भाग 13 : कपिल पांडे की आध्यात्मिक यात्रा की अगली कड़ी
✍️ कपिल पांडे की यात्रा-वृत्तांत पर आधारित
स्थान: रामानंद आश्रम से हनुमनतेश्वर तक
प्रातः का सौंदर्य और माँ का आशीर्वाद
रामानंद आश्रम में जब सुबह आँख खुली, तो लगा मानो स्वयं प्रकृति ने माँ नर्मदा के मस्तक पर तिलक कर दिया हो। सूर्य की पहली किरण जैसे आशीर्वाद बनकर उतरी थी।
घाट पर चेतावनी दिखी – “मगर से सावधान” – अतः हमने जल-स्नान की योजना स्थगित कर, केवल नमन किया और आश्रम में ही स्नान व ध्यान संपन्न किया।

विनम्रता का पाठ: माँ की भिक्षा को अस्वीकार मत करना
मंदिर में पूजा करते समय एक वृद्ध माता जी ने हमारी थाली में ₹100 रख दिए। हमने हाथ जोड़कर विनम्रता से अस्वीकार किया।
परंतु उनके साथ आए वृद्ध ने दृढ़ वाणी में कहा –
“तुम होते कौन हो मना करने वाले? यह तुम्हें नहीं, माँ नर्मदा को दिया गया है!”
उस एक वाक्य ने भीतर तक झकझोर दिया। अहंकार का लेशमात्र भी न रहा।
मन ही मन प्रतिज्ञा ली –
“माँ! अब हम तेरे भिक्षुक हैं, जो भी तेरा है, वही हमारा है।”
और तभी अंतर से स्वर गूंजा –
“अमरकंटक से अरब सागर तक – नर्मदे हर!”
कृषक सत्कार: माँ की परीक्षा या सत्संग?
थोड़ी दूर चले तो एक किसान भाई ने रास्ता झाड़ते हुए कहा –
“आप हमारे लिए तीर्थ समान हैं!”
उनके घर पर सत्कार, नाश्ता, चाय और आत्मीय विदाई – यह कोई साधारण आतिथ्य नहीं, माँ की एक और परीक्षा थी।
संत का संग और शिष्टाचार की शिक्षा
रास्ते में वाराणसी से आए एक साधु मिले। उन्होंने परिक्रमा के आचरण, संन्यासियों के नियम, और आश्रम शिष्टाचार की बातें साझा कीं – जैसे माँ स्वयं ज्ञान दे रही हो।

भव्य दर्शन: नीलकंठ और हनुमनतेश्वर
स्वामीनारायण ट्रस्ट द्वारा निर्मित नीलकंठ मंदिर का भव्य परिसर चित्त को शांति से भर गया। वहीं पता चला –
“पास में हनुमनतेश्वर मंदिर है, जहाँ श्री हनुमान ने ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने तपस्या की थी।”
हमने तुरंत निर्णय लिया – “माँ की परिक्रमा में कोई भी रास्ता दूर नहीं।”
हनुमनतेश्वर मंदिर का ऊर्जा-पूर्ण वातावरण, वहाँ की वृद्ध माता जी द्वारा सुनाया गया इतिहास, और श्रीराम के साथी नल-नील द्वारा स्थापित मंदिरों के दर्शन – यह सब रोमांचकारी और अध्यात्मिक रूप से सघन अनुभव था।
माँ का संकेत: फिर वही रास्ता, फिर वही मंदिर
लौटते समय रास्ता भटक गए। घूमते हुए फिर से वही मंदिर, वही मोड़।
क्या माँ बुला रही थी? या परीक्षा ले रही थी?
शायद दोनों…
मंदिर में विश्राम: सेवा, श्रम और संतोष
अंततः शाम को एक दुकानवाले से पता चला –
“5 किलोमीटर अंदर एक हनुमान मंदिर है, वहीं रुक जाइए।”
खेतों के बीच वह हरियाली से घिरा सौम्य मंदिर – वहाँ पहुँचकर थकान गायब हो गई।
सेवकों ने कच्चा अन्न दिया – हमने स्वयं भोजन बनाया, भोग लगाया और फिर सत्संग के साथ भोजन किया।

रात्रि विश्राम से पहले मन में एक ही भाव था –
“थकावट शरीर में थी, पर मन पूर्णत: तृप्त था। हम माँ के एक और पथ पर चल चुके थे। अब हर कदम केवल माँ की शरण में समर्पित था।”
अगले चरण की प्रतीक्षा
“नर्मदे हर! कल फिर मिलेंगे…”
श्रद्धा-संदेश:
“नर्मदा परिक्रमा केवल यात्रा नहीं, यह आत्मा के संस्कारों का पुनर्जन्म है। यहाँ हर मोड़ पर विनम्रता, सेवा और समर्पण की शिक्षा माँ स्वयं देती हैं।” – कपिल पांडे



