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धर्ममध्यप्रदेशसिवनी

कोई सहन कर रहा है तो कमजोर मत समझो, यह उसके संस्कार है – निर्विकल्प स्वरूप

   सिवनी यशो:- हमारे यहां चार आश्रम हैं ब्रह्मचर्य आश्रम , गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम (The four ashrams are Brahmacharya Ashram, Grihastha Ashram, Vanaprastha Ashram and Sanyas Ashram.) यह चार आश्रम होते हैं, वानप्रस्थ आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम एवं सन्यास आश्रम इन तीनों आश्रमों का पोशाक अर्थात इन तीनों आश्रमों का पोषण गृहस्थ आश्रम के द्वारा किया जाता है।

जैतपुर के उदय पब्लिक स्कूल में चल रही श्रीमद्भागवत कथा (Srimad Bhagwat Katha) के तृतीय दिवस में पूज्य ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी महाराज (Respected Brahmachari Shri Nirvikalp Swaroop Ji Maharaj) ने बताया की, पद का मद सब लोग पचा नहीं पाते । यदि कोई सहन करता है तो उसको कमजोर नहीं समझना चाहिए, ये सहन कर रहा है तो कमजोर है। कई बार बलवान व्यक्ति भी सहन कर लेते हैं यदि उनके संस्कार अच्छे हो तो, मगर उनकी सहनशक्ति की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए वरना उनके क्रोध की अग्नि से व्यक्ति जलकर भस्म हो जाता है कपिलमुनि गंगासागर में ध्यान मग्न वहां तप करते थे सगर के साठ हजार पुत्र वहां पहुंच गए और उन्हें सताने लगे तो उनको सताने का परिणाम यह हुआ कि सगर के साठ हजार पुत्र सब भस्म हो गए उनका उद्धार भी नहीं हो रहा था कई पीढियां तक भगवान की आराधना की गई तब गंगा जी भागीरथ की कृपा से पृथ्वी पर आई तब सगर के पुत्रों की मुक्ति हुई।

पूज्य ब्रह्मचारी जी ने बताया कि पृथु महाराज ने धरती को पुत्री रूप से स्वीकार किया तब से इनका नाम पृथ्वी हो गया। पहले नगर गांव कस्बे नहीं थे, कहीं ऊंचा कहीं नीचा, खेती लायक पृथ्वी नहीं थी सबसे पहले पृथु महाराज ने खेती शुरू करवाई तब पृथ्वी से अन्न निकलने लगा। उन्होंने सब पर्वतों को एक तरफ किया नगर, कस्बे बसाये । ऊंची नीची जो जमीन थी उसे समतल कराया और मनुष्यों में सबसे पहले सम्राट महाराज पृथु कहे जाते हैं उन्होंने सौ अश्वमेध यज्ञ भी किए थे, जो सौ अश्वमेध यज्ञ कर लेता है वह इंद्र बनने का अधिकारी हो जाता है, इंद्र ने यज्ञ में बाधा पहुंचाई मगर वे सफल नहीं हुए। भगवान की कृपा उन पर थी। वे भगवान के ही अंश से प्रकट हुए थे

सद चित्त आनंद ही जीवन का सार : ब्रह्मचारी श्री निर्विकल्प स्वरूप जी

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