धर्मविचार

good morning thoughts: तुलनात्मक दृष्टि

     हमारा मन तुलना करने का आदी है। हम सदैव संसार को तुलनात्मक दृष्टि से ही देखते है। हम स्वयं का आंकलन भी ,अपनी तुलना दूसरों से करके ही करते है, जबकि अपना स्वयं का आंकलन , स्वयं से ही करके किया जाना चाहिए। दूसरों से तुलना हो ही नहीं सकती , क्योंकि इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने में विशिष्ट है, वह अपने जैसा ही हो सकता है, दूसरों जैसा नहीं। परन्तु मन का स्वभाव तुलना करना है, इसी कारण व्यक्ति तनावग्रस्त रहता है।
good morning thoughts: तुलनात्मक दृष्टि - Seoni News
      जब किसी की अच्छाई का ज़िक्र होता है , तो हम उस अच्छाई को जब अपने  अन्दर नहीं पाते है, तो हमारा मन उसकी अच्छाई को स्वीकार नहीं करता है, मन का स्वभाव यह है कि वो अपने को नीचा होना स्वीकार नहीं करता। इसके विपरीत जब किसी की बुराई का ज़िक्र होता है, तो हम उस पर एकदम यक़ीन कर लेते है। वह व्यक्ति हम से नीचा हो गया । यह हमारे अंहकार के अनुकूल पड़ता है।इसलिए किसी की बुराई पर तत्काल यक़ीन कर लेते है। बुराई यानि निंदा, इसके रस का कहना ही क्या, हम इस रस के स्वाद के अभ्यस्त है।इसलिए निंदा का रस सभी रसों से प्रीतिकर लगता है, परन्तु यह हमारे परम् स्वभाव के प्रतिकूल है, यह क्षणिक है ,टिकाऊ नहीं है, इसलिए हमारे जीवन का आनन्द नहीं बन सकता है। दृष्टि बदलनी चाहिए, तभी हमे परम् आनन्द की अनुभूति हो सकती है।

Dainikyashonnati

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