हौसले बुलंद हों तो पैरों से भी इतिहास लिखा जा सकता है
दोनों हाथ शिथिल होने के बावजूद मंडला की बेटी द्रौपदी ने पैरों से लिखकर 12वीं में हासिल किए 65% अंक, बनी लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा

द्रौपदी धुर्वे सफलता की कहानी – जब सपनों के सामने दिव्यांगता छोटी पड़ जाए, तब जन्म लेती हैं द्रौपदी जैसी कहानियां
Mandla 28 May 2026
मंडला यशो:- कुछ कहानियां सिर्फ खबर नहीं होतीं, वे समाज के लिए प्रेरणा का दीपक बन जाती हैं। मध्य प्रदेश के मंडला जिले की बेटी द्रौपदी धुर्वे की कहानी भी ऐसी ही है, जो यह साबित करती है कि मंजिल तक पहुंचने के लिए हाथों की नहीं, हौसलों की जरूरत होती है।
जन्म से दोनों हाथ शिथिल होने के कारण वह पेन तक नहीं पकड़ सकतीं। जिन परिस्थितियों में अधिकांश लोग अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं, उन्हीं परिस्थितियों को द्रौपदी ने अपनी ताकत बना लिया। उसने हार मानने के बजाय अपने पैरों को ही अपना सहारा बनाया और उन्हीं पैरों से लिखकर 12वीं बोर्ड परीक्षा में 65 प्रतिशत अंक हासिल कर लिए।

यह सफलता केवल एक छात्रा की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए संदेश है जो जीवन की कठिनाइयों को अपनी कमजोरी मान लेते हैं।
जिसे किस्मत ने चुनौती दी, उसने उसे उपलब्धि में बदल दिया
मंडला जिले के मवई विकासखंड के छोटे से करौंदा टोला गांव में रहने वाली द्रौपदी धुर्वे का जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा। जन्म के समय ही उसके दोनों हाथ शिथिल थे। वह न तो सामान्य बच्चों की तरह लिख सकती थी और न ही रोजमर्रा के कई काम आसानी से कर सकती थी।
लेकिन उसके भीतर एक सपना था—पढ़ने का, आगे बढ़ने का और समाज में अपनी पहचान बनाने का।
जब हाथों ने साथ नहीं दिया तो उसने अपने पैरों में पेन फंसाकर लिखना शुरू किया। शुरुआत में यह बेहद कठिन था, लेकिन हर दिन की मेहनत ने उसे उस कला में इतना दक्ष बना दिया कि आज वह पैरों से सुंदर और तेज लिखने लगी है।
गरीबी भी नहीं रोक सकी शिक्षा की राह
द्रौपदी एक गरीब आदिवासी परिवार से आती हैं। उनके पिता बीरबल धुर्वे मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। घर में संसाधनों की कमी थी, सुविधाएं सीमित थीं, लेकिन सपने बड़े थे।
आर्थिक अभाव, शारीरिक दिव्यांगता और ग्रामीण परिवेश जैसी अनेक चुनौतियों के बावजूद द्रौपदी ने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी। उसने यह साबित कर दिया कि संसाधनों की कमी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकती, यदि संकल्प मजबूत हो।
10वीं में भी रचा था इतिहास, अब 12वीं में फिर दिखाई अपनी प्रतिभा
द्रौपदी ने दो वर्ष पहले 10वीं बोर्ड परीक्षा में भी शानदार प्रदर्शन कर अपने विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उस समय उसकी सफलता ने पूरे जिले का ध्यान अपनी ओर खींचा था।
उसकी लगन और संघर्ष से प्रभावित होकर तत्कालीन मंडला कलेक्टर डॉ. सलोनी सिडाना स्वयं उसके गांव पहुंची थीं। उन्होंने द्रौपदी का सम्मान किया और उसे आगे पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया।
द्रौपदी ने उस समय कहा था कि वह पढ़-लिखकर एक अधिकारी बनेगी और समाज की सेवा करेगी। आज 12वीं में सफलता हासिल कर उसने अपने उस सपने की ओर एक और मजबूत कदम बढ़ा दिया है।
शिक्षिका बनीं संघर्ष से सफलता तक की साथी
द्रौपदी की सफलता के पीछे उसकी शिक्षिका चंद्रकला मरकाम का भी महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने छात्रा को लगातार प्रोत्साहित किया, उसका आत्मविश्वास बढ़ाया और पैरों से लिखने की कला को निखारने में मदद की।
विद्यालय के शिक्षकों का कहना है कि द्रौपदी हमेशा पढ़ाई के प्रति गंभीर रही है। वह नियमित रूप से स्कूल आती थी और हर चुनौती का सामना मुस्कुराकर करती थी।
द्रौपदी की कहानी बताती है—सफलता शरीर से नहीं, सोच से मिलती है
आज जब कई युवा छोटी-छोटी असफलताओं से निराश हो जाते हैं, तब द्रौपदी की कहानी यह सिखाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मन में विश्वास और लक्ष्य के प्रति समर्पण हो तो सफलता निश्चित है।
उसके दोनों हाथ काम नहीं करते, लेकिन उसके सपनों के पंख किसी भी सामान्य व्यक्ति से कहीं अधिक मजबूत हैं।
उसने यह साबित कर दिया कि—
“उड़ान पंखों से नहीं, हौसलों से होती है।”
और यह भी कि—
“जिसके इरादे मजबूत हों, उसके लिए असंभव शब्द का कोई अर्थ नहीं होता।”
देश के युवाओं के लिए एक संदेश
द्रौपदी धुर्वे की कहानी केवल मंडला या मध्य प्रदेश की कहानी नहीं है। यह पूरे देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का संदेश है।
जब भी जीवन में कोई कठिनाई आए, जब भी लगे कि रास्ते बंद हो गए हैं, तब इस बेटी को याद कीजिए जिसने हाथों के बिना भी अपने सपनों को थामे रखा और पैरों से लिखकर सफलता की नई इबारत रच दी।
द्रौपदी ने बता दिया है कि—
“किस्मत हाथों की लकीरों से नहीं, मेहनत के पसीने से लिखी जाती है।”
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