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मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश में शिक्षा व्यवस्था का बड़ा बदलाव: आदिवासी विभाग के 24,196 स्कूल स्कूल शिक्षा विभाग में होंगे शामिल

नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन और शिक्षा में एकरूपता लाने की दिशा में सरकार की पहल, चरणबद्ध तरीके से 4 से 5 वर्षों में पूरी होगी प्रक्रिया

भोपाल यशो :- मध्यप्रदेश सरकार प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा और दूरगामी बदलाव करने की तैयारी कर रही है। इसके तहत जनजातीय कार्य विभाग द्वारा संचालित 24,196 विद्यालयों को चरणबद्ध तरीके से स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन लाने की योजना बनाई गई है। सरकार का मानना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और प्रशासनिक व्यवस्था में एकरूपता लाने के लिए यह कदम आवश्यक है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मंशा के अनुरूप स्कूल शिक्षा विभाग ने इस संबंध में कैबिनेट प्रस्ताव तैयार किया है। प्रस्ताव को अभिमत के लिए जनजातीय कार्य विभाग को भेजा जा रहा है। वहां से सहमति मिलने के बाद इसे वित्त विभाग और फिर कैबिनेट के समक्ष अंतिम निर्णय के लिए प्रस्तुत किया जाएगा।

शिक्षा में एकरूपता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

वर्तमान में प्रदेश के 89 आदिवासी विकासखंडों में जनजातीय कार्य विभाग द्वारा विद्यालय संचालित किए जाते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों के विद्यालय स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन हैं। वर्षों से समान शिक्षा व्यवस्था के बावजूद दो अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं के कारण कई स्तरों पर समन्वय संबंधी चुनौतियां सामने आती रही हैं।

शिक्षा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि नई शिक्षा नीति के लागू होने के बाद पूरे प्रदेश में समान शैक्षणिक मानकों, शिक्षक प्रशिक्षण, मूल्यांकन प्रणाली, डिजिटल शिक्षा, नवाचार कार्यक्रमों और प्रशासनिक निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एकीकृत व्यवस्था आवश्यक हो गई है। इसी कारण स्कूल शिक्षा विभाग के अधीन संपूर्ण स्कूली शिक्षा व्यवस्था लाने की दिशा में यह पहल की जा रही है।

चरणबद्ध तरीके से होगा विलीनीकरण

प्रस्ताव के अनुसार सभी विद्यालयों का एक साथ हस्तांतरण नहीं किया जाएगा। यह प्रक्रिया लगभग चार से पांच वर्षों में चरणबद्ध रूप से पूरी होगी।

पहले चरण में विद्यालयों का प्रशासनिक नियंत्रण स्कूल शिक्षा विभाग को सौंपा जाएगा। इसके बाद शैक्षणिक गतिविधियों, दिशा-निर्देशों और योजनाओं का संचालन एकीकृत रूप से किया जाएगा। भविष्य में होने वाली नई भर्तियां स्कूल शिक्षा विभाग के माध्यम से की जाएंगी। अंतिम चरण में कर्मचारियों और शिक्षकों की स्थापना, सेवा शर्तों तथा लंबित न्यायिक मामलों के समाधान के लिए अलग प्रक्रिया निर्धारित की जाएगी।

वर्तमान व्यवस्था में सामने आ रही हैं चुनौतियां

सरकारी स्तर पर माना जा रहा है कि अलग-अलग विभागों द्वारा विद्यालयों के संचालन से शिक्षक स्थानांतरण, प्रशासनिक नियंत्रण, योजनाओं के क्रियान्वयन और शैक्षणिक निगरानी में कई व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं। कई बार स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी निर्देश जनजातीय विभाग के विद्यालयों तक उसी गति और प्रभाव से नहीं पहुंच पाते, जिससे शिक्षा व्यवस्था में असमानता दिखाई देती है।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में जनजातीय कार्य विभाग के विद्यालयों के परीक्षा परिणामों और शैक्षणिक उपलब्धियों में उल्लेखनीय सुधार भी दर्ज किया गया है। यही कारण है कि सरकार इस प्रक्रिया को जल्दबाजी में लागू करने के बजाय चरणबद्ध और संतुलित तरीके से आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है।

नई शिक्षा नीति के लिए क्यों जरूरी माना जा रहा है यह बदलाव

विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का मूल उद्देश्य देशभर में विद्यार्थियों को समान गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराना है। इसके लिए पाठ्यक्रम, मूल्यांकन, शिक्षक प्रशिक्षण, तकनीकी संसाधनों और शैक्षणिक अवसरों में समानता आवश्यक है। मध्यप्रदेश में दो अलग-अलग विभागों के माध्यम से स्कूल संचालन होने से इस लक्ष्य को पूरी तरह प्राप्त करने में कठिनाइयां आती हैं।

ऐसे में शिक्षा व्यवस्था का एकीकरण केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे राज्यभर के विद्यार्थियों को समान शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी।

आदिवासी हितों को लेकर उठने लगे सवाल

प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। धार जिले की मनावर विधानसभा से विधायक डॉ. हीरालाल अलावा ने इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा है कि इससे आदिवासी शिक्षा व्यवस्था की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क है कि जनजातीय कार्य विभाग आदिवासी क्षेत्रों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कार्य करता है और मर्जर के बाद यह विशेष फोकस कमजोर पड़ सकता है।

उन्होंने आशंका जताई कि आदिवासी विद्यार्थियों के लिए मिलने वाली विशेष सुविधाओं और योजनाओं पर भी प्रभाव पड़ सकता है तथा इस निर्णय का हर स्तर पर विरोध किया जाएगा।

सरकार के सामने संतुलन की चुनौती

शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता लाने और नई शिक्षा नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने के उद्देश्य से प्रस्तावित यह बदलाव प्रदेश की स्कूली शिक्षा प्रणाली को नई दिशा दे सकता है। वहीं सरकार के सामने यह चुनौती भी होगी कि आदिवासी क्षेत्रों की विशेष जरूरतों, छात्रावासों, छात्रवृत्तियों और अन्य कल्याणकारी योजनाओं की मूल भावना प्रभावित न हो।

इसी कारण सरकार इस प्रक्रिया को चरणबद्ध तरीके से लागू करने और सभी संबंधित पक्षों से चर्चा के बाद अंतिम निर्णय लेने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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