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धर्ममध्यप्रदेशसिवनी

सदगुरु कबीर एक मानवता पूर्ण सत्य मुक्ति का सत्य विचार है – दर्शनाचार्य रामजीवन शास्त्री

छपारा यशो:- छपारा ग्राम मानेगांव में आयोजित त्रिदिवसीय आध्यात्मिक सत्संग समारोह के अंतिम दिवस पर प्रात: नगर में सद्भावना शोभायात्रा निकाली गई। परम पूज्य कबीर दर्शनाचार्य श्री रामजीवन शास्त्री साहेब जी का नगर भ्रमण के दौरान आरती, पूजा ,चरण बंदगी की गई । इसके पश्चात सत्संग के पावन अवसर में सदगुरु कबीर दर्शन के अनुसार सदगुरु कबीर साहब कौन हैं? उनका इस धरा धाम पर आने का कारण बताते हुए कहा कि सदगुरु कबीर साहेब का आगमन ऐसे समय में हुआ जिस समय मुगलों का शासन था । हिंदू मुसलमान में आपसी वैमनस्य बहुत बढ़ चुका था। तलवार के बल पर शासन किया जा रहा था । पाखंड एवं कुरीतियां ही धर्म का रूप ले रही थी । ऐसे समय में एक आर्त ध्वनि हुई की हे परमात्मा इस प्रकार के अत्याचार हम कब तक सहन करते रहेंगे। क्या हमारी रक्षा नहीं होगी? तब करुण पुकार सुनकर सत्यपुरुष परमात्मा ही सदगुरु कबीर साहेब के रूप में सन 1398 संवत 1455 को काशी के लहर तालाब में बाल स्वरूप धारण कर प्रकट हुए और नीमा नीरू नव दंपति को प्राप्त हुए। तथा धर्म के नाम पर फैली कुरीति ,पाखंड ,अंधविश्वास ,जीव हिंसा , इत्यादि धर्मांता पर जमकर प्रहार किया। सभी की भूलों को दिखलाए और सत्य धर्म ,सत्य भक्ति ,सत्यज्ञान इत्यादि को लखाए।
वास्तव में सदगुरु कबीर किसी जाति पाति, व्यक्ति, संप्रदाय या मजहब का नाम नहीं सदगुरु कबीर तो एक मानवता पूर्ण सत्य मुक्ति का सत्य विचार है । जीव हिंसा पर कठोर प्रहार करते हुए कहा कि

                                                                जीव मत मारो बापुरा ,    सदगुरु कबीर एक मानवता पूर्ण सत्य मुक्ति का सत्य विचार है - दर्शनाचार्य रामजीवन शास्त्री - Seoni News
सबका एक ही प्राण।
हत्या का बहु ना छूटही,
कोटिन सुनो पुराण।।

किए हुए शुभ अशुभ कर्म का भोक्ता मनुष्य अवश्य ही होता है । बदला अवश्य ही चुकाना पड़ता है ।इसलिए व्यक्ति को हमेशा शुभ कर्म, सदकर्म अच्छी संगत ,अच्छी पंगत ,ब्रह्म ज्ञानी जागे हुए सद्गुरु का साथ करना चाहिए। जिससे हम सत्यलोक के अधिकारी बन सकें ।
आगे पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि जीवन कल्याण के लिए आत्म कल्याण के लिए साधु संतों का साथ अवश्य करना चाहिए क्योंकि बिना सतपात्र बने हम सत्य ज्ञान के अधिकारी नहीं बन सकते ।सच्चे गुरु को प्राप्त करना है तो सच्चा सतपात्र शिष्य बनना पड़ेगा तभी सही अर्थ में हम सत्संग के, ज्ञान के , मुक्ति के अधिकारी बन सकते हैं ।इसलिए कहा है-

साधु सगा और गुरु सगा,
अंत सगा निज नाम।
कहैं कबीर इस जीव के
तीन ठौर विश्राम ।।

अंतिम सत्र में कबीर पंथ का मुख्य पूजन गुरु पूजा, सात्विक यज्ञ ,चौका आरती का भी विशेष रूप से आयोजन किया गया ।पूजन विधि के माध्यम से भक्तजनों ने अपनी श्रद्धा सुमन ,पान ,पुष्प, नारियल की भेंट किए। सत्संग प्रवचन के पश्चात प्रसाद वितरण के साथ भोजन भंडारा का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया।इसके पश्चात कार्यक्रम का सफल समापन हुआ।

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