शुभ कर्म जिसका सफल हो जाए, उसकी तो दुर्गति का सवाल ही नहीं है। लेकिन शुभ कर्म जिसका सफल भी न हो पाए, उसकी भी दुर्गति नहीं होती। इससे दूसरी बात भी आपको कह दूं, तो जल्दी खयाल में आ जाएगा।
अशुभ कर्म जिसने किया, सफल न भी हो पाए, तो भी दुर्गति हो जाती है। मैंने आपकी हत्या करनी चाही, और नहीं कर पाया, तो भी दुर्गति हो जाती है। नहीं कर पाया, इसका यह मतलब नहीं कि मैंने आपकी गर्दन दबाई और न दब पाई। नहीं, आपकी गर्दन तक भी नहीं पहुंच पाया, तो भी दुर्गति हो जाती है। नहीं कर पाया, इसका यह मतलब नहीं कि मैंने आपसे कहा कि हत्या कर दूंगा, और नहीं की। नहीं, मैं आपसे कह भी नहीं पाया, तो भी दुर्गति हो जाती है। भीतर उठा विचार भी अशुभ का दुर्गति की यात्रा पर पहुंचा देता है। बीज बो दिया गया।
गलत विचार भी काफी है दुर्गति के लिए। सही विचार भी काफी है दुर्गति से बचने के लिए। क्यों? क्योंकि अंततः हमारा विचार ही हमारे जीवन का फल बन जाता है। फल कहीं बाहर से नहीं आते। हमारे ही भीतर उनकी ग्रोथ, उनका विकास होता है।
बुद्ध ने धम्मपद में कहा है कि आप जो हो, वह आपके विचारों का फल हो। अगर दुखी हो, तो अपने विचारों में तलाशना, आपको वे बीज मिल जाएंगे, जिन्होंने दुख के फल लाए। अगर पीड़ित हो, तो खोजना; तुम्हीं अपने हाथों को पाओगे, जिन्होंने पीड़ा के बीज बोए। अगर अंधकार ही अंधकार है आपके जीवन में, तो तलाश करना; आप पाओगे कि आपही ने इस अंधकार का बड़ी मेहनत से निर्माण किया। हम अपने नर्कों का निर्माण बड़ी मेहनत से करते हैं! दोनों ही बातें सोच लेना।




