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good morning thoughts : सरल और निर्मल इन्सान को दिखावे और आडम्बर की जरूरत नहीं है।

वस्तुतः दीखने और दिखाने की प्रक्रिया गलत नहीं है। गलत है इससे दूसरों को नुकसान पहुँचाना एवं स्वार्थ सिद्ध करना। इसके ठीक विपरीत होने एवं बनने की प्रक्रिया आन्तरिक सुकून दायक है।
ठीक है कि यह कठिन है परन्तु असम्भव भी नहीं है। जो हम नहीं हैं और जिसे हम अच्छी तरह जानते हैं कि हम ऐसे नहीं हैं फिर भी दिखाना चाहते हैं कि हम ऐसे हैं, उनके अन्तर में खुलापन और व्यवहार जगत में इसके होने का झूठा सच एक द्वन्द को जन्म देता है। जो नहीं है इस झूठ को हम संसार में सच्चाई के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

good morning thoughts : सरल और निर्मल इन्सान को दिखावे और आडम्बर की जरूरत नहीं है। - Seoni News
लोगों की भीड़ में हम प्रतिष्ठित भी होते हैं और भाग्य ने साथ दिया तो प्रतिष्ठा की झूठी चमक अपना प्रभाव भी दिखाती हैं। प्रतिष्ठा की अन्तहीन प्यास के जगते ही हम इसकी सुरक्षा, संरक्षण और प्रसार के लिए अपनी समस्त ऊर्जा को झोंक देते हैं।
कोई यदि इसके विरुद्ध ऊंगली उठाता है या फिर प्रतिकूल बोलता है, तो वह हमारा सबसे बड़ा विरोधी बनता है, क्योंकि वह हमारे अहम को चोट पहुँचाने का प्रयास करता है।
हम झूठ को, आन्तरिक खोखलेपन को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हैं और सारा जीवन दूसरों को दिखाने के लिए ही अपनी अहम जीवन-ऊर्जा को जलाकर खाक कर देते हैं।
समाज में हमारा यह दोहरा व्यक्तित्व दूसरों की झूठी प्रशंसा से सन्तुष्ट होता है। संचार के विभिन्न माध्यमों में दिखाए जाने पर फूलकर कुप्पा हो जाता है और सम्मान, पुरस्कार, सर्टिफिकेट तथा पेपर की कतरनों के रूप में हमारी अगाध संपत्ति एवं संपदा बनता है, जिसे हम अपने एवं अनजानों के बीच दिखाने का पारायण करते हैं। लोग देखते भी हैं।
कुछ इससे बचने के लिए झूठी प्रशंसा करते हैं, कुछ इसे न पाने के कारण ईर्ष्या भी करते हैं और बड़ी बात तो यह है कि इस निन्दा, प्रशंसा एवं ईर्ष्या से प्रभावित होते हैं। इससे भी बड़ी बात है कि प्रतिष्ठा की यह चमक हमारे जीवन की समस्या को सुलझाने के लिए उतनी ही अनजान एवं अजनबी होती है।
जो हमारे दैनिक जीवन की समस्या से इतनी दूर है, उसके प्रति इतना प्रबल आकर्षण विडम्बना नहीं तो और क्या है? दीखने-दिखाने के इस गोरख-धन्धे में आवश्यकता है कि एक इन्सान का जीवन होना।
एक ऐसा जीवन जो अपने में तृप्त हो तथा औरों के लिए भी उपयोगी हो सके। ऐसा जीवन जो अपनी आन्तरिक चेतना में सतत विकसित हो तथा उसके कर्म मानवता की सेवा में निमग्न हो।
ऐसा इन्सान अन्दर और बाहर से निश्छल, निर्मल और सरल होता है उसे दिखावे और आडम्बर की कोई जरूरत नहीं होती है।सदैव दिखावे से दूर एक नेक एवं सच्चे इन्सान का जीवन होना चाहिए।

Dainikyashonnati

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