कलेक्टर से किसानों की गुहार—मक्का फसल नुकसान की जांच में हस्तक्षेप करें, हमारी मौजूदगी में हो सर्वे और बने रिपोर्ट
डेढ़ माह की बारिश से फसल बर्बादी का दावा, किसानों को जांच प्रक्रिया पर भरोसा नहीं; कलेक्टर से पारदर्शी सर्वे और रिपोर्ट की प्रति दिलाने की मांग
मक्का फसल सर्वे पर किसानों के सवाल, जांच दल की रिपोर्ट को लेकर उठी पारदर्शिता की मांग
Seoni 23 September 2026
सिवनी/लखनादौन यशो:- डेढ़ माह तक लगातार हुई झिरयुक्त बारिश, जलप्लावन और खेतों में जलभराव ने धूमा राजस्व निरीक्षक मंडल क्षेत्र में मक्का किसानों की चिंता बढ़ा दी है। किसानों का दावा है कि लगातार बारिश के कारण खेतों में जड़सड़न और जड़गलन की स्थिति बनने से मक्का की खड़ी फसल करीब 80 प्रतिशत तक खराब हो गई है। कई खेतों में पौधे सूख गए हैं, भुट्टे छोटे रह गए हैं और अनेक पौधों में भुट्टे तक नहीं आए।

फसल नुकसान को लेकर किसानों द्वारा कलेक्टर की जनसुनवाई में शिकायत किए जाने के बाद किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग ने 15 सितंबर 2026 को जांच दल गठित किया, लेकिन अब किसान जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। किसानों की मांग है कि उनकी मौजूदगी में खेतवार सर्वे हो, वास्तविक फसल क्षति का प्रतिशत दर्ज किया जाए, पंचनामा बनाया जाए और जांच प्रतिवेदन की प्रति उन्हें उपलब्ध कराई जाए।

जनसुनवाई में उठी आवाज, फिर बना जांच दल
किसानों के अनुसार 8 सितंबर 2026 को ग्राम खूंटखमरिया के 8 किसानों तथा 15 सितंबर को 31 किसानों ने कलेक्टर की जनसुनवाई में पहुंचकर अतिवृष्टि से क्षतिग्रस्त मक्का की फसल का सर्वे कराने और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत क्षतिपूर्ति दिलाने की मांग की थी।
शिकायत के बाद उपसंचालक किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग, सिवनी ने आदेश क्रमांक क्र./टी-4/2026-27/4129, दिनांक 15 सितंबर 2026 जारी कर जांच दल गठित किया।
कृषि वैज्ञानिक से लेकर बीमा कंपनी के प्रतिनिधि तक शामिल
विभागीय आदेश के मुताबिक जांच दल में कृषि विज्ञान केंद्र सिवनी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. निखिल सिंह, सहायक संचालक कृषि बी.आर. अठ्या, कृषि विस्तार अधिकारी कविता सोनी, संबंधित पटवारी तथा बीमा कंपनी के जिला प्रतिनिधि राकेश पटेल को शामिल किया गया।
दल को किसानों की शिकायत की जांच कर जांच प्रतिवेदन विभाग को प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे।

21 सितंबर को खेतों में पहुंचा जांच दल
किसानों के अनुसार जांच दल 21 सितंबर को ग्राम खूंटखमरिया पहुंचा और क्षतिग्रस्त मक्का की फसल का निरीक्षण किया। इस दौरान क्षेत्र के किसान प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।
किसानों ने जांच दल के अधिकारियों से मांग की कि मौके पर ही फसल क्षति का प्रतिशत दर्ज किया जाए, पंचनामा बनाया जाए और उसकी प्रति किसानों को दी जाए। किसानों के अनुसार उन्हें बताया गया कि प्रतिवेदन राजस्व विभाग की टीम द्वारा तैयार किया जाएगा।
यहीं से किसानों की चिंता और बढ़ गई।
“किसानों को अंधेरे में रखकर बनी रिपोर्ट मंजूर नहीं”
किसानों का कहना है कि फसल उनकी है, नुकसान उनके खेत में हुआ है और बीमा क्षतिपूर्ति का सीधा संबंध फसल क्षति के आकलन से है, इसलिए प्रतिवेदन तैयार करने की पूरी प्रक्रिया किसानों की जानकारी और मौजूदगी में होनी चाहिए।
किसानों ने स्पष्ट कहा है कि यदि उनकी अनुपस्थिति में फसल क्षति का प्रतिवेदन तैयार किया जाता है तो उन्हें उसकी निष्पक्षता पर भरोसा नहीं रहेगा। किसानों की मांग है कि खेतवार नुकसान का प्रतिशत उनकी मौजूदगी में दर्ज हो और तैयार रिपोर्ट की एक प्रति उन्हें अनिवार्य रूप से दी जाए।
80 प्रतिशत नुकसान का दावा, खेतों में नहीं दिख रहे भुट्टे
किसानों का कहना है कि डेढ़ माह की लगातार बारिश से खेतों में जलभराव रहा, जिसके कारण मक्का के पौधों में जड़सड़न और जड़गलन हो गई। खड़ी फसल सूखने लगी और उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ।
किसानों के मुताबिक कई खेतों में भुट्टे बेहद छोटे हैं, जबकि खेत के अंदर अनेक पौधों में भुट्टे ही नहीं आए। किसानों ने कुल मिलाकर करीब 80 प्रतिशत फसल क्षति का दावा किया है।
हालांकि वास्तविक क्षति का प्रतिशत आधिकारिक सर्वे और जांच रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट होगा।
11 गांवों में व्यापक सर्वे की मांग
किसानों ने केवल खूंटखमरिया तक सीमित जांच के बजाय पूरे प्रभावित क्षेत्र में व्यापक सर्वे की मांग की है। आवेदन में खूंटखमरिया, नागनदेवरी, डोंगरगांव, सलैया, पौड़ी, बंधा, मोहगांव नागन, बेलखेड़ी, देवरी, छिरारु, दरगड़ा और बिछुआ सहित संबंधित गांवों में खेतवार सर्वे कराने की मांग की गई है।
किसानों का कहना है कि जिन गांवों में मक्का की फसल प्रभावित हुई है, वहां किसानों की उपस्थिति में पंचनामा और फसल क्षति प्रतिवेदन तैयार किया जाए।
किसानों ने कृषि विभाग की कार्यप्रणाली पर भी उठाए सवाल
मामले में कुछ किसानों ने कृषि विभाग के मैदानी अमले की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। किसानों का आरोप है कि विभागीय स्तर पर किसानों की समस्याओं को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।
कुछ किसानों ने बीमा कंपनी के हितों तथा कृषि सामग्री विक्रेताओं के साथ कथित सांठगांठ के आरोप भी लगाए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। किसानों का कहना है कि ऐसे आरोपों की स्थिति में जांच प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी होना जरूरी है।
बीमा कंपनी के प्रतिनिधि की मौजूदगी ने भी बढ़ाई पारदर्शिता की मांग
जांच दल में बीमा कंपनी के जिला प्रतिनिधि को भी शामिल किया गया है। ऐसे में किसान चाहते हैं कि कृषि विभाग, राजस्व विभाग और बीमा कंपनी के प्रतिनिधियों द्वारा किए गए आकलन की जानकारी किसानों के सामने रहे।
किसानों का कहना है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत मिलने वाली संभावित क्षतिपूर्ति के लिए फसल क्षति का सही आकलन बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए किसी भी स्तर पर ऐसा प्रतिवेदन तैयार नहीं होना चाहिए, जिसकी जानकारी संबंधित किसान को ही न हो।
कलेक्टर से हस्तक्षेप की उम्मीद
अब किसानों की नजर जिला प्रशासन के अगले कदम पर है। किसान चाहते हैं कि कलेक्टर के स्तर से स्पष्ट निर्देश जारी कर सर्वे प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए और किसानों की मौजूदगी में खेतवार फसल क्षति दर्ज कराई जाए।
किसानों का कहना है कि “फसल हमारी, नुकसान हमारा और सर्वे भी हमारी आंखों के सामने होना चाहिए।” इससे वास्तविक नुकसान सामने आएगा और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत पात्र किसानों को उनकी क्षति के अनुरूप राहत मिलने का रास्ता साफ होगा।
अब बड़ा सवाल यही है कि गठित जांच दल की रिपोर्ट में किसानों द्वारा बताए जा रहे 80 प्रतिशत नुकसान की तस्वीर सामने आती है या वास्तविक क्षति का आंकड़ा इससे अलग होता है। फैसला आधिकारिक सर्वे और जांच प्रतिवेदन से ही स्पष्ट होगा।
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