढ़ाने और रेंज विस्तार पर जोर नहीं देना चाहिए था?



