बेटी दो कुलों की मर्यादा बचाती है, दहेज नहीं संस्कार से बनता है परिवार
शिव महापुराण कथा में महंत विपिन बिहारी दास का संदेश—विवाह सौदा नहीं संस्कारों का बंधन, बेटियों को दहेज नहीं अच्छे संस्कार देकर विदा करें
बेटी दो कुलों की मर्यादा बचाती है, दहेज नहीं संस्कार से बनता है परिवार
Seoni 22 August 2026
सिवनी यशो:- पावन श्रावण मास की आध्यात्मिक बेला में भगवान भोलेनाथ की भक्ति से सिवनी विधानसभा क्षेत्र सराबोर है। विधायक दिनेश राय मुनमुन द्वारा राशि लॉन में आयोजित सात दिवसीय भव्य एवं दिव्य संगीतमय शिव महापुराण कथा के पांचवें दिन शनिवार को सांवरे सरकार गौ पीठाधीश्वर परम पूज्य महंत श्री विपिन बिहारी दास जी महाराज ने शिव-पार्वती विवाह प्रसंग के माध्यम से विवाह संस्था, बेटियों के सम्मान, दहेज प्रथा और पारिवारिक संस्कारों पर गहरा सामाजिक संदेश दिया।

महंत जी ने कहा कि विवाह दो व्यक्तियों का ही नहीं, दो परिवारों और दो संस्कारों का मिलन है। इसलिए विवाह का आधार रूप, धन और दहेज नहीं, बल्कि चरित्र, संस्कार, आपसी सम्मान और परिवार को जोड़कर रखने की क्षमता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज को यह तय करना होगा कि बेटी की विदाई दहेज के बोझ के साथ होगी या संस्कारों और सम्मान के साथ।
बेटी दो कुलों की मर्यादा बचाती है
शिव-पार्वती विवाह प्रसंग में माता पार्वती के रूप में बेटी के जन्म को सौभाग्य बताते हुए महंत जी ने कहा कि भारतीय परंपरा में बेटी को केवल एक परिवार की संतान नहीं माना गया, बल्कि उसे दो कुलों की मर्यादा की वाहक माना गया है।
उन्होंने कहा कि बेटा संस्कारी हो तो वह माता-पिता को मृत्यु के बाद जल दे सकता है, लेकिन संस्कारी बेटी अपने मायके और ससुराल दोनों में जीते-जी सम्मान, प्रेम और संस्कारों की रोशनी फैला सकती है।
“बेटा एक कुल का तारक हो सकता है, लेकिन बेटी दो कुलों की लाज बचाने वाली होती है।”
उन्होंने कहा कि इसलिए बेटी को दहेज के रूप में सामान देने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उसे शिक्षा, आत्मसम्मान, संस्कार और जीवन जीने की समझ देना।

दहेज विवाह नहीं, रिश्ते का सौदा
दहेज प्रथा पर तीखा प्रहार करते हुए महंत जी ने कहा कि विवाह के नाम पर लाखों रुपये की मांग करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। विवाह यदि धन, वाहन, मकान, आभूषण या अन्य सामान की शर्त पर हो रहा है तो वह पवित्र संबंध कम और सौदेबाजी अधिक बन जाता है।
उन्होंने समाज से सवाल किया कि जिस बेटी के पिता ने उसे जन्म दिया, पढ़ाया-लिखाया और संस्कार दिए, उसी पिता से विवाह के समय लाखों रुपये की मांग क्यों की जाए?
उन्होंने कहा कि बेटी कोई सौदा नहीं है और न ही विवाह कमाई का माध्यम।
महंत जी ने युवाओं और अभिभावकों से आह्वान किया कि दहेज प्रथा को समाप्त करने की शुरुआत दूसरों से नहीं, अपने घर से करें। बेटे के माता-पिता स्वयं घोषणा करें कि उन्हें विवाह में दहेज नहीं चाहिए और बेटा भी दहेज लेने से साफ इनकार करे।
दहेज के बजाय बेटी को दें जीवन की पूंजी
महंत जी ने कहा कि बेटी को विवाह के समय महंगी वस्तुएं देने के बजाय उसे ऐसी पूंजी देकर विदा किया जाना चाहिए, जो पूरी जिंदगी उसके साथ रहे।
शिक्षा, संस्कार, आत्मविश्वास, अच्छे व्यवहार की समझ, आर्थिक समझ और भगवान के प्रति आस्था—यही बेटी की वास्तविक पूंजी है।
उन्होंने कहा कि दहेज में दिया गया सामान समय के साथ पुराना हो सकता है, वाहन बदल सकता है, आभूषण बिक सकते हैं, लेकिन संस्कार कभी पुराने नहीं होते।
एक संस्कारी बेटी जिस घर में जाती है, वहां केवल एक सदस्य के रूप में प्रवेश नहीं करती, बल्कि अपने साथ मायके की संस्कृति और संस्कार भी लेकर जाती है।
बहू को दहेज से नहीं, बेटी के रूप में स्वीकार करें
महंत जी ने कहा कि बेटे के विवाह के बाद घर में आने वाली बहू को उसके मायके से आए सामान के आधार पर सम्मान देना भारतीय संस्कृति नहीं है। बहू को परिवार का हिस्सा और बेटी के समान सम्मान मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि बहू संस्कारी और परिवार को जोड़कर रखने वाली है तो वह साधारण घर को भी स्वर्ग बना सकती है। इसके विपरीत यदि घर में प्रेम और सम्मान का अभाव हो तो बड़े से बड़ा भवन भी अशांति का कारण बन सकता है।
उन्होंने कहा कि सास-बहू, पति-पत्नी और माता-पिता के रिश्तों में सबसे महत्वपूर्ण धन नहीं, संवाद और सम्मान है।
सुंदरता से अधिक संस्कार जरूरी
शिव-पार्वती विवाह का संदर्भ देते हुए महंत जी ने कहा कि विवाह में बाहरी रूप से अधिक व्यक्ति के संस्कार और स्वभाव को महत्व देना चाहिए।
उन्होंने पुराने समय का उदाहरण देते हुए कहा कि बुजुर्ग लड़की देखने जाते थे तो केवल चेहरा नहीं देखते थे, बल्कि उसके व्यवहार और बुद्धिमत्ता को भी समझने का प्रयास करते थे। सूई और कैंची के उदाहरण के माध्यम से उन्होंने बताया कि सूई जोड़ने का काम करती है और कैंची काटने का।
इसका संदेश यह है कि विवाह में ऐसे संस्कार चाहिए जो रिश्ते जोड़ें, परिवार जोड़ें और दिल जोड़ें।
उन्होंने कहा कि यही बात लड़कों पर भी लागू होती है। बेटियों के लिए संस्कारी जीवनसाथी आवश्यक है तो बेटों को भी यह समझना चाहिए कि जीवनसंगिनी केवल सुंदरता या संपन्नता का नाम नहीं, बल्कि जीवनभर साथ निभाने वाली साथी है।

माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी संस्कार देना
महंत जी ने कहा कि बेटी की विदाई केवल एक रस्म नहीं है। यह माता-पिता द्वारा वर्षों तक दिए गए संस्कारों की परीक्षा भी है।
उन्होंने कहा कि पहले माता-पिता बेटी को विदा करते समय केवल कपड़े और सामान नहीं देते थे, बल्कि उसे जीवन जीने की सीख देते थे—ससुराल में बड़ों का सम्मान करना, परिवार को जोड़कर रखना, छोटी-छोटी बातों को विवाद न बनने देना और पति-पत्नी एक-दूसरे का सम्मान करना।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता आवश्यक है, लेकिन आधुनिकता के साथ संस्कारों का जीवित रहना भी उतना ही आवश्यक है।
दहेज की मांग करने से पहले अपने घर की बेटी को याद करें
महंत जी ने दहेज लेने वाले परिवारों को आत्ममंथन का संदेश देते हुए कहा कि किसी के घर से दहेज मांगने से पहले यह सोचना चाहिए कि वह भी किसी बेटी का पिता है।
आज यदि हम किसी दूसरे पिता की मजबूरी का फायदा उठाकर दहेज मांगेंगे तो कल वही सामाजिक व्यवस्था हमारे अपने परिवार के सामने भी खड़ी हो सकती है।
उन्होंने कहा कि समाज में परिवर्तन कानून से जितना आएगा, उससे कहीं अधिक परिवारों की सोच बदलने से आएगा।
बेटे के पिता को यह कहना होगा—“हमें दहेज नहीं चाहिए।”
और बेटे को कहना होगा—“मैं दहेज लेकर विवाह नहीं करूंगा।”
यही दहेज विरोधी आंदोलन की वास्तविक शुरुआत होगी।
शिव-पार्वती विवाह देता है समानता और सम्मान का संदेश
महंत जी ने कहा कि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हमें यह सिखाता है कि विवाह में बाहरी दिखावे से अधिक आत्मिक संबंध महत्वपूर्ण है। भगवान शिव का स्वरूप वैभव और राजसी ठाठ से अलग था, फिर भी माता पार्वती का विश्वास उनके प्रति अटूट रहा।
उन्होंने कहा कि पार्वती जी की तपस्या केवल पति प्राप्त करने की कथा नहीं है, बल्कि दृढ़ संकल्प, विश्वास और समर्पण की कथा है।
इसी प्रकार विवाह में भी पति-पत्नी को एक-दूसरे के प्रति विश्वास और सम्मान बनाए रखना चाहिए।
संतों का संदेश समाज सुधार की दिशा दिखाता है
महंत जी ने कहा कि संतों का कार्य केवल कथा सुनाना नहीं, बल्कि समाज को उसकी कमजोरियों का आईना दिखाना भी है। यदि किसी सामाजिक कुरीति के कारण परिवार टूट रहे हैं तो उस पर बात करना भी धर्म का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि दहेज, नशा, निंदा, अहंकार और पारिवारिक कलह जैसी बुराइयों से समाज को बचाने के लिए धार्मिक आयोजनों को सामाजिक जागरण का माध्यम बनाना चाहिए।
बेटी को बोझ नहीं, संस्कारों की धरोहर समझें
महंत जी ने कहा कि जिस घर में बेटी का जन्म होता है, वहां उसे बोझ समझने के बजाय भगवान का आशीर्वाद समझना चाहिए।
बेटी को दहेज के लिए बचत करने की चिंता करने के बजाय उसकी शिक्षा और संस्कारों में निवेश किया जाए। उसे अपने पैरों पर खड़े होने का आत्मविश्वास दिया जाए और जीवनसाथी चुनने के मामले में भी उसकी समझ और सहमति का सम्मान किया जाए।
उन्होंने कहा कि बेटी को इतना मजबूत बनाइए कि वह किसी के दहेज की कीमत नहीं, अपने संस्कारों की पहचान बने।
भक्ति और संस्कार से बनेगा स्वस्थ समाज
प्रवचन के अंत में महंत श्री विपिन बिहारी दास जी महाराज ने कहा कि भगवान शिव की कथा केवल पूजा और अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। इसमें जीवन को बेहतर बनाने का संदेश छिपा है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से भगवान का नाम जपने, अहंकार छोड़ने, निंदा से बचने, संतों का सम्मान करने, बेटियों को संस्कार देने और दहेज जैसी कुरीतियों के खिलाफ खड़े होने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा—
“बेटी को दहेज नहीं, संस्कार देकर विदा करें; बहू को सामान नहीं, बेटी समझकर घर में स्थान दें और विवाह को सौदा नहीं, संस्कारों का पवित्र बंधन बनाएं।”
यही सोच परिवार को मजबूत करेगी, बेटियों को सम्मान देगी और समाज को दहेज जैसी कुरीति से मुक्त करने की दिशा में वास्तविक कदम साबित होगी।
विधायक दिनेश राय मुनमुन द्वारा आयोजित संगीतमय शिव महापुराण कथा में धार्मिक अनुष्ठान के तहत आज आरती सरस्वती शिशु मंदिर परिवार की ओर से नितिन चौधरी अध्यक्ष, मनोज मर्दन त्रिवेदी कोषाध्यक्ष, ओमप्रकाश यादव प्राचार्य, गायत्री परिवार से सुंदर लाल बघेल ट्रस्टी, अशोक कुम्हारे, केसी राहंगडाले, रामसिंह राहंगडाले, शकुन पटेल, सुशीला राहंगडाले, पवार समाज से एसपी हरिनखेड़े, टीएन परिहार, अनिल बिसेन, भरत राहंगडाले, सूर्यपाल बोपचे, साहू समाज से शिवप्रसाद साहू, सुनील साहू अध्यक्ष, राजू साहू, मुरारीलाल साहू, सीताराम साहू, यादव समाज से राजू यादव, श्यामलाल यादव, मायाराम यादव, अकण यादव, सुनील यादव, रामकुमार यादव, कुलदीप यादव, प्रकाश यादव, रत्नेश यादव, संदीप यादव, चंद्रवंशी (गौली) समाज संगठन से गंगाराम चंद्रवंशी अध्यक्ष, पन्नालाल चंद्रवंशी, गुलाब चंद्रवंशी, बलराम चंद्रवंशी, तुलसीराम चंद्रवंशी, गिरधारी चंद्रवंशी, गणेश चंद्रवंशी, तारा चंद्रवंशी, पूनाराम चंद्रवंशी, बलवान चंद्रवंशी, हरचंद चंद्रवंशी, बनवारी चंद्रवंशी सहित अनेक धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं द्वारा की गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में सनातन धर्मप्रेमी बंधुओं, श्रद्धालुओं, माताओं-बहनों एवं युवाओं की गरिमामय उपस्थिति रही।
फोटो हरि ओम सोनी
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