साहित्य समाज की बेहतरी के लिए विशिष्ट चिंतन है: विक्रम अहाके
सांस्थानिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध बुलंद आवाज हैं मिश्र की कविताएं: अवधेश तिवारी | सामाजिक विद्रूपताओं की औषधि है काव्य संग्रह: प्रो. अमर सिंह
Chhindwara, 26 October 2026
छिंदवाड़ा यशो:- साहित्य केवल शब्दों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज की विसंगतियों को उजागर करने, मानवीय संवेदनाओं को जगाने और सकारात्मक बदलाव की राह दिखाने का सशक्त माध्यम है। इसी विचार को केंद्र में रखते हुए मध्यप्रदेश आंचलिक साहित्यकार परिषद की मासिक काव्य गोष्ठी में जवाहर नवोदय विद्यालय, बरगी (जबलपुर) के प्राचार्य डॉ. श्रीनिवास मिश्र के काव्य संग्रह ‘ढाई आखर प्रेम बिना’ का विमोचन किया गया। सिविल लाइंस, छिंदवाड़ा स्थित परिषद की अक्षत स्मृति साहित्य वाटिका (अक्षत उपवन) में आयोजित कार्यक्रम में छिंदवाड़ा के महापौर विक्रम अहाके ने काव्य संग्रह का विमोचन किया।
इस अवसर पर महापौर विक्रम अहाके ने कहा कि साहित्य समाज की बेहतरी के लिए सामाजिक सरोकारों से जुड़े प्रश्नों पर संवेदनशील चिंतन है। साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के सामने उपस्थित चुनौतियों, विसंगतियों और मानवीय मूल्यों के प्रश्नों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
परिषद के सभापति मनोज सक्सेना ने काव्य संग्रह को वर्तमान समय के ज्वलंत विषयों पर केंद्रित सार्थक रचनात्मक वैचारिकी बताया। वहीं अवधेश तिवारी ने संग्रह में संकलित विविध रंगों की कविताओं को सांस्थानिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध बुलंद आवाज निरूपित किया।
सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार, प्रेम और मानवीय मूल्यों की पैरवी
प्रो. अमर सिंह ने डॉ. श्रीनिवास मिश्र के काव्य संग्रह को सामाजिक विद्रूपताओं का उद्घाटन करने वाली और प्रेम की रीति स्थापित करने वाली व्यापक मानवीय आवाज बताया। रामलाल सराठे ने इसे सामाजिक विसंगतियों को उजागर करने वाला दस्तावेज कहा।
कवि डॉ. श्रीनिवास मिश्र ने अपनी रचनात्मक दृष्टि व्यक्त करते हुए कहा कि शब्दानुभूति से सृजित संवेदना में भौतिक दुनिया के नकारात्मक प्रभावों का समाधान निहित है। उनकी कविताओं में सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदनाओं और समकालीन परिस्थितियों पर विचार करने की प्रेरणा दिखाई देती है।
राम, रावण और समाज पर कवियों ने किया सार्थक व्यंग्य
काव्य गोष्ठी में कवियों ने समकालीन सामाजिक परिस्थितियों, नैतिक मूल्यों, राजनीतिक-सामाजिक विसंगतियों और मानवीय संबंधों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया।
रत्नाकर रतन ने समाज में रामराज्य की स्थापना के लिए अहंकारी तत्वों के विनाश की आवश्यकता को अपनी कविता में रेखांकित किया। नंदकुमार दीक्षित ने ‘कलुषित मन के वातायन में सुरभित पुष्प खिला दो’ के माध्यम से मन की शुद्धता और सकारात्मकता का संदेश दिया।
अशोक जैन ने ‘जब तक मन में प्यार न जागे, कोई गीत नहीं बनता है’ पंक्तियों के माध्यम से प्रेम और संवेदना की महत्ता प्रस्तुत की। राजेंद्र चौबे ने अपनी व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति में कहा कि कुत्ता पागल होने पर काटने दौड़ता है, लेकिन आदमी के लिए पागल होना जरूरी नहीं है। उनकी इस रचना ने श्रोताओं को हास्य के साथ सामाजिक व्यवहार पर सोचने का अवसर दिया।
श्रीमती मोहिता मुकेश कमलेंदु ने ‘कलयुग के रावण को मारने राम को वनवास नहीं जाना पड़ेगा’ के माध्यम से समकालीन बुराइयों पर व्यंग्य किया। श्रीमती अनुराधा तिवारी ने ‘राम को मानते हो तो राम की भी मानिए’ रचना के जरिए आचरण में आदर्शों को उतारने का संदेश दिया।
रचनाओं में प्रेम, नारी संवेदना और वैश्विक अशांति के स्वर
के.के. मिश्रा ने महिलाओं के मायके के प्रति अनुराग को अपनी रचना में अभिव्यक्त किया। ओमप्रकाश नयन ने वैश्विक अशांति फैलाने वाली महाशक्तियों पर प्रहार करते हुए हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी का संदर्भ प्रस्तुत किया।
लघुकथाकार पवन शर्मा ने ‘आदमी के भीतर सन्नाटा’ शीर्षक रचना के माध्यम से हंसी के संदिग्ध हो जाने की विडंबना को उभारा। विशाल शुक्ल ने ‘हमको सिर्फ वही जलाए, जो चरित्र में राम समान हो’ पंक्तियों के जरिए नैतिकता का प्रश्न उठाया। श्रीमती ज्योति गुप्ता ने ‘हर मुश्किल में साथ निभाया राधा ने, श्याम को राधेश्याम बनाया राधा ने’ के माध्यम से प्रेम और समर्पण की महत्ता व्यक्त की।
मंच संचालिका श्रीमती नीलमणि पवार ने ‘राम राम रटना जरूरी तो नहीं, राम जैसा कर दिखाना जरूरी है’ के जरिए कथनी और करनी के अंतर पर सार्थक संदेश दिया। पद्मा जैन ‘पद्म’ ने अपनी सामयिक काव्य रश्मियों के माध्यम से भगवान राम के आदर्शों और चरित्र निर्माण पर जोर दिया।
अशोक डहेरिया ने रावण के दहन के बाद भी मनुष्य के भीतर विद्यमान बुराइयों की ओर ध्यान आकर्षित किया। राजेंद्र यादव ने ‘तुमसे भी अच्छा लिख लूंगा, बस पीर घनेरी होने दो’ के माध्यम से पीड़ा और सृजन के संबंध को अभिव्यक्त किया, जबकि प्रिंस शर्मा ने ‘बहाओ नीर आंखों से, इस मौसम को वसंत कर दो’ पंक्तियों से सकारात्मकता का संदेश दिया।
युवा कवि विश्वेश चंदेल ने देवी स्तुति, राजेश राज ने गजल और अमित सोनी ने उर्दू मिश्रित शायराना रचनाओं से श्रोताओं को आनंदित किया।
कार्यक्रम में अवनि सोनी, राजू गणवीर, शशिकला मिश्र, आस्था मिश्रा, प्रसून कुमार मिश्रा और हरिओम माहोरे ‘अर्पण’ ने भी अपनी काव्य प्रस्तुतियां दीं। विविध विषयों और काव्य शैलियों से सजी इस गोष्ठी में साहित्य के सामाजिक दायित्व, प्रेम, मानवीय संवेदना और नैतिक मूल्यों पर सार्थक अभिव्यक्तियां सामने आईं।
दैनिक यशोन्नति | छिंदवाड़ा