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नर्मदा परिक्रमा : मीठी तलाई से कोरल गांव तक: नर्मदा मैया की गोद में अनुभूति और आत्मसाक्षात्कार सुबह नर्मदा मैया की गोद में

कपिल पांडे की नर्मदा परिक्रमा यात्रा — भाग -16

आज की सुबह कुछ अलग थी — आंख खुली तो नर्मदा मैया के शांत जल का स्पर्श और ठंडी हवा का आलिंगन तन-मन को एक साथ शुद्ध कर रहा था। यह केवल स्नान नहीं था, यह आत्मा का अभिषेक था।

 भगवान नीलकंठ मंदिर: न्याय से सन्यास की ओर

भरूच जिले में स्थित भगवान नीलकंठ महादेव मंदिर पहुंचे। वहां एक विलक्षण कथा सुनने को मिली — एक जज जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग किया और यहीं सन्यास लेकर मां नर्मदा को अपना सहारा बना तप में लीन हो गए।
यह कथा केवल कथा नहीं थी, यह परिक्रमा की एक मौन शिक्षा थी — मोक्ष की ओर बढ़ते मनुष्य की यात्रा।

भगवान नीलकंठ मंदिर:

सेवा की सुंदरता: चाय और आत्मीयता

 

शहर की गलियों से निकलते समय कुछ स्थानीय लोग चाय-नाश्ते का आग्रह कर बैठे। हमने सादर स्वीकार किया, क्योंकि परिक्रमा की एक बड़ी सीख है — सेवा स्वीकार करना भी सम्मान है।

सेवा की सुंदरता: चाय और आत्मीयता

शुक्लेश्वर तीथर्: जहां इतिहास बोलता है

हमारा अगला पड़ाव था शुक्लेश्वर तीर्थ। यहाँ पाँच प्रमुख मंदिर स्थित हैं: शुक्लेश्वर महादेव (स्वयंभू), अंबाजी देवी, चतुर्भुज ओंकारनाथ, गोपीश्वर महादेव, श्रीराम मंदिर

इन प्राचीन स्थलों की गरिमा को शब्दों में पिरोना संभव नहीं। यह वही स्थल हैं, जिनका उल्लेख रामायण और महाभारत में भी हुआ है।

भोजन में प्रेम की महक

स्थानीय ग्रामीणों ने आत्मीयता से भोजन में आमंत्रित किया। साथ बैठकर पके खाने में स्वाद से अधिक प्रेम था — यही परिक्रमा की असली थाली है।

गोपीश्वर महादेव: मां नर्मदा की धारा से निकली मूर्ति

गोपीश्वर भगवान की प्रतिमा लगभग 2000 वर्ष पूर्व नर्मदा की जलधारा से प्राप्त हुई थी। मंदिर के बाहर एक चेतावनी — “मगर से सावधान” — मां की अपार शक्ति और रक्षा का प्रतीक बनी हुई है।

झाड़ू बनाता परिवार: श्रम की गरिमा

झाड़ू बनाता परिवार: श्रम की गरिमा

जानौर गांव की ओर जाते समय एक परिवार झाड़ू बनाते मिला। हमने कुछ समय उनके साथ बिताया। एक सामान्य सा कार्य जब प्रेम और श्रम से जुड़ता है, तो वह साधना बन जाता है।

74 वर्षीय संत: साइकिल पर दसवीं परिक्रमा

रास्ते में मिले एक 74 वर्षीय संत, जो साधारण साइकिल से अपनी दसवीं परिक्रमा कर रहे थे। उम्र उनके लिए बाधा नहीं, बल्कि भक्ति का मापक बन गई थी। उन्होंने कहा —
“नर्मदा खुद चलती है हमारे साथ।

हौज गांव (अवधपुरी): रामायण की धरती

यह गांव केवल भूगोल नहीं, एक पौराणिक जीवित स्थल है।
यहां भगवान राम ने वनवास काल में शिवलिंग की स्थापना की थी। हर ढाई साल में कुंभ जैसा भव्य मेला लगता है।

यहां की माताएं-बहनें गरमागरम मसाला पुड़ी और चाय से सभी परिक्रमा वासियों की सेवा में जुटी थीं।

जीवन संवाद: साड़ी की लेस और चाय

रामेश्वर महादेव मंदिर दर्शन के बाद एक घर के बाहर दो वृद्धाएं साड़ी की लेस सजाती मिलीं। बातचीत में उन्होंने चाय पिलाई, और लेस बनाने की कला सिखाई।
यह संवाद, यह आत्मीयता — जैसे जीवन की सबसे सुंदर कढ़ाई।

मार्कण्डेय ऋषि की तपोभूमि की ओर

हरी-भरी पगडंडियों पर “नर्मदे हर” की ध्वनि गूंज रही थी। यह केवल यात्रा नहीं थी, एक सामूहिक जप था — चलते हुए हर कोई एक ही नाम ले रहा था, एक ही दिशा में बह रहा था।

कोरल गांव: विश्राम की शांति में आरती

संध्या को हम पहुंचे कोरल गांव — मां नर्मदा के किनारे एक शांत स्थल, जहां पांडवों द्वारा स्थापित शिव मंदिर है।
मंदिर में आरती हुई। मन शांत हो गया, जैसे किसी बच्चे ने माँ की गोद में सिर रख दिया हो।

आज यहीं विश्राम है। शांति, संतुलन और साधना का संगम।

अगली सुबह की प्रतीक्षा
कल फिर नई सुबह होगी, एक नया पड़ाव, एक नया अनुभव…
लेकिन नाम वही रहेगा — नर्मदे हर।

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