खरीफ की बर्बाद हुई फसलों का तत्काल मुआवजा दे सरकार: नकुलनाथ
प्रभारी मंत्री का आदेश भी हुआ बेअसर, प्रारंभ नहीं हुआ सर्वे
बर्बाद हुई फसलों के मुआवजे के लिये दर-दर भटक रहे किसान, कहां है भाजपा की सरकार घोषणाओं व आश्वासनों की सरकार चला रही भाजपा
छिन्दवाड़ा यशो:- जिले के पूर्व सांसद नकुलनाथ (Former MP Nakul Nath) ने अतिवृष्टि से बर्बाद हुई किसानों की फसलों का अविलम्ब मुआवजा दिये जाने की मांग प्रदेश की भाजपा सरकार से की है। उन्होंने कहा हमारे छिन्दवाड़ा व पांढुर्ना जिले में अतिवृष्टि के चलते किसानों की खरीफ सीजन की फसलें बर्बाद हो चुकी है, बचीकूची फसलों पर भी खराब मौसम का साया मंडरा रहा है। कांग्रेस के परासिया, चौरई, सौंसर व पांढुर्ना विधायकगणों ने फसलों के सर्वे की मांग को लेकर ज्ञापन दिया तब जाकर सरकारी अमला सक्रिय हुआ, किन्तु उन्होंने भी चंद खेतों में पांव रखकर सर्वे की खानापूर्ति कर दी। जिले के प्रत्येक हिस्से में फसल बर्बाद हुई है इसे दृष्टिगत रखते हुये सर्वेक्षण किया जाना चाहिये साथ ही अविलम्ब मुआवजा दिया जाये। ताकि अन्नदाता को फसलों के मुआवजे के लिये सरकारी दफ्तर में दर-दर भटकना ना पड़े।
कांग्रेस के परासिया विधायक सोहन वाल्मीक, चौरई विधायक सुजीत सिंह चौधरी, सौंसर विधायक विजय चौधरी व पांढुर्ना विधायक निलेश उइके के द्वारा क्षतिग्रस्त फसलों के मुआवजे व सर्वे की मांग की गई तब राजस्व विभाग का अमला कुछ खेतों में पहुंचा और सर्वे की प्राथमिकता पूरी कर लौट गये, किन्तु आज भी जिले में पूरी गति से ना तो सर्वे प्रारंभ हुआ है ना ही किसानों को राहत पहुंचाने के लिये मुआवजा राशि का निर्धारण ही किया गया है यह प्रदेश की भाजपा सरकार की असंवेदनशीला है। श्री नाथ ने कहा क्या यही भाजपा का किसान हितैषी चेहरा है? अन्नदाता की आय दोगुनी करने का झांसा देने वाली भाजपा आज किसानों की क्षतिग्रस्त फसलों का सर्वे तक नहीं करा रही ना ही उन्हें मुआवजा दे रही।
नकुलनाथ ने आगे कहा कि झूठ, फरेब, घोषणाओं व आश्वासनों के तीन पायों के सहारे चल रही भाजपा सरकार की नीति और नियत किसान ही नहीं बल्कि समाज का हर वर्ग देख रहा है कि आज अन्नदाता बाजार से महंगें दामों पर खाद, बीज व अन्य कृषि यंत्र खरीद कर खेती किसानी कर रहा। जैसे-तैसे फसल पकने की कगार पर आती है तो मौसम की बेरूखी उसे चौपट कर रही। अतिवृष्टि से सोयाबीन, धान व अन्य फसलों को भारी नुकसान हुआ है। किसानों की लागत मूल्य दोगुनी हो गई है जबकि आय लगातार घट रही। वर्ष 2011 में भी सोयाबीन की फसल के दाम 4300 रुपये प्रतिक्विंटल थे। आश्चर्य की बात है कि 13 वर्ष बाद वर्ष 2024 में भी पुराने दामों पर ही उपज खरीदी जा रही है। केन्द्र व राज्य में भाजपा की सरकार है और किसान लगातार एमएसपी की मांग कर रहे, किन्तु उनकी फसलों को एमएसपी के समर्थन मूल्य पर खरीदी नहीं की जा रही। बिजली की दरों में बेतहाशा वृद्धि और महंगे उपकरणों की वजह से खेती लगातार महंगा व्यवसाय बनती जा रही है।


