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जातिय समीकरण बताने वालों के लिये आईना दिखा रहे चुनाव परिणाम

सिवनी यशो:- विधानसभा चुनाव संपन्न होने के पश्चात जो चुनाव परिणाम आये वह कई तरह के संदेश दे रहे है और उन संदेशो को राजनैतिक क्षेत्र में काम करने वाले बेहतर समझ भी रहे है । प्रदेश के अन्य हिस्सों में जातिय समीकरण और किसी एक मुद्दे पर वोटों का धु्रवीकरण किया जाना, प्रलोभन या दहशत चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता भले ही रखती हो परंतु सिवनी जिला इससे एक दम अछूता है और आये चुनाव परिणामों ने इस बात को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है । इसके साथ यह बात भी साफ हो चुकी है कि मतदाता बहुत समझदारी से अपने मत का प्रयोग कर रहे है । मतदाता इस बात को बेहतर समझता है कि कौन चुनाव में जीत हार के लिये मैदान में है और कौन चुनाव में वोट काटने के लिये खड़ा हुआ है । आये परिणामों में स्पष्ट दिख रहा है कि जो राजनैतिक दल चुनावी मुकाबले में थे मतदान उन्ही के पक्ष में हुआ है वोटों का विभाजन करने वाले प्रत्याशियों को सम्मानजनक मत प्राप्त नहीं हुये है यहाँ तक कि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के प्रत्याशियों को भी इस बार के चुनाव में सामाजिक आधार पर जो वोट प्राप्त करने की अपेक्षा थी वह मत डन्हें प्राप्त नहीं हुआ है ।

जातिय समीकरण के आधार 2018  में कांग्रेस के प्रत्याशी कमजोर साबित हुये

चुनाव परिणााम स्पष्ट रूप से यह कह रहे है कि कम से कम सिवनी जिले की राजनीति में जातिवाद का जहर प्रभावी नहीं है मतदाताओं ने इस बात को केवल इसी चुनाव में नहीं इसके पूर्व के चुनावों में भी स्पष्ट रूप से परिणाम के जरिए बताया है परंतु राजनीति में जाति समीकरणों की दुहाई देकर राजनैतिक व्यक्ति अपनी ठेकेदारी जाते रहे है परंतु जातिय आधार पर मतदान प्रभावित नहीं हुआ । सिवनी विधानसभा चुनाव के परिणामों पर ही यदि नजर डाले तो 2018 के विधानसभा चुनाव में मोहन सिंह चंदेल को कांग्रेस ने कुर्मी समाज के वोटों सेंध लगाने की मंशा से विधानसभा का टिकिट दिया था परंतु कांग्रेस की सोशल इंजीनियरिंग बुरी तरह फेल हुई थी और मोहन सिंह चंदेल को कम वोट कुर्मी बाहुल्य क्षेत्र से ही प्राप्त हुये थे वहीं मोहन सिंह चंदेल को विधानसभा चुनाव में महज 38 प्रतिशत वोट प्राप्त हुये जबकि इनके साथ जातिय समीकरण था जबकि भाजपा के प्रत्याशी दिनेश राय मुनमुन को 50 प्रतिशत मत प्राप्त हुये थे । 2018 के विधानसभा चुनाव में गोंगपा को महज 3.02 प्रतिशत मत प्राप्त हुये थे । इसी प्रकार अन्य प्रत्याशी जिन्हें जातिय संप्रदाय के आधार पर वोट मिलने का गुमान रहता उन्हें भी नाममात्र के मत ही प्राप्त होते है और 2018 तथा 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी को पचास प्रतिशत से अधिक मत ही प्राप्त हुये है ।

2023 के चुनाव में आनंद ने लिये अधिक वोट

अब यदि 2023 के विधानसभा चुनाव की चर्चा करें तो कांग्रेस ने बिना जातिय समीकरण के आधार पर युवा सिंधी समाज के युवा आनंद पंजवानी को विधानसभा का टिकिट दिया । आनंद पंजवानी को बिना किसी जातिय समीकरण के 2018 के कांग्रेस उम्मीदवार मोहन सिंह चंदेल से केवल अधिक मत ही प्राप्त नहीं हुये बल्कि मत मिलने का प्रतिशत भी अधिक रहा । आनंद पंजवानी को मोहन चंदेल से चार प्रतिशत अधिक मत प्राप्त हुये । हालांकि इस विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को भी पिछली बार से आधा प्रतिशत अधिक मत प्राप्त हुये और 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त कर भाजपा प्रत्याशी विजयी रहे । चुनाव परिणाम से स्पष्ट है कि जातिय संप्रदाय के नाम पर चुनाव लडऩे वाले निर्दलीय प्रत्याशियों को मतदाता समझने लगा है उन्हें इस चुनाव में भी बहुत अधिक मत प्राप्त नहीं हुआ ।

भाजपा प्रत्याशी के विरोध में हुये षडयंत्र को बेअसर किया मतदाताओं ने

2023 के विधानसभा चुनाव में एक बात और सिवनी विधानसभा क्षेत्र में रही है कि भाजपा प्रत्याशी के विरोध में बघेल समाज को भड़काने का षडयंत्र चलते रहा है । चुनाव के पूर्व से इस प्रकार के प्रयास से तो चलते ही रहे परंतु चुनाव के दौरानआपराधिक षडयंत्र करते हुये फर्जी बातो के गांव गाँव पोस्टर चिपकाएँ गये थे जिसके माध्यम से प्रभावकारी बघेल समाज एवं कुर्मी समाज के मतदाताओं को भाजपा प्रत्याशी के विरोध में भड़काने के लिये अनर्गल प्रचार किया गया था परंतु मतदाता की समझदारी रही कि वह दुष्प्रचार भी बेअसर ही रहा है ।

शराब चुनाव का फैशन बन गयी है

चुनाव के दौरान जातिय संप्रदाय के आधार पर धु्रवीकरण करने वाले ठेकेदारों को मतदाता करारा जबाव देने में तो सक्षम दिखाई और बहुत अधिक बेअसर प्रलोभन भी रहा परंतु शराब का प्रचलन पूरे चुनाव के दौरान अंधाधुध रहा । जानकार बताते है कि चुनावी वातावरण बिना शराब के नहीं बन पाता चुनाव में शराब का मनमाना वितरण प्रत्याशी दिलेरी का प्रमाणिकरण बन गया है । जानकारों के अनुसार चुनाव के दौरान गांव गांव में बांटी गयी शराब आज भी महिफिले सजाने का काम कर रही है इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि शराब कितनी बड़ी मात्रा में बांटी गयी है । पूरे चुनाव के दौरान सारे मुद्दे समस्याओं का कोइ महत्व नहीं केवल शराब महत्वपूण्र हो जाती है । बांकी सब मामलों में मतदाता जागरूक है परंतु शराब चुनावी फैशन बन गयी है ।

स्थापित नेताओं का विरोध भी कारगर नहीं

वहीं दलगत राजनीति करने वालों के विरोध भी इस चुनाव में बेअसर रहा ही रहा । भाजपा प्रत्याशी के विरोध में भाजपा के लगभग सभी असदार नेता चुनावी प्रचार से दूर रहे हालांकि छोटा कार्यकत्र्ता भाजपा को जिताने के लिये पूरी ताकत लगाये हुये था और बड़े बडे नेता अपने आप को चुनावी अभियान से दूर रखे हुये थे ।
वहीं कांग्रेस में जिस तरह से निष्कासन हो रहे है वह भी स्पष्ट कर रहा है कि कांग्रेस में भी अनेक जिम्मेदार नेता कांग्रेस विरोधी काम करते रहे है परंतु कांग्रेस भले ही जीत न पाई हो परंतु उसके वोटों में इजाफा हुआ है ।

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