बाजीराव समाधि, संत सियाराम बाबा और शालीवाहन दर्शन का दिव्य दिवस
नर्मदा सायकिल परिक्रमा: तप, त्याग और यात्रा — भाग -6
Seoni 23 June 2025 विशेष प्रस्तुति
सिवनी यशो :-नर्मदा परिक्रमा के दूसरे दिन का सूर्योदय एक अलग ही भावभूमि पर हुआ — नर्मदा तट पर बसा शांत आश्रम, शिव मंदिर में गूंजते मंत्र, और बहती हुई अविरल धारा। यह कोई सामान्य यात्रा नहीं थी — यह आत्मा का पुनर्जन्म था।

बाजीराव पेशवा की समाधि और माँ नर्मदा का आशीर्वाद
प्राचीन शिव मंदिर में पूजन के बाद, सामने ही दिखी बाजीराव पेशवा की समाधि। वही योद्धा जिनके पराक्रम से मुग़ल साम्राज्य कांपता था। समाधि स्थल सुबह 9 बजे खुलता है, पर कपिल जी ने साइकिल से पहुँचकर बाहर से ही नमन किया और आगे बढ़ चले।
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स्कूल के बच्चों को दिए पर्यावरण के पाठ
रास्ते में मिले स्थानीय छात्र, जिनके बीच कपिल जी ने पर्यावरण संरक्षण और माँ नर्मदा की महिमा की प्रेरणादायक बातें साझा कीं। यह परिक्रमा केवल बाह्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शिक्षण यात्रा भी है।

बकाबा के नर्मदेश्वर शिवलिंग और सेवा का भाव
बकाबा गाँव में पहुंचे जहाँ माँ नर्मदा की गोद से उत्पन्न होने वाले स्वयंभू शिवलिंगों को देखकर श्रद्धा भाव उमड़ पड़ा। स्थानीय ग्रामीणों की सेवा, चाय, नाश्ता और ‘नर्मदे हर!’ की गूंज ने थकान को भक्ति में बदल दिया।
भीलट देव मंदिर में नागदेवता के दर्शन
आगे मिले पंचफन नाग देवता और वहाँ विराजमान संत – जिनकी एक हुंकार “नर्मदे हर!” से तन-मन पुलकित हो उठा। उन्होंने सादगी से जलपान कराया – यही है परिक्रमा का सच्चा तप।
सियाराम बाबा का आश्रम – मौन तप का अद्भुत उदाहरण
तेलीभटियान में संत सियाराम बाबा के दर्शन हुए – 116 वर्ष की आयु में भी ऊर्जा से परिपूर्ण, 30 वर्षों तक मौन व्रत और फिर ‘सियाराम’ शब्द से साधक की पहचान। माँ नर्मदा की छांव में चलता उनका आश्रम – श्रद्धा, सेवा और भक्ति का उदाहरण। दुर्भाग्यवश, उनके दर्शन के पाँच दिन बाद बाबा ब्रह्मलीन हो गए। कपिल जी ने उपवास कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

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कसरावद में विश्राम और संसाधन
कसरावद कस्बे से दैनिक आवश्यक वस्तुएं लेकर यात्रा आगे बढ़ी, लेकिन रास्ता थोड़ा भटक गया – और इस भटकाव ने एक नया अध्याय खोल दिया।
शालीवाहन – शिव मंदिर, ब्रह्मा तप और दादा गुरु से भेंट
शालीवाहन संवत का आरंभ यहीं माना जाता है। यहाँ शिव मंदिर के दर्शन के साथ ही भाग्य ने कपिल जी को दादा गुरु के दर्शनों का सौभाग्य भी दिया – जो पिछले चार वर्षों से अन्न त्याग कर केवल नर्मदा जल पर जीवित थे।

हज़ारों श्रद्धालुओं की भीड़, प्रवचन, आरती और प्रसाद… और फिर एक बरगद के नीचे खुले आसमान के नीचे नींद – यह था परिक्रमा का सरलतम लेकिन पवित्रतम विश्राम।
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विचार बूँद
“विश्वास ही वह शक्ति है जो साधारण को असाधारण बना देती है।”
जब माँ नर्मदा साथ हों, तो हर राह मंगलमय हो जाती है।
नर्मदे हर!
अगली कड़ी में पढ़िए:
कसरावद से महेश्वर – विक्रम संवत की धरती और कपिल जी की भाव यात्रा।



