“माँ नर्मदा की पाठशाला: सेवा, संस्कार और आत्मबोध”
नर्मदा सायकिल परिक्रमा: तप, त्याग और यात्रा — भाग -5
कपिल पांडे की अनुभूतियों पर आधारित यात्रा वृतांत
Seoni 2 2 June 2025
“नर्मदे हर…”
सिवनी यशो:- तीसरे दिन की यह यात्रा केवल शारीरिक दूरी नहीं, आत्मा की परिक्रमा थी।
सवेरा — माँ के चरणों में
भोर की पहली किरण जब माँ नर्मदा के जल पर पड़ी, हम उस दिव्य क्षण के साक्षी बने।
डुबकी नहीं — कमंडल से स्नान, विनम्रता की पराकाष्ठा थी।
माँ नर्मदा के पास हर क्रिया एक साधना है, हर क्षण एक सीख।

भगवान शालिवाहन की पूजा और ज्ञानवर्षा
पूजन पश्चात दादा गुरु के सान्निध्य में संध्या की साधना हुई —
जैसे आत्मा पर अमृत बरस रहा हो।
खलघाट की ओर सायकिल से प्रस्थान
कुछ दूर गुरुजनों के साथ चले, फिर वे पैदल बढ़े और हम सायकिल से।
कच्चे रास्तों पर थकावट से ज़्यादा गर्व था कि —
“हम कर रहे हैं महायात्रा!”
पर तभी माँ ने हमारी परीक्षा ली…
बुज़ुर्ग परिक्रमा वासी — अहंकार का क्षय
हमसे दुगुनी उम्र का साधक तेज़ चाल से आगे बढ़ रहा था।
हमारा सारा गर्व माँ नर्मदा में बह गया।
सच्ची यात्रा वह है, जहाँ अहंकार गिरता है, और नम्रता जन्म लेती है।

चाय की सीख — विनम्रता का व्रत
रास्ते में एक किसान यात्रियों को चाय पिला रहा था।
हमने सायकिल से हाथ बढ़ाया, तभी एक साधु बोले —
“जब कोई प्रेम से बुलाए, तो ज़मीन पर बैठकर आदर से चाय ग्रहण करना चाहिए।”
उनका वाक्य जैसे जीवन में अंकित हो गया।
सेवाभाव के देवदूत — बच्चे बने गुरु
साटक नदी के पुल पर तीन छोटे बच्चे पत्थरों का चूल्हा जलाकर चाय बना रहे थे।
गरीबी उनके कपड़ों में दिख रही थी, पर चेहरे पर सेवा की दीप्ति थी।
जब पूछा, “क्यों?” — बोले, “अच्छा लगता है।”
उनका उत्तर साधना से भी बड़ा पाठ था — “सेवा के लिए पैसा नहीं, मन चाहिए।”
साटक नदी — रोग हरणी धारा
एक साधक ने बताया —
“इस नदी में स्नान से लकवा जैसे रोग दूर होते हैं।”
यह वही नदी है जो खलघाट में माँ नर्मदा में मिलकर 60 नर्मदेश्वर शिवलिंगों का अभिषेक करती है।
कहते हैं — यह स्वयं शिव की सेवा करती है।
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खलघाट — आत्मिक विश्राम का स्थान
यहाँ की हवा में एक अद्भुत शांति थी।
मंदिर के पुजारी ने कहा —
“यहाँ समय बिताने से पूर्वजों को प्रभु के दर्शन प्राप्त होते हैं।”
हमने सायकिल को स्नान कराया, वस्त्र धोए, और सात्विक प्रसाद पाया।
प्रकृति की लीला से मन पुलकित हो गया।

लक्ष्मण गांव — तप और त्याग की भूमि
शाम होते-होते पहुंचे लक्ष्मण गांव —
जहाँ कहा जाता है, लक्ष्मण जी ने वर्षों तप किया था।
यहाँ आरती, भजन, और फिर दाल-बाफले-चूरमा का प्रेममयी प्रसाद मिला।
पर रात को एक गंभीर क्षण आया…
माँ की गोद में मोक्ष — एक परिक्रमा वासी का देहत्याग
एक बुज़ुर्ग साधक ने माँ नर्मदा की गोद में ही देह त्याग दी।
यह दृश्य भले पीड़ादायक था, पर कहीं भीतर सुख भी था —
क्योंकि जीवन की पूर्णता वहीं है, जहाँ आत्मा माँ में विलीन हो जाए।
तीसरा दिन: विनम्रता, सेवा और आत्मबोध का अध्याय बन गया।
हम चले थे माँ की परिक्रमा करने,
पर माँ ने हमें ही मोड़ दिया — भीतर की ओर… आत्मा की ओर…
“नर्मदे हर…”



