विविधता हमारी संस्कृति की कमजोरी नहीं, शक्ति और सुंदरता है – ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी
विविधता हमारी संस्कृति की कमजोरी नहीं, शक्ति और सुंदरता है – ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी
सिवनी (लखनवाड़ा) | 20 जनवरी 2026
प्रकृति के पंचतत्व, नदियाँ, वृक्ष और समरस सामाजिक व्यवस्था भारतीय संस्कृति के ज्वलंत प्रतीक हैं। नदियाँ परमात्मा के विराट स्वरूप की धमनियाँ हैं। सामाजिक वर्ण व्यवस्था नैसर्गिक एवं अनादि काल से चली आ रही है, आवश्यकता इसे समाप्त करने की नहीं बल्कि इसमें आई बुराइयों को दूर करने की है।

उक्त प्रेरक उद्गार गीता मनीषी पूज्य ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज ने सिवनी नगर के समीप ग्राम लखनवाड़ा में माँ बैनगंगा के पावन तट पर आयोजित विराट हिंदू सम्मेलन को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
माँ बैनगंगा तट पर दीपदान एवं महाआरती
सम्मेलन के अवसर पर माँ बैनगंगा में दीपदान एवं महाआरती पूज्य ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी के पावन सानिध्य में विधिवत संपन्न हुई।
इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
धर्म, संस्कृति और संस्कारों का दिया संदेश
लखनवाड़ा स्थित माँ बैनगंगा तट पर आयोजित इस विशाल हिंदू सम्मेलन में पूज्य श्री मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।
उन्होंने लौकिक दृष्टांतों के माध्यम से सरल एवं
प्रेरणादायक शैली में धर्म, संस्कृति और अच्छे संस्कारों के महत्व को रेखांकित किया।

माँ बैनगंगा को स्वच्छ रखना हमारा नैतिक कर्तव्य है, इसमें कूड़ा-कचरा और प्लास्टिक डालना संस्कृति के विरुद्ध है – ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी
महाराज जी ने माँ बैनगंगा को स्वच्छ रखने की प्रेरणा देते हुए श्रद्धालुओं से अपील की कि-
नदी में कूड़ा-कचरा,
प्लास्टिक एवं
अपशिष्ट सामग्री न डालें।
इस अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं के साथ माँ बैनगंगा में दीपदान कर महाआरती की गई।
2013 की बैनगंगा परिक्रमा का स्मरण
ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी ने अपने पूज्य गुरुदेव ब्रह्मलीन द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज की आज्ञा से वर्ष 2013 में बैनगंगा नदी के उद्गम से अंत तक किए गए पैदल परिभ्रमण का संस्मरण सुनाया।
उन्होंने पुण्यदायिनी माँ बैनगंगा के पौराणिक,
धार्मिक और
सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे सनातन परंपरा की जीवनदायिनी धारा बताया।



