घर घर स्वच्छ जल’ अभियान के बीच सिवनी में दूषित पेयजल पर बड़ा सवाल, मंत्रालय तक पहुंची शिकायत
तिलक वार्ड के लडैया मोहल्ला में पेयजल गुणवत्ता पर विवाद, PHE विभाग ने लिया नमूना; RTI के जरिए मांगी गई लैब रिपोर्ट, परीक्षण प्रक्रिया और कार्रवाई का पूरा रिकॉर्ड
सिवनी यशो :-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘हर घर स्वच्छ जल’ संकल्प और जल जीवन मिशन के बीच सिवनी शहर के तिलक वार्ड स्थित लडैया मोहल्ला में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर उठे सवाल अब राज्य स्तर तक पहुंच गए हैं।
नागरिकों द्वारा लगातार की गई शिकायतों, आरटीआई आवेदनों और उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के आधार पर मध्यप्रदेश शासन के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) तथा संबंधित मंत्रालय ने मामले का संज्ञान लिया है।
शिकायत के अनुसार क्षेत्र में कई दिनों तक गंदला एवं संदिग्ध पेयजल की आपूर्ति हुई, जिससे स्थानीय लोगों में स्वास्थ्य संबंधी चिंता बढ़ गई।
शिकायत मिलने के बाद लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने जल का नमूना एकत्र कर जिला जल परीक्षण प्रयोगशाला, सिवनी में जांच कराई। जारी परीक्षण रिपोर्ट में भौतिक, रासायनिक तथा जीवाणु संबंधी परीक्षण का उल्लेख किया गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) तथा भारतीय मानक ब्यूरो BIS IS 10500:2012 के अनुसार सुरक्षित पेयजल में प्रत्येक 100 मिलीलीटर नमूने में E. coli और Total Coliform का स्तर शून्य होना चाहिए।
इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने परीक्षण पद्धति, नमूना संग्रह की प्रक्रिया, प्रयोगशाला रिकॉर्ड तथा रिपोर्ट में दर्ज जीवाणु संबंधी निष्कर्षों की पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत शिकायतकर्ता ने जल परीक्षण की मूल लैब रिपोर्ट, Method of Test, गुणवत्ता नियंत्रण रिकॉर्ड, नमूना संग्रह पंचनामा, निरीक्षण रिपोर्ट, प्रयोगशाला रजिस्टर की प्रमाणित प्रतियां तथा संबंधित अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई का विस्तृत विवरण मांगा है।
मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि केंद्र सरकार जल जीवन मिशन के माध्यम से प्रत्येक नागरिक तक सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य लेकर कार्य कर रही है।
ऐसे में यदि किसी क्षेत्र में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर शिकायत सामने आती है तो उसका वैज्ञानिक परीक्षण और पारदर्शी समाधान आवश्यक माना जाता है।
शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या विभाग पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर पेयजल गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच कराना और नागरिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
उनका कहना है कि यदि जांच रिपोर्ट और प्रयोगशाला अभिलेख सार्वजनिक किए जाते हैं तो भविष्य में पेयजल गुणवत्ता की निगरानी और अधिक प्रभावी हो सकेगी।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि मध्यप्रदेश शासन, जिला प्रशासन और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग इस मामले में आगे क्या कार्रवाई करते हैं तथा क्या जांच से जुड़े सभी अभिलेख सार्वजनिक किए जाएंगे।



